राजजात मार्ग एवं उसके पड़ाव/विश्रामस्थल (प्रथम पड़ाव- ईड़ाबनाणी (कर्णप्रयाग समीप))

यात्रा मार्ग- काँसुवा से नौटी आगमन के बाद नौटी से दियारकोट-जाख होते हुए ईड़ाबधाणी में विश्राम-
ईड़ाबधाणी समुद्रतल से 1240 मीटर ऊँचाई पर स्थित है। राजयात्रा नैणी, झुरकण्डे, लाटूधार, गैरोली, डुंगरी, सिमल्ट, कनोठ, पुडियाणी, कोली, कुकड़ई, दियारकोट, सिंलगी चैण्डली, मजियाड़ा, हेलुड़ी होते हुए ईड़ाबधाणी पँहुचती है। यह पड़ाव अलकनन्दा-पिण्डर नदी के संगम उमा-माहेष्वरी की भूमि और कर्ण की तपस्थली, कर्णप्रयाग के निकट स्थित है। देष-विदेष से यँहा पँहुचने के लिए आवागमन के पर्याप्त साधन हैं।
राजजात का प्रथम पड़ाव ईडाबधाणी गांव बदरीनाथ-कर्णप्रयाग मार्ग से मात्र पांच किमी0 दूर है। ईडाबधाणी में भगवती के आगमन पर कर्णप्रयाग क्षेत्र के श्रद्धालु काफी संख्या में भाग लेते हैं। भजन-कीर्तन से सारा गांव नंदामयी हो जाता है। मूल रास्ते से प्राचीन मंदिर तक गाड़े कपड़े की चादर बिछा कर नंदा का भव्य स्वागत किया जाता है। यहाँ नंदादेवी के पौराणिक मंदिर के अलावा लाटू, पेरूल, नरसिंह, चंडिका का मंदिर अवस्थित है। यहाँ पर पूजा राजगुरु-नौटियाल द्वारा की जाती है।
इस गांव के पड़ाव बनने के पीछे कथा है कि एक बार नंदादेवी ऋशिकेष से कैलाश की ओर जा रही थीं, रास्ते में कर्णप्रयाग के समीप वक्रकुंड में स्नान के दौरान उनकी नजर ईडाबधाणी गांव पर पड़ी। गांव की सुंदरता को देख कर मां नंदा ने इस गांव में जाने का निर्णय लिया। गांव में पहुंचने पर उनकी भेंट आदि-पुरुष जमन सिंह जदोड़ा (गुसाँई) से हुई। उन्होंने मां नंदा का खूब आदर-सत्कार किया। ग्रामवासियों के इस आदर-सत्कार से मां अतिप्रषन्न हुई।
जमनसिंह जदोड़ा ने मां से प्रार्थना कि की जब भी वह मायके से कैलाश जाएं तो इस गांव से होते हुए अवष्य आएं और मैती भेंट अवश्य ले जाएं। भगवती ने उनकी भावनाओं को सम्मान देते हुए आषंका के साथ प्रश्न किया कि मेरे साथ मेरी मैतियों की अधिक संख्या होगी। इससे भविष्य में तुम्हारी संताने इनके आदर-सत्कार करने में परेशानी महसूस तो नहीं करेगें। तब जमनसिंह जदोड़ा ने बचन दिया कि मेरे वंशज खुशी-खुषी से तुम्हारी और तुम्हारे साथ आने वाले हर यात्री-मैतियों का आदर सत्कार मन-बचन-क्रमबद्धता से करेंगे। तब से आज तक ईडाबधाणी गांव में देवी के आगमन पर जमन जदोड़ा के वंशज के साथ अन्य जातियों के परिवार अपने पूर्वजों द्वारा दिए गए बचन को अपना धर्म समझते हुए सत्यनिश्ठा से निभाते आ रहे हैं। प्रत्येक जात में माँ भगवती राजषासनकाल में चाँदपुरगढ़ी से और अब काँसुवा-नौटि से पहले इणाबधाणी गांव में पूजा लेने जाती हैं। फिर इणाबधाणी-नौटी-काँसुवा होते हुए चाँदपुरगढ़ी से आगे बढ़ती हैं।

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