Himalaya ki Nanda Devi Yatra

उत्तर हिमालय के अधिकाषं स्थलों पर जाने वाले श्रद्धालुओं ने इस प्रकार की धार्मिक यात्रा को तीर्थ के रूप में माना है। जिसका अर्थ जीवन से पर पाना होता है। अतः प्राचीनकाल में ऐसी साहसिक और धार्मिक यात्राएं अधिकांष लोग अपने जीवन के चैथे पड़ाव में करते थे। ताकि ऐसे स्थानों पर अधिक आयु या विपरीत परिस्थितियों के कारण यदि मृत्यु भी होती है, तो मोक्ष मिल जायेगा। इसीलिए इन स्थानों को स्वार्गद्वार/स्वर्गारोहिणी और मोक्षधाम के नाम से भी जाना जाता है।

एक नजर में नन्दाराजजात का यात्रामार्ग

क्र0सं0/पडा़व स्थल का नाम दूरीकि0मी0में आवासीय व्यवस्था पड़ाव की कुल जनसंख्या ऊँचाई मी0 में औसत तापमान जुलाई/सित0प्रस्थान टागमन .. … … ..पूर्व के पहले दिन चैसिंग्या जन्मे गाँव सेे खाडू का प्रस्थान काँसुवा पहुँचना महिलाओं द्वारा नन्दा की पेरी से भव्य स्वागत रातभर पूजा-अर्चना, देवी जागरण .. … …षुभ लग्नानुसार राज जात आरम्भ हेतु नौटी […]

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नन्दा राजजात समिति

इस ऐतिहासिक राजयात्रा के आयोजन के लिए एक परम्परागत समिति है। गढ़वाल नरेष अजयपाल द्वारा राजधानी देवलगढ़/श्रीनगर स्थापित करने के बाद राजयात्रा का मुखिया/अध्यक्ष कुँवर एवं मंत्री नौटियाल हैं। वर्तमान में अध्यक्ष डाॅ0 राकेष कुँवर और समिति के मंत्री प0 भुवन नौटियाल हैं। राजजात आयोजन में सरकारी संस्थाओं का योगदानसन् 2000 से केन्द्र और राज्य

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विश्वप्रसिद्ध राजजात का आरम्भिक केन्द्रः काँसुवा

चाँदपुरगढ़ी के राजाआंे द्वारा आरम्भ की गई नन्दादेवी राजजात पैदल यात्रा आरम्भ करने का श्रेय पँवार वंषीय अजयपाल को जाता है। इस पैदल यात्रा की लम्बाई 280 किमी है। विश्वप्रसिद्ध राजजात का आरम्भिक केन्द्र चाँदपुरगढ़ी-आदिबदरी रहा। तत्कालीन गढ़वाल राज्य की सीमाएं काली-कुमायूँ से तराई-दूण घाटी तक विस्तार होने के कारण राजा ने राजधानी देवलगढ़-श्रीनगर स्थापित

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राजजात मार्ग एवं उसके पड़ाव/विश्रामस्थल (प्रथम पड़ाव- ईड़ाबनाणी (कर्णप्रयाग समीप))

यात्रा मार्ग- काँसुवा से नौटी आगमन के बाद नौटी से दियारकोट-जाख होते हुए ईड़ाबधाणी में विश्राम-ईड़ाबधाणी समुद्रतल से 1240 मीटर ऊँचाई पर स्थित है। राजयात्रा नैणी, झुरकण्डे, लाटूधार, गैरोली, डुंगरी, सिमल्ट, कनोठ, पुडियाणी, कोली, कुकड़ई, दियारकोट, सिंलगी चैण्डली, मजियाड़ा, हेलुड़ी होते हुए ईड़ाबधाणी पँहुचती है। यह पड़ाव अलकनन्दा-पिण्डर नदी के संगम उमा-माहेष्वरी की भूमि और

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द्वितीय पड़ाव- पुनः नौटी

यात्रा मार्ग- ईड़ाबधाणी से जाख-दियारकोट होते हुए नौटी में विश्रामराजजात दूसरे दिन ईड़ाबधाणी से रिठोली, जाख, दियारकोट, कुकड़ई, पुडियाणी, कनोठ, झुरकण्डे, नैणी होते हुए पुनः नौटी आती है। नौटी समुद्रतल से 1650 मीटर की ऊँचाई पर सुरम्य उफराई ठोंक की तलहटी पर बसा हुआ है। यह स्थल दूर से देखने में ऐसा लगता है मानो

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तृतीय पड़ाव- पुनः काँसुवा

यात्रा मार्ग- नौटी से देवल-नौना-होते हुए पुनः काँसुवा में विश्राम राजजात नौटी से चलकर घटगाड, देवल, बैनोली, मलेठी, ऐरोली, मज्याड़ी, आली, पयां आदि में अपने मायके वालों को मिलकर पुनः काँसुवा में आगमन कर विश्राम करती है। यहाँ राजराजेश्वरी का थान है। जो नंदा की बड़ी बहन है। राजराजेश्वरी और नन्दा के मिलन के बाद

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चतुर्थ पड़ाव- सेम-तोप

यात्रा मार्ग- काँसुवा-महादेवघाट-चाँदपुरगढ़ी- उज्ज्वलपुर-तोप होते हुए सेम में विश्रामयह पड़ाव समुद्रतल से 1530 मीटर की ऊँचाई पर गढ़ी के सबसे समीप वाला स्थान है। राजजात काँसुवा से चलकर दरमोली, पयां, महादेवघाट, मिरोली, हड़कोटी, चाँदपुरगढ़ पँहुचती है। चाँदपुरगढ़ी गढ़वाल के राजाओं की प्राचीन राजधानी रही है। यहाँ गढ़वाल नरेष टिहरी दरबार के महाराजा द्वारा षाही पूजा

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पंचम पड़ाव- कोटी-जैंटा

यात्रा मार्ग- सेम से प्रस्थान कर धारकोट- सिमतोली-घनियाल होते हुए कोटि में विश्रामपवित्र स्थल समुद्रतल से लगभग 1630 मीटर की ऊँचाई पर अनेक भौगोलिक विविधताओं को धारण किये हुए है। भक्तों द्वारा अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए देवी की कोटि-कोटि अर्थात बार-बार प्रार्थना की जाती है। इसलिए इस स्थान का नाम कोटी पड़ा। सीरी

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छटवाँ पड़ाव- क्यूर भगोती

(नन्दा के मैत का आखिरी पड़ाव)यात्रा मार्ग- कोटि से घतोड़ा-नौलापानी-कण्डवालगाँव-छैकुड़ा-मनौड़ा होते हुए भगोती में विश्रामदेवी का यह विश्रामस्थल राश्ट्रीय राजमार्ग 87 कर्णप्रयाग-ग्वालदम-अल्मोड़ा पर नारायणबगड़ के समीप स्थित हैं। पिण्डरनदी के बाम पाष्र्व पर 1500 मीटर की ऊँचाई पर भगौती (भगवती गाँव) बसा है। इस गाँव का नामकरण नन्दा भगवती के नाम से हुआ है। यह

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सातवाँ पड़ाव- काली कुलसारी

(माँ नन्दा का ससुराल क्षेत्र प्रारम्भ)यात्रा मार्ग- भगोती से प्रस्थान कर नारायणबगड़-मींगगधेरा-हरमनी-नगर कोटियाला होते हुए कुलसारी में विश्राम क्यूर (केवर) का राजजात में महत्ताराजजात भगोती के ’’केर’’ (मायका और ससुराल क्षेत्र की सीमा) क्यूर गदेरा के बाद (ससुराल क्षेत्र) श्रीगुरूगढ़ पट्टी में प्रवेष करती है। यात्रा का सातवाँ व आठवाँ पड़ाव क्रमशः भगोती व कुलसारी

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