यात्रा मार्ग- पातरनचैणियाँ से कैलविनायक-बगुवावासा-स्वेलफड़ा-छीड़ीनाग- रूपकुण्ड- ज्यूँरागली धार होते हुए षिलासमुद्र में विश्राम
षिलासमुद्र की समुद्रतल ऊँचाई 4000 मीटर ऊँचाई है। सम्पूर्ण यात्रामार्ग का सबसे अधिक प्राकृतिक बाधा और अति संवेदनषील वाल पथ है। मानव जीवन के षत-प्रतिषत प्रतिकूल जलवायु वाला भाग है। जिनके नामों पर ही गौर करें तो अर्थ स्पश्ट हो जायेगा। अनुपम महिमा वाला, रूपकुण्ड, छीड़ीनाग अर्थात सर्प जैसा खतरनाक आकृति, बगुवावासा यानि बाघ (षेर) भगवती के वाहन का निवास स्थान, ज्यूँरागली (यमराज के यहाँ जाने का मार्ग), षिलासमुद्र अर्थात जिसका निर्माण हिम षिलाओं हुआ है।
छीड़ियानाग- अर्थात सर्पीलाकार और नंगी चट्टानों से निर्मित खतरनाक आकृति वाला भू-भाग और यात्रा मार्ग है। जहाँ सामान्य मानव को जाना तो दूर और देखना मात्र से ही भय उत्पन्न हो जाता है ।
बागुवावासा- ’बागु’ का अर्थ बाघ या षेर और ’वासा’ का अर्थ निवास स्थान। अर्थात ऐसा जहाँ माँ भगवती का वाहन ’षेर’ का निवास रहता है।
स्वेलफड़ा या स्वेलड़ा- अर्थात गर्भस्थ स्त्री का प्रसव (षिषु जन्म) के बाद स्नान करने की जगह। गंगतौली गुफा में रानी बलभ्भा का प्रसव होने से इसका नाम स्वेलड़ा पड़ा। एक मान्यता के अनुसार प्रचण्ड तूफानी हवा चलने से बलभ्भा के प्रसूति में उपयोग की गई सूखी घास (अब धान की पराली) उड़कर नन्दाकिनी नदी में गिरी जिससे नदी का जल अपवित्र हो गया। इसीलिए नदी का जल पूजा आदि में निसिद्ध है।
रहस्य और रोमांस का प्रतीक:ः रूपकुण्ड
समुद्रतल से ऊँचाई 5029 मीटर (16500 फीट)
रूपकुण्ड की महिमा- रूपकुण्ड के सहस्य से दो कहानियाँ जुड़ी हैं-
एक- षिव-पार्वती विवाह के पश्चात दोनों इस मार्ग से षिवधाम कैलाष जा रहे थे। इस स्थान में पार्वती को प्यास लगी। माँ पार्वती की प्यास बुझाने के लिए षंकर ने अपने त्रिषूल से भूमि पर प्रहार कर जलकुण्ड की उत्पति की। देवी द्वारा जलग्रहण करने के साथ अपना रूप श्रृंगार किया। इसीलिए रूपकुण्ड नाम पड़ा।
दूसरी- दैंत्यों के संहार करने के पश्चात कैलाष जाते समय पार्वती ने स्नान करने लिए षंकर से जल की अभिलाशा की। षंकर ने त्रिषूल से भूमि पर प्रहार कर जलकुण्ड की उत्पति की। देवी द्वारा स्नान करने के बाद अपना रूप श्रृंगार किया। इसीलिए रूपकुण्ड नाम पड़ा।
आखिर ये असामान्य कंकाल किसके हैं ?
लगभग 12 मीटर लंबी और 10 मीटर चैड़ी हिमकुण्ड के चारों ओर बिखरे मानव अस्थिपंजर जो सामान्य मानव षरीर से अधिक लम्बे-चैड़े हैं। रूपकुण्ड तीर्थाटकों, खोजी पत्रकारों, षोधार्थियों, इतिहास विद्ों, मानव वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल का केन्द्र है। आखिर ये असामान्य कंकाल किसके हैं ? ऐसा नहीं कि इससे पूर्व इन नर-कंकालों का अध्ययन नहीं हुआ हो। परन्तु अभी और भी स्पश्ट अध्ययन की आवष्यकता है।
सन् 1907 में लौंगस्टाफ ने त्रिशूली तक भ्रमण अभियान किया था। उन्होने अपने संस्मरण में रूपकुंड के पास बिखरे अस्थि पंजरों व जूतों आदि का विस्तार से उल्लेख किया था।
सन् 1942 में वन विभाग के अधिकारी श्री मधवाल ने इस क्षेत्र का भ्रमण कर लोगों को जानकारी दी है कि रूपकुंड के आस-पास कई सैनिकों के षव बिखरे हैं। उस समय प्रारंभिक अनुमान लगाया गया था कि ये मृत षरीर सिख समुदाय के जोराबर सिंह की सेना के हैं।
सन् 1831 तक धर्मानुरागी लोग मोक्ष की प्राप्ति के लिए स्वर्गारोहिणी की यात्रा पर आकर अपने प्राणों का उत्सर्ग करने की दृश्टि से आते थे, उसी प्रकार ज्यूरांगली (मौत की गली) तक आकर स्वर्ग की इच्छा के लिए तपकर षरीर त्याग दिया जाता था।
सन् 1956 में स्वामी प्रणवानन्द कैलाश मानसरोवर के बारे में ऐतिहासिक तथ्य संकलित करने दो माह तक रूपकुंड में रहकर मानव अस्थियों का अध्ययन किया। स्वामी जी ने पुरुष-स्त्रियों के अस्थिपंजरों के मांसयुक्त एक जांघ, एक युवती की त्रिजटा, केशों का एक जूड़ा, चमड़े के चप्पल, रंग-बिरंगे मीनादार चूड़ियांे के टुकडे़, लकड़ी के बर्तन अवषेश, लोहे के घंटे, भोजपत्र की छंतोली आदि वस्तुएं एकत्र की। प्रणवानंद स्वामी ने इन वस्तुओं का गहन अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला कि रूपकुंड के आस-पास बिखरे अस्थिपंजर किसी सेना के नहीं हो सकते, क्योंकि यहाँ किसी भी प्रकार की युद्ध सामग्री नहीं मिली। स्वामी प्रणवानंद ने ग्यारह बार हिमालय की यात्रा की।
लखनऊ विश्वविद्यालय के एंथ्रोपोलोजी विभाग के अध्यक्ष डी0एन0 मजूमदार ने अमेरिकी मानव षरीर विशेषज्ञ डा0 गिफन के सहयोग से इन हड्डियों का रेडियो कार्बन डेटिंग करवाई गई। परीक्षण की रिपोर्ट से पता चला कि यहाँ बिखरी मानव अस्थियाँ 400 से 600 वर्ष पुरानी हैं।
स्थानीय जागरों व ताम्रपत्रों के अध्ययन से पता चलता है यह नर-कंकाल कन्नौज के राजा यशोधवन के परिवार, दास-दासियों और यात्रियों के षरीर हैं। इनकी संख्या करीब 300 है। इन मृत षरीरों की हड्डियाँ सामान्य से कुछ बड़ी हैं। अतः वह यात्री दल स्थानीय जनमानस या सैनिकों का नहीं था। नंदादेवी के जागरों में भी चांदपुर गढ़ी के राजा के दामाद जसधवल (यशोधवल) व पुत्री बल्लभा का राजजात में आने और रूपकुंड के ऊपर ज्यूंरागली में भारी हिमपात से दबकर मरने का वर्णन मिलता है।
ब्रिटिश षासन से पहले नन्दा राजजात में बलि देने की प्रथा का वर्णन मिलता है। परन्तु अब प्रतिबन्धित हो चुका है। बहरहाल देश-विदेश के तीर्थ-यात्रियों व पर्यटकों को बारह बर्शों के अन्तराल में रूपकुण्ड में पँहुचने का अवसर मिलता है।
जात-जात्राएं या यात्राएं भारतीय संस्कृति के ऐसे सोपान रहे हैं जो लोगों को जोड़ने और एक-दूसरे को निकट लाकर जानने-समझने का अवसर प्रदान करते हैं। हिमालय क्षेत्र के संदर्भ में ’’श्री नंदादेवी राजजात’’ ऐसी ही ऐतिहासिक यात्रा हैं।
यमराज की गली:ः ज्यूँरागलीधार
समुद्रतल ऊँचाई 4800 मी0
ज्यूँरागली का अर्थ यमराज के यहाँ जाने का मार्ग से है। पातरनचैणिंयां से ज्यूँरागलीधार तक का यात्रा मार्ग सबसे विशम भौगोलिक और खड़ी चढ़ाई वाला है। जैसे कि छिड़ियानाग, ज्यूँरागलीधार के नाम से आभास हो जाता है यह सबसे खतरनाक वाला स्थान है। स्थानीय बोली में ज्यूँरागली का अर्थ है यमराज की गली। अर्थात पाप और पुण्य का लेखा-जोखा का पता चलता है। रूपकण्ड आगे इस खड़ी चट्टान पर यदि कोई अनहोनी घटना हो गई तो उसका नामों-निषान मिल पाना असम्भव है। यहाँ से षिलासमुद्र तक हल्की ढलान से यात्रा गुजरती है।
ज्यूँरागली का रक्षक: लाटू देवता
वाण से लाटूदेवता ही राजजात का पथप्रदर्षक रहता हेै। जिसके सम्बन्ध में पूर्व में विस्तृत वर्णन किया जा चुका है। परन्तु ज्यूँरागली के पूर्व वाले छोर पर प्रत्येक राजजाती लाटू के पश्वा को समौण (भेंट) के रूप में एक रूपया देता है। इसके मुख्य उद्ेष्य राजजात में कितने श्रद्धालु सम्मिलित हुए हैं की गिनती करने का एक माध्यम था। यह परम्परा आज भी कायम है।
षिलासमुद्र-
समुद्रतल से ऊँचाई- 4050 मीटर
षिलासमुद्र नन्दाघुंघटी और त्रिषूल पर्वत के तलहटी पर है। यह झील ग्लेषियर के ऊपर है। जिसका क्षेत्रफल लगभग 09 वर्ग किमी है । जिसका निर्माण हिम षिलाओं हुआ है। यह ग्लेषियर पिघल रहा है। ग्लेषियन के नीचे दो हिमगह्यर (छेद) बन हैं। सन् 2000 की तुलना में सन् 2014 में हिमगह्यरों का आकार बढ़ गया था। सन् 2013 केदारनाथ आपदा के बाद भू-विज्ञान षोध संस्थान देहरादून लगातार इन हिम झीलों का अध्ययन कर रहा है।
पिघलते ग्लेषियर:ः प्रत्यक्षम् किम प्रमाणम्
07 फरवरी 2023 में तपोवन रैणी के ऋशिगंगा के ग्लेषियर में भी ऐसे ही छेद का निर्माण हुआ था। 04 अगस्त सन् 2025 को उत्तरकाषी के धराली में बादल फटने के बाद आई आपदा प्रमाण है। इसलिए इन धार्मिक यात्राओं के समय षिलासमुद्र ग्लेषियर पर मानव दबाव कम करना होगा।
