Himalaya ki Nanda Devi Yatra

उत्तर हिमालय के अधिकाषं स्थलों पर जाने वाले श्रद्धालुओं ने इस प्रकार की धार्मिक यात्रा को तीर्थ के रूप में माना है। जिसका अर्थ जीवन से पर पाना होता है। अतः प्राचीनकाल में ऐसी साहसिक और धार्मिक यात्राएं अधिकांष लोग अपने जीवन के चैथे पड़ाव में करते थे। ताकि ऐसे स्थानों पर अधिक आयु या विपरीत परिस्थितियों के कारण यदि मृत्यु भी होती है, तो मोक्ष मिल जायेगा। इसीलिए इन स्थानों को स्वार्गद्वार/स्वर्गारोहिणी और मोक्षधाम के नाम से भी जाना जाता है।

अठवाँ पड़ाव- चेपड़यूँ

यात्रा मार्ग- कुलसारी से थराली (बधाण) होते हुए चेपड़यूँ में विश्रामचेपड्यूँ थराली के समीप पिण्डर की नदी वेदिका पर समुद्रतल से 1165 मीटर की ऊँचाई पर अवस्थित है। राजजात यात्रा कुलसारी से चलकर थराली बाजार- केदारबगड़- राड़ीबगड़ होते हुए चेपड्यूँ के थोकदारों के गाँव पँहुचती है। यह यात्रा का सबसे कम मात्र 6 किमी दूरी […]

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नौवाँ पड़ाव- नन्दकेषरी

यात्रा मार्ग- चेपड़यूँ से राजजात और कुरूड़ की राजराजेष्वरी प्रस्थान करते हुए ऊनी-दानूचैड़- चिड़िगा पुल होते हुए नन्दकेषरी में विश्रामसमुद्रतल से ऊँचाई 1350 मीटर पिण्डर नदी की तलहटी में बसा यह स्थान देवी का कोई पारम्परिक पड़ाव नहीं था। सन् 2000 में आयोजित जात के समय होमकुण्ड में नन्दाश्ठमी एवं नवमी षुभलग्न की पूजा हेतु

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दसवाँ पड़ाव- फल्दियागाँव

यात्रा मार्ग- नन्दकेषरी से पूर्णा-देवाल-देवलसारी-भेंकलझाड़ी-अलंगड़ागाँव- हाटकल्याणी होते हुए फल्दियागाँव में विश्रामफल्दियागाँव समुद्रतल से 1480 मीटर तथा इस क्षेत्र के मुख्य बाजार देवाल1218 मीटर की ऊँचाई पर स्थित हैं। नंदकेशरी से आगे रास्ते में पूर्णगांव पड़ता है। गांव के नीचे बड़े सेरे हैं, जिसे ’’पूर्णा का सेरा’’ कहते है।स्थानीय मान्यता के अनुसार- महिशासुर राक्षस ने देवी

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ग्यारहवाँ पड़ाव- मुन्दोली ल्वाजंग

यात्रा मार्ग- फल्दियागाँव से प्रस्थान कर तिलफाड़ा-ल्वाणी-कोलानी-पडियारगाँव होते हुए मुन्दोली में विश्रामसमुद्रतल से 1750 मीटर ऊँचाई पर मुन्दोली सुगमित आवागमन की दृश्टि से अन्तिम स्थान हैं। यहाँ से ठण्डी का अहसास आरम्भ हो जाता है। फल्दिया गांव से आगे पिलफाड़ा है। इस स्थान में देवी ने ’’पिल्हवा’’ नामक दैत्य का संहार किया गया था। मंदिर

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बारहवाँ पड़ाव- वाण

12-बारहवाँ पड़ाव- वाणयात्रा मार्ग- मुन्दोली से प्रस्थान कर लोहाजंग-ल्वालिंग-देवी चबूतरा होते हुए वाण में विश्रामसमुद्रतल से ऊँचाई-2450 मी0 की ऊँचाई में नीलगंगा और कैलगंगा के मध्य वाण गाँव अपने में कई प्राकृतिक, नैसर्गिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं को समेटे हुए है। यहाँ से हाड-मांस कंपकपा देने वाली ठण्ड आरम्भ होती है। इसलिए बर्शभर गरम कपड़े एवं

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तेरहवाँ पड़ाव- गैरोली पातल

यात्रा मार्ग- वाण से प्रस्थान कर लाटू देवता मन्दिर-रिणकीधार- कैलगंगा- द्वाणीग्वेर-जौलधारा होते हुए गैरोली पातल में विश्रामसमुद्रतल से 3021 मीटर पर स्थित गैरोली-पातल खुले वायुमण्डल में आसमान को छूती हुई हरी-भरी और बर्फ से लगदक चोटियाँ देखने को मिलती हैं। समस्त छंतोली-डोलियाँ, चैसिंग्या खाडू और यात्री लाटू की ’’अग्वानी’’ में रणकाधार होते हुए नीलगंगा पार

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चैदहवाँ पड़ाव- बेदनी बुग्याल

यात्रा मार्ग- गैरोलीपातल से वैतरणी-वेदनीकुण्ड-वेदनीबुग्याल में विश्रामसन् 2014 में नन्दा अश्टमी का दिन आगे होने के कारण गैरोली पातल को पड़ाव बनाया गया था। गैरोली पातल से वेदनीकुण्ड सबसे कब दूरी वाला यात्रा पड़ाव बन गया था। वैतरणी कुंड में पित्र-तर्पण करने की परम्पराबेदनी कुण्ड को बैतरणी कुण्ड भी कहते हैं। यहाँ पर राजकुँवरों द्वारा

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पंद्रहवें पड़ाव- पातर नचैण्याँ

यात्रा मार्ग-बेदनी बुग्याल से प्रस्थान कर निरालीधार (पातर नचैणियाँ) में विश्रामपातर नचैणियाँ- समुद्रतल से ऊँचाई 3650 मीटर स्थित है। राजजात यहाँ के ढलानों पर छितरी-पतली पगडंडियों और गहरी घाटियों के बाद अब आकाश छूती बर्फीली पर्वत चोटियों से घिरे दूर-दूर तक पसरे मखमली बुग्यालों में प्रवेष करती है। वेदनी से आगे पत्थरों के गोल घेरे

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सोलहवें पड़ाव- षिलासमुद्र

यात्रा मार्ग- पातरनचैणियाँ से कैलविनायक-बगुवावासा-स्वेलफड़ा-छीड़ीनाग- रूपकुण्ड- ज्यूँरागली धार होते हुए षिलासमुद्र में विश्रामषिलासमुद्र की समुद्रतल ऊँचाई 4000 मीटर ऊँचाई है। सम्पूर्ण यात्रामार्ग का सबसे अधिक प्राकृतिक बाधा और अति संवेदनषील वाल पथ है। मानव जीवन के षत-प्रतिषत प्रतिकूल जलवायु वाला भाग है। जिनके नामों पर ही गौर करें तो अर्थ स्पश्ट हो जायेगा। अनुपम महिमा

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सत्रहवां पड़ाव- चन्दनियाघट (वापसी)

षिलासमुद्र से धोपियाधार-होमकुण्ड में राजयात्रा का विसर्जन-इसी दिन-जामणडाली होते हुए चन्दनियाघट में विश्रामचन्दनियाघट समुद्रतल से ऊँचाई- 3700 मीटर पर स्थित है। षिलासमुद्र से प्रातः राजयात्री चलकर दुर्गम पहाड़ी ढ़लानों को पार करने के पश्चात् राजजात नवमी (संवत भाद्रपद षुक्ल पक्ष) को दोपहर तक होमकुण्ड पहुँचती है। षिलासमुद्र से होमकुण्ड मार्ग में ’’घी-थोपड़िया’’ देवी षिला है।

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