कौन है नन्दा?


1.श्री दुर्गासप्तषती के ’’अथ मूर्तिरहस्यकम्’’ में कहा गया है-
 ऊँ नन्दा भगवती नाम या भविश्यति नन्दजा।
स्तुता सा पूतिता भक्त्या वषीकुर्जाज्जगत्त्रयम्।।
(मूर्तिसहस्यक् ष्लोक-1)
ऋशि कहते हैं- राजन! नन्दा नाम की देवी जो नन्द से उत्पन्न होने वाली है, उनकी यदि भक्तिपूर्वक स्तुति और पूजा की जाय तो वे ताीनों लोकें को उपासक के अधीन कर देती है।
नन्दा कौन है? स्कन्दपुराण के मानसखण्ड के अनुसार द्वापर युग में देवकी-नन्दबाबा की सात पुत्रियों जिनका बध कंस द्वारा किया गया था, उनमें से एक कन्या नन्दा भी है। जिसका कंस द्वारा बध करते समय निकलकर योग माया से हिमालय जा पँहुची और यहीं निवास करने लगी। अतः उत्तर हिमालय के इस षिखर का नाम ’’नन्दा पर्वत’’ पड़ा।


2.श्रीमदभागवत महापुराण के श्रीमदभागवत पुराण दषम स्कंध, अध्याय-चार, ष्लोक संख्या आठ से 13 तक वर्णन है-
 तां गृहत्वा चरणयोर्जातामात्रां स्वसुः सुताम।
अपोथयच्छिलापृश्ठे स्वार्थोंन्मूलितसौहृद।।

 नंदगोपगृहे देवी यावतीर्णा हृतिन्द्रिया।
ततस्तां पूजयामास कंसबधाय देवकी।। (टीका)
उक्त ष्लोकों के अनुसार देवकी ने अपनी आठवीं संतान को गोद में छिपाकर कंस से विनति की- ’’भैया! मेरी यही एक कन्या बची है इसे मत मारो। कंस बड़ा दुश्ट था। उसने देवकी के गोद से कन्या को छीनकर ज्योंहि चट्टान पर पटकने लगा, वह कंस के हाथ से छूटकर आकाष में चली गयी। और अश्टभुजा रूप धारण किया।’’ क्योंकि वह साधारण कन्या नहीं साक्षात योगमाया आदिषक्ति थी। योगमाया ने कंस से कहा- ’’रे मूर्ख मुझे मारने से तुझे क्या मिलेगा? क्योंकि तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है। इस प्रकार योगमाया अन्र्तधान हो गई और वर्तमान भारत के अनेक स्थानों में विभिन्न नामों से प्रसिद्ध हुईं। जिनमें से ’’नन्दा’’ एक है।


3.केदारखण्ड और देवी भागवत् के अनुसार- वृत्तासुर राक्षस से तंग आकर देवता विश्णु भगवान के पास गये। विश्णु जी ने देवताओं से कहा कि तुम मेरू पर्वत पर जाकर आदिषक्ति भगवती की प्रार्थना करो। देवताओं ने वहाँ जाकर देवी को नन्दा, रक्त-दन्तिका, षाकाम्भरी, दुर्गा, भीमा और भ्रामरी नाम से स्मरण किया। यही आदिषक्ति की अंगभूता छः देवियाँ ही साक्षात मूर्तियाँ हैं। इनका स्वरूप का प्रतिपादन को दुर्गा असप्तसती में ’’अथ मूर्तिरहस्यम्’’ कहते हैं।
देवी द्वारा मधु-कैटभ, चिक्षुर, चामर, उदग्र, भिन्दिपाल, ताम्र, महिसार, सुग्रीव, असुर सेनापति धूम्रजलोचन, दैंत्यराज सेनापति रक्तबीज, षुम्भ-निषुम्भ, महादैत्य चण्ड-मुण्ड, आदि असुरों का बध करने के पश्चात देवता प्रषन्न हुए।


4.दुर्गासप्तषती के ग्यारहवें अध्याय के अनुसार देवी ने देवताओं से कहा कि आप मुझसे वरदान माँगों। तत्पष्चात देवता बोले-
सर्वबाधाप्रषमनं त्रैलोक्यस्याखिलेष्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाषनम।।
अर्थात सर्वेष्वरि तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की सारी बाधाओं को षान्त करो और हमारे षत्रुओं का नाष करती रहो। तब देवि बोली-
वैवस्वतेन्तरे प्राप्ते अश्ठाविंषतिमे युगे।
षुम्भो निषुम्भष्चैवान्यवुत्पत्स्येते महासुरौ।।
नन्दागोपगृहे जाता यषोदागर्भसम्भवा।
ततस्तौ नाषयिश्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी।।

अर्थात देवताओं वैवस्वत मंवन्तर के अठाइसवें युग में षुम्भ और निषुम्भ नाम के दो महादैत्य पैदा होंगे। तब मैं नन्द गोप के घर में उनकी पत्नी यषोदा के गर्भ से पैदा होकर, विन्घ्याचल में जाकर निवास कर, दोनों असुरों का नाष करूँगी। फिर मैं अत्यन्त भंयकर रूप से पृथ्वी पर अवतार लेकर वैप्रचित नामक दानवों का बध करूँगी।


5.श्री दुर्गाश्टोत्तर षतनाम स्त्रोतम् ( श्रीदुर्गाश्टोत्तरषतनामस्त्रोतम्) के 108 नामों के स्मरण में प्रथम नाम सती, छत्तीसवाँ नाम दक्षकन्या, सैंतीसवाँ नाम दक्ष यज्ञ विनाषनी, उनसठवें नाम निषुम्भ-षुम्भहननी, 101वाँ नाम षिवदूती तथा उत्तराखण्ड में गाये जाने वाले नन्दोळ में दक्ष प्रजापति यज्ञ, नन्दा-भोलेषंकर की हुई वार्ताओं को जोड़कर देखें तो नन्दा की महत्ता स्वतः ही सिद्ध हो जाती है।


6.शिवपुराण के अनुसार- नन्द के घर कन्या के रूप में जन्म लेने से विन्ध्याचल वासिनी स्वरूपा महालक्ष्मी का ही नाम नन्दजा अर्थात नन्दा पड़ा। षक्ति-षैलजा ने देवताओं से कहा कि मेरा ऐसा जन्म या स्वरूप जो संसार के दुखों को दूर करेगा और जनमानस आनन्दित होगा वही रूप मेरा ’’नन्दा’’ के नाम से जाना जायेगा।
षिव को प्राप्त करने के लिए पर्वतराज हिमालय की पुत्री ने नन्दा पर्वत पर तपस्या की। इसलिए इनका नाम ’’नन्दा’’ पड़ा। अर्थात नन्दा ही पार्वती है।


7.देवी भागवत पुराण के अनुसार-
ताड़कासुर के अत्याचार से अत्यन्त दुःखी होकर देवता योगमाया (आदिषक्ति) की षरण में गये। दैंत्य के अत्याचार का वृत्तान्त सुनाया। ताड़कासुर को षिवजी का वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु षिव-पुत्र द्वारा ही होगी। अन्यथा संसार में उसे कोई मारना तो दूर रहा, पराजय भी नहीं कर सकता। देवताओं की व्यथा सुनकर आदिषक्ति ने उनसे कहा ’’मैं पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लूँगी। उस जन्म में षिव प्राप्ति के लिए मैं घोर तपस्या करूँगी।’’
पर्वतराज की पुत्री के रूप में जन्म लेकर पिता की आज्ञा लेकर षिव प्राप्ति के लिए पार्वती ने घोर तपस्या की। देवता ने षिव से आग्रह किया ’’आप लोककल्याण के लिए पार्वती से पाणिग्रहण करें।’’ त्रिलोकीनाथ ने योगमाया द्वारा देवताओं को दिये गये बचन को पूर्ण करने के लिए साधनरत पार्वती से विवाह किया। षिव-पार्वती विवाहेत्तर से कार्तिकेय का जन्म हुआ। पित्र-भक्त कार्तिकेय ने ताड़कासुर का किया। ताड़कासुर बध से देवताओं के प्रषन्नचित और आनन्दित होने से पार्वती का गौरा और नन्दा नाम पड़ा।


8-ताड़कासुर बध के बाद देवताओं ने योगमाया से निवेदन किया ’’ आप लोक कल्याण और उनकी कुषलता के लिए पृथ्वी पर अवतरित होवें। देवी ने देवताओं से कहा आपकी यह इच्छा अवष्य पूर्ण होगी। द्वापरयुग में योगमाया नन्द-गोप के घर कन्या रूप में जन्म लेकर प्रकट हुई। दूसरी ओर कंस के कारागार में बन्दी देवकी के गर्भ से स्वयं विश्णु ने जन्म लिया। योगमाया ने बसुदेव से कहा ’’अपने इस जन्मे षिषु को रातों-रात गोकुल में यषोदा-नन्दबाबा के घर पहुँचाओ। और वहाँ से मुझे (कन्या) ले आओ।’’
प्रातःकाल कंस दरबार में खबर आई कि उसकी बहिन देवकी का आठवाँ षिषु ने जन्म ले लिया। उसी क्षण कंस ने उस नवजात को द्वारपालों से मंगाया। द्वारपालों ने कन्या को लाकर कंस को सौंपा। ज्यों ही कंस उस कन्या को मारने के लिए पत्थर पर पटकने लगा तो योगमाया स्वरूपा वह कन्या कंस के हाथ से छिटक कर आकाष में उड़ गई। योगमाया ने आकाषवाणी की हे! राजन तुम्हें मारने वाला जन्म ले चुका है। अब तुम्हारी मृत्यु निष्चित है।
कंस ने पूर्व में जिन छः कन्याओं का बध किया था उन सहित योगमाया एक पर्वत पर निवास करने लगी। इसीलिए इस स्थान का नाम ’’सतपुड़ा’’ पड़ा। इन देवियों के नाम इस प्रकार हैं- पीताम्बरादेवी, मयरदेवी, ललितादेवी, विद्यादेवी, आलोकी देवी आदि हैं।


9-विष्णुपुराण के अनुसार- देवकी-बसुदेव की आठवीं सन्तान को जब कंस मारने लगता है तो योगमाया द्वारा आकाषवाणी होती है तेरा बध करने वाला तेरी कारागार से मुक्त हो चुका है। तब कंस हतप्रद होता है कि इतनी कड़ी सुरक्षा के बाद भी वह कारागार से बाहर कैसे चले गया। कंस उस कन्या को अनायास ही छोड़कर कारागार की ओर भागता है। और योगमाया अन्र्तध्यान हो जाती है।

कपिलमुनि के सांख्यदर्षन के अनुसार-ब्रह्मा पुरूश हैं और प्रकृति आदिषक्ति अर्थात योगामाया है। प्रकृति हमारा पालन करती है। अर्थात ’’पुरूश’’ षिव तथा ’’प्रकृति’’ पार्वती है। प्रकृति ही संसार को सुख एवं समृद्धि प्रदान करती है। पुरूश का सच्चा मित्र प्रकृति ही है। प्रकृति के इस अनूठे सहयोग से सभी जनमानस आनन्दित होते हैं। इस आनन्दा स्वरूपा प्रकृति का दूसरा नाम ’’नन्दा’’ है। प्रकृति ने हमें रोग भी दिये हैं तो उनके निवारण के लिए उपचार भी। अतः निरोग होने पर हम आनन्दित होते हैं। और उस आदिषक्ति माया का साधुवाद करते हैं।


10-ब्रह्मा के कष्यप, कष्यप के सूर्य, सूर्य के पुत्र मनु हुए हैं। विषेश ध्यान देने वाली बात यह है कि राजा मनु सूर्य के मानसपुत्र हैं। मनु स्वयंभू हैं। जिनकी उत्पति बिना माता के हुई है। इन्हीं मनु ने योगमाया की तपस्या की। योगमाया ने प्रसन्न होकर कहा- ’’मैं हिमालय पर्वत पर निवास करते हुए मनुश्यों के दुःखों का हरण करने के लिए राक्षसों का बध करूँगी। इससे खुष होकर जनमानस आनन्दित होगा। अतः अतः उसी आनन्दित करने वाली देवी का नाम ’’नन्दा’’ (पार्वती) होगा।’’


11- उत्तराखण्ड में गाये जाने वाले लोकगीतों और पवाड़ों में नन्दा की सात बहिनों का उल्लेख आता है। इसके अलावा इसका प्रमाण होमकुण्ड में स्थित सात-षिलाओं के रूप में देवियाँ विराजमान है। जिसके पिछे जनश्रुतियाँ हैं नन्दा की कैलाष विदाई के लिए उनकी सातों बहिनें इस स्थान तक आती हैं।
नन्दा षब्द की उत्पति
’’नन्दा’’ षब्द की उत्पति के सम्बन्ध में मुझसे पूर्व अनेक प्रसिद्ध लेखकों और विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किये हैं। परन्तु कुछ लेखकों का मत है ’’नन्दा षब्द’’ पाँचवीं या छटवीं षताब्दी में अस्तित्व में आया। जो कि सरासर गलत एवं तथ्यहीन है। भले ही युग परिवर्तन के साथ अलग-अलग षासकों एवं वंषों ने नन्दा को अपनी संस्कृति और भाशा में परिभाशित किया है। जैसे कुशाणकाल में ’’नना’’ वृहत्संहिता में ’’नंषा’’ आदि नाम से उच्चारित किया।
दुर्गाषप्तषती के एकादष पाठ के इकतालीसवें से पचपनवें ष्लोक में देवी के विभिन्न षक्तियों का वर्णन है। जिसके अनुसार देवी ने देवताओं से कहा- जब-जब तीनों लोकों में दुश्टआत्माओं द्वारा बाधाएं उत्पन्न की जायेगीं तब षत्रुओं के विनाष के लिए मैं विध्यवासिनी, रक्तदन्तिका, अयोनिजा, षताक्षी, षाकाम्बरी, दुर्गादेवी, भीमा, भ्रामरी (शड् पदं भ्रामरी) आदि नाम से जन्म लूँगी। अतः मैं भीमा रूप धारण करके ऋशि-मुनियों की रक्षा और हिमालय पर्वत पर उत्पात एवं षान्ति भंग करने वाले राक्षसों का भक्षण करूँगी।
भीमा देवेती ख्यातं तन्मे नाम भविश्यति।
यदारूणा ख्यस्त्रैलोक्यं महाबाधां करश्यति।।
मत्स्यपुराण में धर्म-कामार्थ के तेरहवें अध्याय में लिख गया है ’’दक्ष प्रजापति यज्ञ में सती द्वारा अपने पति षिव को निमन्त्रण नहीं दिये जाने और पिता द्वारा अमंगलकारी कहे जाने पर पिता से क्रोधित होकर देवी ने योगबल से अपने षरीर को भस्म कर दिया।’’ यज्ञ विध्वषं एवं देवी श्राप से मुक्त होने के लिए दक्ष ने देवी से विनती की। देवी ने कहा मैं भविश्य में 108 नामों से अलग-अलग पीठों में अवतरित होऊँगी। तब जो मनुश्य मेरे नामों का श्रवण मात्र या इन पीठों में से किसी भी पीठ का दर्षन करेगा, वह अपने निखिल पापों से मुक्त हो जायेगा।
उन्हीं 108 नामों में प्रमुख-हिमवन्त प्रदेष में नन्दा, कालिज्जरगिरी पर्वत पर काली, हिमगिरी पर भीमा, विनायकतीर्थ में उमा, बदरीवन में उर्वषी के नाम से उत्पन्न होऊँगी।

अतः नन्दा को अब चाहे कृश्ण-बलराम भगिनी या ऋशियों की तारणहार या फिर हिमालय-नैना पुत्री गौरा, उमा, महिशमर्दिनी आदि देवी मानें तो नन्दा षब्द पांचवीं सदी का हो ही नहीं सकता है। अपितु यह अति प्राचीन है। जिसका षीधा सम्बन्ध सतयुग एवं द्वापर युग से है।

अतः कुछ विदेषी लेखकों एवं भ्रमणकारियों के कथनानुसार नन्दा षब्द की उत्पति पाँचवी-छठवीं सदी के आसपास मानना नितान्त गलत है। दूसरे में यहाँ गाये जाने वाले पार्वती-नन्दा के नन्दोळ, पैरी, जागरों एवं लोकगीतों को झुठलाया नहीं जा सकता है। जागर आज भी हिमालय की संस्कृति को जानने के बड़े स्रोत हैं। इस दिषा में सम्बन्धित जागरों, नन्दोळ, दन्त कथाओं, किवदन्तियों का अभी आगे भी बारीकी से अध्ययन करने की आवष्यकता है।
गढ़-कुमायूँ के इतिहास में अंग्रेज विद्वानों एवं उनके सहयोगियों का योगदान अवस्मरणीय है। लेकिन वे जिस-जिस मार्ग से गये उनके द्वारा उतना ही वर्णन किया गया। जबकि पहाड़ के सम्बन्ध में स्पश्ट कहावत है कि-
 ’’कोश-कोश पर बदले पानी,
चार कोश पर बदले वानी’’।
 ’’धारा पिछने कन-कना छिन’’।
हिमालय में निवास करने वाले लोगों ने इन षक्तियों को अपने निकटस्थ समझकर उन्हें कभी माँ, तो कभी बहिन, तो कभी बेटी, तो कभी आदिषक्ति के रूप में पुकारा एवं पूजा है।

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