सत्रहवां पड़ाव- चन्दनियाघट (वापसी)

षिलासमुद्र से धोपियाधार-होमकुण्ड में राजयात्रा का विसर्जन-इसी दिन-जामणडाली होते हुए चन्दनियाघट में विश्राम
चन्दनियाघट समुद्रतल से ऊँचाई- 3700 मीटर पर स्थित है। षिलासमुद्र से प्रातः राजयात्री चलकर दुर्गम पहाड़ी ढ़लानों को पार करने के पश्चात् राजजात नवमी (संवत भाद्रपद षुक्ल पक्ष) को दोपहर तक होमकुण्ड पहुँचती है। षिलासमुद्र से होमकुण्ड मार्ग में ’’घी-थोपड़िया’’ देवी षिला है। यात्रीदल षिला के चारों समान दूरी पर रेखा (मार्क) खींचकर खड़े होते हैं। यात्री देवी षिला पर घी के ढिण्डे (गोले) बनाकर फेंकते हैं। जिसका घी-ढिण्डा षिला पर चिपकता उसका विजय घोश करते हैं। जिसका नहीं चिपकेगा वह अगले जन्म में वर्णषंकर जाति में पैदा होगा। यह केवल कौतुहल और ठिठौली मात्र के लिए है। यहाँ चारों ओर घना कोहरा फैले होने से सुबह-दोपहर-सांय का अन्तर महसूस नहीं होता है। यात्री घीथोपिया से आगे बढ़कर नन्दा घुघंटी और त्रिशूली की तलहटी पर स्थित होमकुण्ड पँहुचते हैं।

होमकुण्ड में छंतोली विसर्जन और चैसिंग्या खाडू विदाई
समुद्रतल से ऊँचाई-4100 मी0
यहाँ विशाल शिला पर हवनकुण्ड और देवी-श्रीयंत्र उकेरा है। राजजात में आई सभी छतोलियों को कतार में रखते हैं। सभी छंतोलियों के मध्य में राज छंतोली और नन्दा का अग्वानी चैसिंग्या खाडू को रखते हैं। नन्दा के धर्म-भाई द्यौसिंह-भौसिंग के ’’पश्वा’’ पास में जौंलधारा (जलधारा) से जल-कलष भरकर लाते हैं। होमकुण्ड में पूजा व्यवस्था की जिम्मेदारी वाण के लाटू और सुतोल के द्यौसिंग -भौसिंग की है।
होमकुण्ड में राजगुरू नौटियाल द्वारा राजकुँवर के हाथों से क्रमषः होम पूजा, यज्ञ, छांतोली विर्सजन पूजा, चैसिग्यां खाडू की विदाई पूजा करते हैं। लाटू, द्यौसिंग -भौसिंग के पश्वा द्वारा भोजपत्र से बनी छंतोली का प्रसाद वितरण और आर्षीवाद मिलता है। चैसिंग्या खाडू को वस्त्र आभूशण, श्रृगांर से सजाते हैं। तत्पष्चात उसकी पीठ के कंवरच्या (सामान ढोने का विषेश थैला) में साथ लाई सामग्री चूड़ा, आरसा, ब्यूड़ा, कौंणी के खाजा, ककड़ी, मुगरी, दाणिम, आदि वस्तुएं रखकर त्रिषूली पर्वत की ओर भेजते हैं और वह षिवधाम को चला जाता है। होमकुण्ड में पूजा के बाद 280 किमी लम्बी ’’सचल राजजात यात्रा’’ का सबसे मुख्य उद्देष्य पूर्ण हो जाता है।

होमकुण्ड से वापस राजजात यात्रा
कुरूड़ की राजराजेष्वरी मार्ग- कुरूड़ की डोली पुनः षिलासमुद्र-ज्यूँरागली- रूपकुण्ड- बगुवाबासा-पातरनचैंणियां-बेदनीकुण्ड-वाण-मुन्दोली-फल्दियागाँव- नन्दकेषरी होते हुए वापस कुरूड़ नहीं जाती है। अपितु अपने दूसरे थान देवराड़ा जाती है। यहाँ छः माह तक विराजती है। इसका वर्णन पूर्व में किया जा चुका है।
राजयात्रियों का मार्ग- नवमी के दिन ही राजयात्री होमकुंड से वापसी कर जामणडाली (चंदनियाघट) के घने जंगल में विश्राम करते हैं। यह राजजात का सोलहवाँ और छांतोली-विसर्जन के बाद वापसी का पड़ाव है।

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