विश्वप्रसिद्ध राजजात का आरम्भिक केन्द्रः काँसुवा

चाँदपुरगढ़ी के राजाआंे द्वारा आरम्भ की गई नन्दादेवी राजजात पैदल यात्रा आरम्भ करने का श्रेय पँवार वंषीय अजयपाल को जाता है। इस पैदल यात्रा की लम्बाई 280 किमी है। विश्वप्रसिद्ध राजजात का आरम्भिक केन्द्र चाँदपुरगढ़ी-आदिबदरी रहा। तत्कालीन गढ़वाल राज्य की सीमाएं काली-कुमायूँ से तराई-दूण घाटी तक विस्तार होने के कारण राजा ने राजधानी देवलगढ़-श्रीनगर स्थापित की । राज्य का विस्तार, षासकीय व्यस्तता, श्रीनगर दरबार में विद्रोह, राजपरिवार की आपसी कलह इत्यादि कई कारणों से राजा द्वारा अपने छोटे भाई काँसुवा के कुँवरों को श्रीनंदा राजजात यात्रा का दायित्व सौंपा। राजवंषी कुँवरों द्वारा इसका निर्वहन अविरल किया जा रहा है।
इसी प्रकार अजयपाल अपने आरध्यदेव प्रथमबदरी-आदिबदरी मन्दिर का दायित्व अपने दूसरे भाई ज्वाला सिंह को सौंपी। जो किले के समीप ही जुलगढ़ नामक स्थान पर रहता था। अतः आदिबदरी पूजा एवं राजजात का दायित्व की परम्परा आज तक इसी अनुसार चली आ रही है।
अतः नन्दादेवी राजजात मध्य-हिमालय की लोक-संस्कृति तथा भौगौलिक पर्यटन का एक साथ अद्भुत संयोग प्रस्तुत करती है। यह विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्रा है।
राजजात आरम्भ का विधान
 सर्वप्रथम राजकुँवर प्रत्येक बारह बर्शों के बाद आयोजित होने वाली राजजात के बर्श में बसन्त पंचमी से एक माह पूर्व राजरूड़िया के गाँव छिमटा (आदिबदरी के समीप) जाकर छंतोली निमार्ण का पतरी (न्यौता) देते हैं। यहीं से राजरूड़िया छंतोली का निर्माण प्रारम्भ करते हैं।
 राजकुँवरों द्वारा मनौती
प्रत्येक बारह बर्शों के बाद बसन्त पंचमी के दिन राजकुँवर राजजात आयोजन करने की मन इच्छा अर्थात दिन करते हैं, इसे ही ’’मनौती’’ कहते हैं। कुँवर मनौती लेकर राजगुरू के गाँव नौटी जाकर राजगुरू नौटियाल से राजजात आयोजन करने का दिन माँगते हैं। मनौती से आयोजन तक का दायित्व राजकुँवर और राजगुरू दोनों निभाते हैं। गढ़वाल नरेष (अब टिहरी महाराज) राजजात के समय चाँदपुरगढ़ी में ही पूजा के निमित्त उपस्थित होते हैं।
श्री नंदा की दैवीय षक्ति के आर्षीवाद से ’’मनौती’’ के बाद चाँदपुर क्षेत्र में चैसिंग्या-खाडू पैदा होता हैं। जिस गाँव में खाडू जन्म लेता है, वे काँसुवा सूचना भेजते हैं। राजजात प्रारम्भ होने से कुछ दिन पूर्व राजकुँवर चैसिंग्या जन्मे गाँव से खाडू को बडे़ धूमाधाम से लाते हैं। यही चैसिंग्या राजजात का अगवानी (पथ-प्रदर्षक) करता है।
पाठकों को यह जानकारी दे दूँ सन् 2014 की जात में चैसिंग्या खाडू इतने अधिक थे कि दूर देष से आये श्रद्धालुओं को सठीक जानकारी नहीं हो पा रही थी। जबकि असली चैसिंग्या खाडू काला रंग इसकी विषिश्ठ पहचान है। यह राज छंतोली के आगे से चलता है।
 चैसिंग्या खाडू का काँसुवा में आगमन
चैंसिंग्या का कांसुवा लोते समय मार्ग में भव्य स्वागत होता है। इसी दिन मनौती वाली छंतोली जो षैलेष्वर महादेव (बैनोली गाँव) में रखी होती है, उसे काँसुवा लाते हैं। काँसुवा में छंतोली और खाडू दोनों का मांगल, नन्दोळ गायन और ब्रह्मोचारण के द्वारा भव्य स्वागत और पूजा-अर्चना होती है। सन् 2000 की राजजात तक इलैक्ट्राॅनिक संगीत, सोषल मीडिया और संचार का विकास नहीं था तो तब पूरी रात्रि गाँव की महिलाओं खासकर धियाणियों द्वारा ’’नन्दा की पेरी’’ गायन होता था। जिसे सम्र्पूण जनमानस बड़े ध्यानपूर्वक सुनते थे।
’’नन्दा पेरी’’ के भाव, षब्द, लय आदि नन्दा के जन्म, षिव से विवाह संस्कार, कैलाष में कठिन जीवन, नन्दा का मायके वालों पर प्रदोश को उजाकर करते थे। परन्तु सन् 2014 की जात से इलेक्ट्रोनिक, सोषल मीडिया और संचार विकास उपयोग काफी मात्रा में उपयोग होने लगा है। यहीं नहीं सभी यात्रा पड़ावों पर लोक-गायकों द्वारा संगीत के माध्यम से रात्रि में देवी जागरण होता है। सन् 2027 प्रस्तावित राजजात में उक्त का उपयोग सोच से उपर होगा। लोक परम्पराओं को संरक्षण के लिए पड़ाव समितियों को प्रत्येक पड़ाव ’’नन्दा की पेरी’’ को प्रोत्साहित हेतु प्रयास करना होगा।
 राज छंतोली का कांसुवा से नौटी प्रस्थान
दूसरे दिन राजपरिवार अध्यक्ष की अगुवाई में चैसिंग्या खाडू और रिंगाल की छंतोली (छतरी) को लेकर राजगुरू के गाँव नौटी के लिए प्रस्थान करते हैं। राजयात्रा का अगवानी करने वाले छंतोली, चैसिंग्या-खाडू, राजकुँवर के साथ नौना-देवल (द्यूळ), बैनोली, गड़सारी, भ्यलतारा गदेरा, षैलेष्वर, ऐरोली, मलेठी, माथर, देवलकोट, पेब, बढ़ेत आदिका जनमानस भी यात्रा में सम्मिलित होते हुए नौटि पँहुचते हैं।
 राजगुरू द्वारा भब्य स्वागत
 राजपरिवार चैसिंग्या खाडू और राज-छंतोली (छतरी) का नन्दाधाम नौटी में आगमन पर भव्य स्वागत होता है। राजगुरू नौटियाल स्वतिवाचन और मन्त्रोचार के साथ यजमान का टीका-पात करते हैं। रातभर महिलाओं द्वारा नन्दा की पेरी, नन्दोळ और भक्त देवी-जागरण करते है। राजगुरू और राजपरिवार द्वारा व्यवस्थाओं, पड़ावों और कार्यक्रम पर चर्चा की जाती है।
दूसरे दिन पूजा-अर्चना के बाद राजजात का प्रथम पड़ाव ईड़ा-बधाणी (कर्णप्रयाग नगरपालिका का हिस्सा) की ओर प्रस्थान करती है।

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