Himalaya ki Nanda Devi Yatra

उत्तर हिमालय के अधिकाषं स्थलों पर जाने वाले श्रद्धालुओं ने इस प्रकार की धार्मिक यात्रा को तीर्थ के रूप में माना है। जिसका अर्थ जीवन से पर पाना होता है। अतः प्राचीनकाल में ऐसी साहसिक और धार्मिक यात्राएं अधिकांष लोग अपने जीवन के चैथे पड़ाव में करते थे। ताकि ऐसे स्थानों पर अधिक आयु या विपरीत परिस्थितियों के कारण यदि मृत्यु भी होती है, तो मोक्ष मिल जायेगा। इसीलिए इन स्थानों को स्वार्गद्वार/स्वर्गारोहिणी और मोक्षधाम के नाम से भी जाना जाता है।

उत्तराखण्ड की विश्व प्रसिद्ध यात्रा: श्रीनंदा राजजात

उत्तराखण्ड में आयोजित होने वाली बारह बर्शों के अन्तराल में श्री नंदाराजजात आज किसी परिचय की मोहताज नहीं। मुझसे पूर्व इस विशय पर कई लेख, पुस्तकें, फोटोग्राफी, विडियो, आॅडियो, व्याख्यानमाला, गीत आदि प्रकाषित हो चुकी हैं। लेकिन मेरे मस्तिश्क में एक विचार ने उछाल लिया कि सुधि पाठकों एवं इतिहास में रूचि रखने वाले पाठकों […]

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कौन है नन्दा?

1.श्री दुर्गासप्तषती के ’’अथ मूर्तिरहस्यकम्’’ में कहा गया है- ऊँ नन्दा भगवती नाम या भविश्यति नन्दजा।स्तुता सा पूतिता भक्त्या वषीकुर्जाज्जगत्त्रयम्।।(मूर्तिसहस्यक् ष्लोक-1)ऋशि कहते हैं- राजन! नन्दा नाम की देवी जो नन्द से उत्पन्न होने वाली है, उनकी यदि भक्तिपूर्वक स्तुति और पूजा की जाय तो वे ताीनों लोकें को उपासक के अधीन कर देती है।नन्दा कौन

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प्रथम भाग

1-अनादिकाल से चली आ रही है हिमालय में तीर्थाटन की परंपरा3-प्राचीन मंदिरों के साथ प्रकृति की सुंदरता से भी होगा साक्षात्कार4-नंदादेवी ने नामकरण किया था हिमालय की चोटियों का5-नन्दा देवी और चाँदपुरगढ़ी के राजाओं का आपसी सम्बन्ध6-रहस्य, रोमांच सुन्दरता व साहस से भरी है राजजात यात्रा7-प्राकृतिक-जैव विविधता से परिचित कराती है राजयात्रा8-मानवषास्त्रीयों के लिए भी

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अनादिकाल से चली आ रही है हिमालय में तीर्थाटन की परंपरा

उत्तराखण्ड में आयोजित होने वाली बारह बर्शों के अन्तराल में श्री नंदाराजजात आज किसी परिचय की मोहताज नहीं। मुझसे पूर्व इस विशय पर कई लेख, पुस्तकें, फोटोग्राफी, विडियो, आॅडियो, व्याख्यानमाला, गीत आदि प्रकाषित हो चुकी हैं। लेकिन मेरे मस्तिश्क में एक विचार ने उछाल लिया कि सुधि पाठकों एवं इतिहास में रूचि रखने वाले पाठकों

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प्राचीन मंदिरों का दर्षन करायेगीःः नन्दा जात्रा

भाद्रपद षुक्लपक्ष (अगस्त माह) में आयोजित होने वाली विश्व की सबसे लंबी 280 कि0मी0 (200 किमी0 पैदल) धार्मिक ऐतिहासिक यात्रा षामिल होने वाले लोगों को जहाँ एक ओर पुरातात्विक महत्व के मंदिरों के दर्शन होते हैं। वहीं प्रकृति प्रेमियों को प्रकृति के अनछुए नजारों से साक्षात्कार होने का अवसर मिलता है।यात्रियों को आदिबदरी मंदिर श्रृंखला

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हिमालय की चोटियों का नामकरण है:ः नन्दा

हिमवन्त पुत्री श्रीनंदा का विवाह-संस्कार कैलाषवासी षिवजी के साथ हुआ सर्वविधित र्है। विवाह पश्चात हिमालय की चोटियों में विचरते हुए देवी ने षिव से पूछा-’’स्वामी इन बर्फीली चोटियों का नाम क्या है? षिव ने उत्तर दिया- देवी! इसे हिमालय कहते हैं। देवी ने पुनः कहा इनकी पहचान के लिए कुछ विषेश नाम होने चाहिए। तब

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प्रकृति के रहस्य-रोमांच-सुन्दरता-साहस से भरी है:ः नन्दा जात्रा

राजजात यात्रा मार्ग 280 किमी में से लगभग 200 किमी0 का पैदलपथ जितना रमणीय, सुंदर और सुखद है उतना ही विस्मयकारी, साहसिक और कठिन पहलुओं को अपने आप में संजोये है। स्थानीय समाज के लोकगीत, जागरों, पवाणों, पौराणिक कथाओं को सुनने से ही देवी का अपने मायके से ससुराल जाने का करुण जनमानस की आंखों

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प्राकृतिक-जैव विविधता से परिचित कराती है:ः नन्दा जात्रा

रंगीन देवडोलियाँ और छंतोलियां जनमानस में कोतुहल उत्पन करने के साथ-साथ अदृष्य षक्ति का भी बोध कराती है। यह यात्रा वन्यजंतु प्रेमियों, वनस्पति षास्त्रियों, भूगोलविदों तथा मानव विज्ञान से जुड़े बुद्धिजीवियों को नई खोजों के लिए अवसर प्रदान करती है। स्थानीय नर-नारियों की धार्मिक विश्वास और पवित्र गाथा के साथ एक अवस्मरणीय यात्रा भी है।नैसर्गिक

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मानवषास्त्रियों का अध्ययन केन्द्र:ः रूपकुण्ड (छाया चैरड़ी)

इस पैदल यात्रामार्ग में लगभग 17500 फीट की ऊँचाई पर स्थित रूपकुण्ड कई रहस्यों को समेटे हुए है। रूपकुण्ड आने वाले यात्रीयों के लिए कौतूहल उत्पन्न करने वाला स्थान है। इस प्राकृतिक कुण्ड के चारों ओर छितराए असाधारण नर कंकाल तथा अस्थि पंजर मानव विज्ञानवेताओं के लिए प्रकृति का निषुल्क षोध का खजाना है। रूपकुण्ड

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नन्दा का चाँदपुरगढ़ी के राजाओं से सम्बन्ध

दक्ष प्रजापति के यज्ञ में माता सती के अग्निदाह करने के बाद षिवजी द्वारा सती के मृत षरीर से मोह हुआ। देवताओं के आग्रह पर विश्णु जी ने अपने सुदर्षन चक्र से पार्थिव षरीर के टुकड़े-टुकड़े किये। सती के षरीर के टुकड़े अलग-अलग इक्यावन स्थानों पर गिरे। कलयुग में वही स्थान सिद्धपीठ कहलाते हैं।ऋशिकेषवासी राजा

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