Himalaya ki Nanda Devi Yatra

उत्तर हिमालय के अधिकाषं स्थलों पर जाने वाले श्रद्धालुओं ने इस प्रकार की धार्मिक यात्रा को तीर्थ के रूप में माना है। जिसका अर्थ जीवन से पर पाना होता है। अतः प्राचीनकाल में ऐसी साहसिक और धार्मिक यात्राएं अधिकांष लोग अपने जीवन के चैथे पड़ाव में करते थे। ताकि ऐसे स्थानों पर अधिक आयु या विपरीत परिस्थितियों के कारण यदि मृत्यु भी होती है, तो मोक्ष मिल जायेगा। इसीलिए इन स्थानों को स्वार्गद्वार/स्वर्गारोहिणी और मोक्षधाम के नाम से भी जाना जाता है।

जनश्रुति एवं लेखों में:ः नन्दा

कुटिला लिपि में लिखित बदरीनाथ के चार ताम्रपत्रों में स्पश्ट किया गया है कि कत्यूरी वंष में कार्तिकेयपुर (वर्तमान जोषीमठ) के राजाओं में ललितसुरदेव, पदमदेव और सुभिक्षराज ने नन्दादेवी को अपनी ईश्टदेवी घोशित की थी। यह ताम्रपत्र नौवीं सताब्दी के प्रतीत होते हैं। उनके द्वारा सम्पूर्ण गढ़-कुमाउँ में नन्दा के पावन मन्दिरों का निर्माण किया […]

जनश्रुति एवं लेखों में:ः नन्दा Read More »

गढ़नरेषों की राजधानी चँादपुरगढ़ी से देवलगढ़ स्थानान्तरित के कारण

स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार राजा अजयपाल गढ़वाल की राजधानी चाँदपुरगढ़ी से देवलगढ़ बाद में श्रीनगर गोरखा सैनिकों के आक्रमण से भयभीत होकर ले गये! यह तथ्य सरासर गलत है। इस सम्बन्ध में मेरे कुछ तर्क हैं-प्रथम प्रमाण- अजयपाल ने अपने राज्य की सीमाएं देहरादून-उत्तरकाषी-काली कुमायूँ तक विस्तृत की। राज्य की राजधानी केन्द्र में होने से

गढ़नरेषों की राजधानी चँादपुरगढ़ी से देवलगढ़ स्थानान्तरित के कारण Read More »

ओघड़ बाबा की समाधि स्थल:ः षैलेष्वर मठ

आठवीं सदी में निर्मित यह मठ इतिहास, परम्परा और धार्मिकता के अनूठे संयोग के लिए प्रसिद्ध है। यह मठ और चाँदपुरगढ़ी एक-दूसरे के आमने-सामने हैं। दूधातोली से निकलने वाली उत्तरवाहिनी आटागाड (नारायणगंगा) दोनों को गहरी संकरी घाटी द्वारा पृथक करती है। दोनों ही टीलानुमा भौगोलिक इकाईयों पर बने हैं। ऐतिहासिक गढ़ एवं धार्मिक आस्था का

ओघड़ बाबा की समाधि स्थल:ः षैलेष्वर मठ Read More »

राजयात्रा में छांतोलियों का महत्व

आस्था और विश्वास की इस राजजात को लेकर जहाँ लोगों में भारी उत्सुकता बनी रहती है, वहीं इस यात्रा में सन् 2000 से तीर्थ यात्रियों की उमड़ती भीड़ भी देखने लायक होती है। प्राचीन काल से ही यात्रा में चैंसिंग्या खाडू के साथ प्रतीक के रूप में रिंगाल से बुनी छंतोलियां भी काँसुवा से होमकुण्ड

राजयात्रा में छांतोलियों का महत्व Read More »

राजजात में बारह थोकी ब्राह्मण चैदह सयाने

क-बारह थोकी ब्राह्मण- यात्रा में दैविक षक्तियों का सम्पूर्ण दायित्व प्रमुख राजगुरू नौटियाल और अन्य ब्राह्मणों पर होता है। मायके से ससुराल भेजने की यह परम्परा लोकोत्सव है। जिसमें नंदा को बहिन-बेटी मानते हुए विदा करते हैं। बारह थोकी ब्राह्मण इस प्रकार हैं-1-नौटी के नौटियाल।2-देवल के देवली।3- गैरोली के गैरोला।4-थापली के थपलियाल।5-नौना के नौनी।6-खण्डूड़ा के

राजजात में बारह थोकी ब्राह्मण चैदह सयाने Read More »

राजजात-मार्ग में क्षेत्रवार पूजा का अधिकार

राजजात में बारहथोकी ब्राह्मणों का समान महत्व है। राज-छांतोली को कैलाष तक पँहुचानें केवल तीन ब्राह्मण जाति का अधिकार है। इसलिए पूजा विधान भी तीन भागों में बँटी हैं- राजगुरू नौटियाल- काँसुवा-नौटि-जाख बनाणी-नौटि-काँसुवा से महादेवघाट (चाँदपुरगढ़ी के मध्यमार्ग तक) तक। कोटी के ड्यूंडी और कुनियाल ब्राह्मण- महादेव घाट (चाँदपुर गढ़ के समीप) से होमकुण्ड तक

राजजात-मार्ग में क्षेत्रवार पूजा का अधिकार Read More »

राजजात का अगुवानी चैसिंग्या खाडू

लगभग 17500 फीट ऊँचाई बर्फीली चोटी से गुजरने वाली यह ऐतिहासिक व धार्मिक यात्रा अनोखी है। ’’हिमालयी सचल महाकुम्भ’’ के नाम से प्रचलित नन्दा राजजात की महत्वपूर्ण विषेशता यह है कि इसकी अगवाई चार सींग वाला खाडू (मेंडा) करता हैं। जिसे स्थानीय बोली में ’’चैसिंग्या खाडू’’ कहते हैं। सन् 1987 और सन् 2000 में उत्तराखण्ड

राजजात का अगुवानी चैसिंग्या खाडू Read More »

नन्दाजात एवं चैसिंग्यां खाडू़ का सम्बन्ध

पार्वती स्वरूपा नन्दा का विवाह कैलाषवासी औघड़ षिव के साथ हुआ। गढ़वाल नरेष ने नन्दा को अपनी धियाणी (बेटी-बहिन) माना, इसका विस्तृत वर्णन पहले किया जा चुका है। गढ़ नरेष ने नन्दा को बचन दिया कि तुम्हें बारह बर्शों में अपने राज्य (मायके) में बुलाऊगाँं। निर्जन एवं कठिन यात्रा या फिर राजकाज में व्यस्तता के

नन्दाजात एवं चैसिंग्यां खाडू़ का सम्बन्ध Read More »

नन्दा से जुड़े अन्य लोकोत्सव

क-नन्दा पाती- चाँदपुर क्षेत्र (मायका) सहित सम्पूर्ण गढ़-कुमाऊँ में जहाँ-जहाँ नन्दादेवी के थान (मंदिर) हैं उन गाँवों में ’’पत्ती या पाती ’’ लोकोत्सव धूमधाम से मनाते हैं। यह प्रतिबर्श या विषिश्ट समय अन्तराल में भाद्रपद अश्टमी (माह अगस्त) के दिन लोकपर्व और त्योहार दोनों रूप में मनायी जाती है।पाती निर्माण विधि- पाती लोकोत्सव का सबसे

नन्दा से जुड़े अन्य लोकोत्सव Read More »

अब तक आयोजित राजजात यात्रा

इस राजयात्रा को आरम्भ करने का श्रेय नौवीं सदी में राजा षालिपाल को जाता है। लेकिन इसके पुश्ठ प्रमाण नहीं होने से इस तिथि पर भ्रांन्ति बनी रहती है। यह यात्रा 12 साल के अन्तराल में आयोजित की जाती रही है। लेकिन कभी-कभी इसके आयोजन में अधिक समय का अन्तर भी रहा है।इसी क्रम में

अब तक आयोजित राजजात यात्रा Read More »