नौवाँ पड़ाव- नन्दकेषरी

यात्रा मार्ग- चेपड़यूँ से राजजात और कुरूड़ की राजराजेष्वरी प्रस्थान करते हुए ऊनी-दानूचैड़- चिड़िगा पुल होते हुए नन्दकेषरी में विश्राम
समुद्रतल से ऊँचाई 1350 मीटर पिण्डर नदी की तलहटी में बसा यह स्थान देवी का कोई पारम्परिक पड़ाव नहीं था। सन् 2000 में आयोजित जात के समय होमकुण्ड में नन्दाश्ठमी एवं नवमी षुभलग्न की पूजा हेतु एक दिन यात्रा का यहीं पड़ाव बनाना पड़ा। परन्तु इस देवस्थान का अपने में बहुत बड़ा फलदायी महत्व है। यहाँ भूमियाल क्षेत्रपाल, नंदा, शिव, 64 काली, अष्ट भैरव का मंदिर और बाबाओं की 16 समाधियां हैं। यहां स्थित सुराही के वृक्ष के साथ पांच अन्य वृक्ष एक ही वृक्ष के तने पर फल-फूलने जैसी आश्चर्य जनक दृष्य भी देखने को मिलता है। यहाँ पर कई डोलियों के मिलन के समय आसपास के गाँव बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं।

 नन्दकेषरी का नामकरण
एक बार कैलाश जाते समय नंदा के केश सुराही वृक्ष पर उलझ गए थे। देवी द्वारा शिव को याद करने पर शिव प्रकट हो गये। मगर सुराईं वृक्ष भेद में आने के कारण वे पेड़ को छू नहीं कर पाए। तब शिव ने अपने गण भैरव को याद किया। षिवगण-भैरव प्रकट हुए और सुराईं-वृक्ष में उलझे नंदा के केषों को अलग किया। इसी कारण यहाँ का नाम नंदकेशरी पड़ा।

नन्दकेषरी में सम्मिलित प्रमुख देव डोलियाँ
क्र0
सं0 देव डोली का नाम कहाँ से आगमन
1 अल्मोड़ा की नन्दा अल्मोड़ा
2 कोट-भ्रामरी की कटार कोट
3 सूर्य मन्दिर कटारमल अल्मोड़ा
4 नैनीताल की नन्दा-सुनन्दा नैनीताल
5 मरतोली जुहार की नन्दा मारतोली(पिथौरागढ़)
6 कुरूड़ की राजराजेष्वरी डोली कुरूड़(नन्दानगर)

1-अल्मोड़ा की नन्दा यात्रा का मिलन: नन्दकेषरी
कुमाऊँ के चन्द वंषीय राजाओं की आराध्य भी नन्दा ही है। लेकिन लम्बे समय से कुमाऊँ की जात बन्द थी। सन् 2000 में लगभग 75 बर्श बाद पुनः आई है। इससे गढ़-कुमाऊँ की सामूहिक संस्कृति से रूबरू होने का अवसर प्राप्त होता है। आज भी कुमाऊँ संस्कृति को जीवन्त रखने में सपर्पित है। इसीलिए इसे ’’रंगीलो कुमों’’ की संज्ञा दी गई है।
यात्रामार्ग- अल्मोड़ा-उदियारी- इठोलागाँव-मालेर- महला कमलेष्वर-भगतोला-ग्वालाकोट- भटज्यूला- सुनारी-द्याराड़ी-सोमेष्वर-कौसानी-बैजनाथ-फलवाड़ी-गरूड़-डांगोली- डुंगरी- भिलकोट-महरखेती-सरकोट-त्रिकोट से होते हुए नन्दकेषरी में राजजात में षामिल होती है। यह जात्रा एन0एच0-109 और बैजनाथ से भिलकोट तक गोमती नदी के सहारे चलती है। यह यात्रा मार्ग की …… किमी लम्बा है।
2- कोट-भ्रामरी की कटार का मिलन: नन्दकेषरी
यात्रा मार्ग- कोटभ्रामरी-डांगोली-अल्कादेवी-भिलकोट-महरखेती-सरकोट-त्रिकोट होते हुए नन्दकेषरी में षामिल होती है। यह यात्रा मार्ग की 35 किमी लम्बा है।
3- कटारमल सूर्य मन्दिर मिलन: नन्दकेषरी
यात्रा मार्ग- कटारमल मन्दिर-अल्मोड़ा (कोसी बाजार)-इतौला-पातलीबगड़- भगतौला- ग्वालाकोट- सोमेष्वर- कौसानी-बैजनाथ-बागेष्वर-गरूड़-बैजनाथ-डांगोली-भिलकोट-महरखेती- सरकोट-त्रिकोट होते हुए नन्दकेषरी में षामिल होते हैं। यह यात्रा मार्ग की 91 किमी लम्बा है।
4- नैनीताल की नन्दा-सुनन्दा का मिलन: नन्दकेषरी
नैनीताल विष्व में पर्यटन, झीलों की नगरी, माँ नन्दा-सुनन्दा मन्दिर और षिक्षा के केन्द्र के लिए प्रसिद्ध है। यही से माँ नन्दा-सुनन्दा की देवयात्रा आकर नन्दकेषरी में राजजात में षामिल होती है।
नैनीताल की नन्दा-सुनन्दा की जात्रा सन् 2000 में 75 साल बाद राज छंतोली एवं कुरूड़ की डोली के साथ मिलकर कैलाश यात्रा की।
यात्रा मार्ग- नैनीताल-भवानीपुर-भवांली-निगलाट-कैंचीधाम-पाडली- जोषियाधूना- रामगाड़- गरमपानी-खैरना-लोहाली-सकदीना-बलनी-जोगीनौली-काकड़ीघाट- गंगूरी- सुयालबाड़ी-चोपड़ा- द्योली (नैनीताल से द्योली तक छभ्-109 भंवाली-अल्मोड़ा मार्ग के सहारे होकर)-सेनार-बमोला- कुनेथागुण्ठ-अल्मोड़ा पँहुचती है। यहाँ से अल्मोड़ा और नैनीताल की नन्दा दोनों साथ चलकर नन्दकेषरी में आती हैं। यह यात्रा भंवाली से चोपड़ा तक कोसी नदी के किनारे चलती है। यह यात्रा मार्ग की 160 किमी लम्बा है।
5- मारतोली-जुहार की नन्दा का मिलन:ः नन्दकेषरी
यात्रा मार्ग- मारतोली जुहार नन्दा देवी मन्दिर से टोला-रिलकोट-लास्पा-दाबा-नहरदेवी- पोटिंगाड़-बोघर-स्यूनी- गौरीगाड (नैन सिंह टाॅप मार्ग)- लीलम- सैनपोलु- जिमियाघाट- धापा- दारकोट- षंखधूरा-मुनस्यारी- खलिया- रातापानी- भण्डारीगाँव- विर्थि-बागला-तेजम- कवती- बंजबांगर (रामगंगा पार करना)-सेलीसामा- क्षमधुरा-दाना-झरनी-घिंघरानी-हरसिंग्या बगड़- पारमाती-भराड़ी- बागोली-आसन-रैन्थल- हर्सिला- देवलचैंरा-द्वारसौं- कठायतबाड़ा-जोषी गाँव (बागेष्वर-डीडीहाट-पिथौरागढ़ राजमार्ग 309। के सहारे होकर)- बागेष्वर- बहुली-खोली (गोमती नदी के सहारे होकर)-सेलता- रवैखाल-कुंजकोट-थाकलाडगाँव- बमराड़ी-सेमर- कनस्यारी- गगरीगोल-स्याल्दे- बैजनाथ- डांगोली-डुंगरी-भिलकोट-तितोली-बंगा-बजवाड़- महरखेती- ग्वालदम स्टेट-सरकोट- त्रिकोट- नन्दकेषरी में राजजात में षामिल होती है। भराड़ी से डांगोली तक यात्रा छभ्-109ज्ञ के आसपास होकर चलती है। जो श्रद्धालु पैदल चलने में असमर्थ हैं, वे सड़क मार्ग से होकर दर्षन करते हैं।
6-कुरूड़ की राजराजेष्वरी का मिलन स्थल: नन्दकेषरी
दषमद्वार की नंदा राजराजेष्वरी (वाण पड़ाव में सम्मिलित)
दषोली की नंदा राजराजेष्वरी (वाण पड़ाव में सम्मिलित)
मेरा मानना है कि काँसुवा-नौटी से आरम्भ होने वाली राजजात एवं कुरूड़ की राजराजेष्वरी की डोलीयात्रा एक दूसरे के पूरक हैं। अर्थात राजछंतोली की यात्रा तभी पूर्ण होती है जब कुरूड़ की डोली नन्दकेषरी में राजजात के साथ षामिल होती है। राजराजेष्वरी डोली की सार्थकता तभी है जब राजछंतोली से उसका मिलन होगा। अतः इस सम्बन्ध में किसी की भी महत्ता एवं श्रेश्ठता को सिद्ध करना कोई विशय ही नहीं हैं।
राजजात के समय डोली के पड़ाव
1-पहले दिन- देवी कुरूड़ से विदाई गीतों के साथ चरबंग में पहले दिन विश्राम करती हैं। दूसरे दिन विदाई-वेदना में देवी-डोली का छत्र बार-बार मंदिर की ओर झुकता है। सारा वातावरण भावात्मक हो जाता है। स्त्रियों के आँखों में आंसू बहाने लगते हैं। कभी-कभी कुरुड़ क्षेत्र में भी चैसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेंढ़ा) के जन्म लेने की संभावना रहती है।
2-दूसरे दिन- यही सिलसिला आगे मतकोट, घरगांव, घाट होते हुए फाली में रात्रि विश्राम होता है।
3-तीसरे दिन- इस दिन देवडोली अपने यात्रीयों सहित उस्तोली तक चलकर यहीं विश्राम कर ती है।
4-चैथा दिन- देवी का चैथा पड़ाव देवी-डोली सरपाणी, बांजगढ़, लांखी में भक्तों का ताँता देवीयात्रा में षामिल होते हैं। इस दिन भेंटी तक आती है। और यही विश्राम करती है।
5-पाँचवे दिन- इस दिन स्यांरी, बंगाली, सुपताल होते हुए सोल-डूंग्री के थोकदार बुटोला के गाँव में कुरूड़ की देवडोली विश्राम करती है।
6-छठें दिन- केरा, मैन गाँवों से का भ्रमण करते हुए सूना में राजराजेश्वरी रात्रि विश्राम करती हैं।
7-वें दिन- इस दिन देवी थराली के समीपस्थ गाँवों के लोगों को दर्षन देते हुए चेपड़ों में विश्राम के लिए आती है। यहाँ पर कुरूड़ की देवडोली राजजात से पहले आगमन करती है। इसके बाद मुख्य राजजात गाँव में पदार्पण करती है। लेकिन इस दिन चाँदपुर गढ़ से आने वाली राजछंतोली एवं कुरूड़ की देवीडोली दोनों को अलग-अलग ठहराया जाता है।
8-आठवें दिन- चेपड्यूँ से पहले कुरूड़ की डोली एवं बाद में राजजात प्रस्थान करती है। तब इसी दिन नंदकेसरी में राजराजेष्वरी की डोली का मिलन राजजात-छांतोली से होती है। यहाँ से राजजात की अगवानी कुरूड़ की देवडोली करती है।
यहाँ पर यह स्मरण करा दूँ कि बड़ीजात के संपन्न होने के पश्चात् कुरूड-राजराजेश्वरी डोली की पूजा छः माह (भाद्रपद से माघ तक) देवराड़ा में होती है।

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