दसवाँ पड़ाव- फल्दियागाँव

यात्रा मार्ग- नन्दकेषरी से पूर्णा-देवाल-देवलसारी-भेंकलझाड़ी-अलंगड़ागाँव- हाटकल्याणी होते हुए फल्दियागाँव में विश्राम
फल्दियागाँव समुद्रतल से 1480 मीटर तथा इस क्षेत्र के मुख्य बाजार देवाल1218 मीटर की ऊँचाई पर स्थित हैं। नंदकेशरी से आगे रास्ते में पूर्णगांव पड़ता है। गांव के नीचे बड़े सेरे हैं, जिसे ’’पूर्णा का सेरा’’ कहते है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार- महिशासुर राक्षस ने देवी को मारने हेतु उनका पीछा किया तो वह नंदकेशरी से चलते-चलते इन पूर्णा के सेरों में पहुंची। देवी खड़ी गेहूं की फसल में उलझ कर वह गिर पड़ीं। गिरते वक्त उनके हाथ में कुछ गेहंू के दाने आए। गेहूँ के दाने पूर्णा के सेरों में बिखेर दिए और क्रोध में आकर गेहूं फसल को श्राप दे दिया ’’आज से इस सेरे से तू निर्विज हो जाएगी। यानि पूर्णा सेरे में कभी भी गेहूं नहीं जमेगें। तब से यहाँ गेहूँ की खेती नहीं जमती। इसलिए आज भी यज्ञ-पूर्णाहूति में गेंहूँ वर्जित है। देवी तब एक हरी-भरी कुंज की झाड़ी के पीछे छिपी थीं। उसे नंदा ने वरदान दिया कि वह हमेशा हरी-भरी रहेगी और मेरे पूजा कार्य में तेरा उपयोग होगा। कुंज की झाड़ी सदैव हरी-भरी रहती है। यहीं पर कुछ दूरी पर षिव का देवालय अर्थात देवाल है। यहाँ पत्थर की प्राचीन मूर्तियाँ आकर्शण का केन्द्र हैं।
यात्रा में आगे फल्दियागाँव चैदह सयानों में प्रसिद्ध परिहार जाति के थोकदारों का है। देवी का यह पड़ाव भी थराली-मुन्दोली-वाण सड़कमार्ग से सटा है। फल्दियागाँव में विभिन्न स्थानों से आई हुई देवी-देवताओं के श्रद्धालु नंदादेवी राजजात में षामिल होते हैं। फलस्वरूप यहाँ पर देवी-यात्रियों की संख्या का दबाव बढ़ जाता है।
फल्दियागाँव में रेवाती देवता, गुल्लमोहर, कालीमन्दिर, लाटू, मदनदानू, पडियार देवता, गोरिल आदि षिवस्वरूप के मन्दिर हैं। जिनमें अधिकाषं पाशाण युगीन की मूर्तियाँ हैं।

यहाँ से आगे सम्पूर्ण पूजा का दायित्व कुनियाल ब्राह्मणों का है। मार्ग में मालगाड़गाँव, इच्छोली, सिलखोला, असंग, सिमार, उलंग्रा, बामणसेरा श्रद्धाभाव से यात्रियों का स्वागत करते हैं। बदियाकोट बागेष्वर से आई नन्दादेवी की डोली देवाल में षामिल होती है। बागेष्वर से आये हजारों श्रद्धालु विभिन्न रंग-विरंगी पोशाक के साथ आकर्शक नृत्य करते हैं। बदियाकोट से आने वाला यात्रा पथ के पड़ाव इस प्रकार हैं-

बदियाकोट (बागेष्वर) की नन्दादेवी मिलन: देवाल षिवालय
क्र0
सं0 देव डोली का नाम कहाँ से आगमन
1 बदियाकोट बागेष्वर की नन्दा बदियाकोट

बदियाकोट यात्रा मार्ग
बदियाकोट-किलपाड़ा-झालिया-हरमल-मेलखेत-चैण्ड-बजाई-रैन-पदमल्ला-देवसारी-पूर्णा का सेरा होते हुए देवाल में मिलन करती है। बदियाकोट में माँ आदिबद्री भगवती का मन्दिर मिला है।

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