रंगीन देवडोलियाँ और छंतोलियां जनमानस में कोतुहल उत्पन करने के साथ-साथ अदृष्य षक्ति का भी बोध कराती है। यह यात्रा वन्यजंतु प्रेमियों, वनस्पति षास्त्रियों, भूगोलविदों तथा मानव विज्ञान से जुड़े बुद्धिजीवियों को नई खोजों के लिए अवसर प्रदान करती है। स्थानीय नर-नारियों की धार्मिक विश्वास और पवित्र गाथा के साथ एक अवस्मरणीय यात्रा भी है।
नैसर्गिक सौंदर्य को समेटे हुए समूचा यात्रा मार्ग एक ओर प्रकृति प्रेमियों के आगमन में प्रतीक्षारत रहता है। वहीं नाना प्रकार के पक्षियों का कलरव, वन्य जंतुओं की मस्त-सुरीली आवाजों की आहट, कल-कल करते निरंतर बहते झरनें, नदी-नालों का मधुर-संगीत, सुन्दर मखमली बुग्याल, ऊंची-ऊंची हिमाच्छादित पर्वत चोटियाँ, नीची घाटियों में खिले दुर्लभ फूल यात्रियों को अपनी सुंदरता से रू-ब-रू होने का अवसर प्रदान करती हैं।
समूचे राजजात मार्ग पर पड़ने वाले घने जंगलों में अनेक दुर्लभ वनस्पतियां पाई जाती हैं। जिनमें ब्रह्मकमल, भोज पत्र, उत्तीस, देवदार, फण्याट, काफल, बांज, बुरांश, रिंगाल की झाड़ियाँ, बर्फ पिघलने के बाद उगने वाली छोटी-छोटी वनस्पतियां, जड़ी-बूटियां, बुग्याल हैं। इनसे निकलने वाली मधुर सुगंध यहां पहुंचने वाले यात्रियों, पर्यटकों को मदहोश कर देती है।
हिमालयी वनस्पति के अलावा दुर्लभ पशु-पक्षियों की बहुतायत भी राजजात के यात्रियों को अपनी और आकर्षित करती है। इनमें हिमालय का मोर (मोनाल) हिलांस, चकोर, तीतर, हिमालयी बटेर, जंगली मुर्गे, कस्तुरी मृग, घोरल, काखड़ व बाघ है। जिनके साक्षात दर्षन होने से यह यात्रा रोमांचकारी साबित होने में सहायक होती हैं।
