Himalaya ki Nanda Devi Yatra

उत्तर हिमालय के अधिकाषं स्थलों पर जाने वाले श्रद्धालुओं ने इस प्रकार की धार्मिक यात्रा को तीर्थ के रूप में माना है। जिसका अर्थ जीवन से पर पाना होता है। अतः प्राचीनकाल में ऐसी साहसिक और धार्मिक यात्राएं अधिकांष लोग अपने जीवन के चैथे पड़ाव में करते थे। ताकि ऐसे स्थानों पर अधिक आयु या विपरीत परिस्थितियों के कारण यदि मृत्यु भी होती है, तो मोक्ष मिल जायेगा। इसीलिए इन स्थानों को स्वार्गद्वार/स्वर्गारोहिणी और मोक्षधाम के नाम से भी जाना जाता है।

अट्ठारहवाँ पड़ाव- सुतोल (वापसी)

यात्रा मार्ग- चन्दनियाघट से तातड़ाद्योसिंग मन्दिर-भुजानी-रूपगंगा एवं नंदाकिनी संगम होते हुए सुतोल (नन्दानगर क्षेत्र) में विश्रामसुतोल की समुद्रतल ऊँचाई 4010 मीटर है। राजयात्री चंदनियाघट से पैदल चलकर सुतोल में रात्रि विश्राम करते हैं। यह वापसी का दूसरी बसागत पड़ाव है। नंदा के धरम-भाई द्योसिंग-भौसिंग के प्रसिद्ध मंदिर में भव्य स्वागत होता है। वाण लाटू की […]

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उन्नीसवाँ पड़ाव- नन्दानगर (वापसी)

यात्रा मार्ग- सुतोल से चलकर पंजाजोखा-पेरी-त्रिषूलघाटी धार या कनोल (पैदल)-गुलारी-गैरी- सितेल-बागवान-कमुरतोली होते हुए नन्दानगर में विश्रामनन्दानगर समुद्रतल से 1331 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। नन्दाकिनी के सहारे चलते हुए यात्री दल नन्दानगर में विश्राम करता है। सुतोल से सितेल तक बांज, बुंराष, कैल, चीड़ के घनघोर जंगल जो कि वानस्पतिक विविधता के लिए अनोखी

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बीसवाँ पड़ाव- नौटी (समापन)

यात्रा मार्ग- नन्दानगर से चलकर से चलकर सेंतोली-सेरा-काण्डई पुल-ग्वाला- तेफना- नन्दप्रयाग- कर्णप्रयाग होते हुए नौटी में विश्रामराजयात्री नन्दानगर से प्रस्थान कर नन्दाधाम नौटी पँहुचते हैं। प्राचीनकाल में नन्दप्रयाग (छभ्.7) भी पड़ाव था। यात्रीदल के कर्णप्रयाग पँहुचने पर भव्य स्वागत होता है। यहाँ पर कोटी के ड्यूँडी ब्राह्मण बारह थोगी ब्राह्मणों को विदा करते हंै। कर्णप्रयाग

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तृतीय भाग

1-गढ़वाल-कुमाऊँ की आराध्य देवी है श्रीनन्दाअ-गढ़वाल क्षेत्र में श्रीनन्दा देवी के प्रमुख मंदिरब-कुमाऊँ क्षेत्र में श्रीनन्दा देवी के प्रमुख मंदिर-2-राजजात में षामिल होने वाली प्रमुख छांतोली-निषान एवं डोलीयाँ3-राजमार्ग में पड़ने वाले अन्य प्रमुख स्थल/पर्वत4-राजजात में विशिष्ट महत्व होता है नंदा-जागरों का5-कैसेटों के माध्यम से भी सांस्कृतिक धरोहर की जानकारी6-राष्ट्र को अध्यात्मिक चेतना का संदेश देती

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गढ़वाल-कुमाऊँ की आराध्य देवी है श्रीनन्दा

वैदिक षास्त्रों के अनुसार भारत भूमि में 84 करोड़ देवी-देवता वास करते हैं। इस दृश्टि से पर्वतराज हिमालय की गोद में बसे उत्तराखण्ड या उत्तराँचल के लिए यह कथन सत्य प्रतीत होता है। क्योंकि हिमालय को देवताओं की आत्मा भी कहा गया है। एक उक्ति के अनुसार ’’कोष-कोष पर बदले पानी, चार कोष पर बदले

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गढ़वाल क्षेत्र में श्रीनन्दा देवी के प्रमुख मंदिर

मुख्य राजजात मार्ग पर- नौटी नन्दा श्रीयंत्र, इड़ाबधाणी, काँसुवा, सेम, कोटी, भगोती, झिंझोणी, मींग, कुलसारी, चेपड्यूँ, नन्दकेषरी, फल्दियागाँव, मुंदोली, लोहाजंग, वाण, रणकीधार, गैरोली-पातल, वेदनी कुण्ड, षिलासमुद्र।चमोली में अन्य नन्दा थान- गैरसैण- गैरसैण पाथाबार नन्दामाई, ऐखोला, धारापानी, भेडियाना, कुंजापानी,लाता, परसारी तपोवन, हेलगं, बदरीनाथ, उर्गम, देवीखेत, गुड़साल, मैठाणा, नन्दप्रयाग, हिडोली, दषोली।रूद्रप्रयाग में नन्दा थान- बीरो-देवल, डुंगरी, क्वीली

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कुमाऊँ में श्री नन्दा देवी के थान

नैनीताल – सुबगढ़, देवीबगड़, सनोटी-नाकुरी, उधन-थल, डांगोली, कोट, अलोंग, भंवाली मेंबागेष्वर- पोथिंग-दानपुर, बदियाकोटअल्मोड़ा- चैखुटिया, तेरागाँव, बाखली, रानीखेत, नन्दा जागेष्वरपिथौरागढ़- मुनस्यारी, मार्तोली-जुहार, तवाघाट, रंठी, जौलजीवी दारमा घाटी, नमजाला, लास्या, दारकोट, संकधुरा, सेलीसामा, बिजुल, मिलम, मकया, पांछ,नन्दा के मन्दिरों की उपरोक्त सूची ही अन्तिम नहीं हैं। इस नन्दाराजयात्रा के आरम्भ, नामकरण, देवी के थान/मन्दिर आदि पर और

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राजमार्ग में पड़ने वाले अन्य प्रमुख स्थल/पर्वत

क्र0सं0 स्थल/पर्वत का नाम समुद्रतल से ऊँचाई (मी0 में) अन्य विवरण1 षलेष्वर महादेव 1430 ओघड़बाबा का मठ2 नन्दासैण 1680 नन्दा का क्रीड़ागंन उफराई देवी ठाँक 25203 चाँदपुरगढ़ी 1300 राजधानी4 आदिबदरी 1180 श्रीबदरी का चैदह मन्दिर समूह5 सिमली 830 पिण्डर-आटागाड का संगम6 नारायणबगड 1100 नारायण भूमि पंती 11007 थराली 1160 पिण्डरघाटी का मुख्य केन्द्र8 देवाल 1218

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राजजात में विशिष्ट महत्व होता है नंदा-जागरों का

उत्तराखण्ड में दैवीय षक्ति के आह्वान के लिए गाये जाने वाले लोक गाथाओं के गीतों को जागर कहा जाता है। इनमें तन्त्र, मंत्र और यंत्र तीनों का समावेष रहता हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी जागरी (जागर गाने वाले) नंदा के पूजन, जातवर्णन, आह्वान, गाथा आदि जागर के माध्यम से सुनाते हैं। इन जागरों की महत्वपूर्ण दो

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कैसेटों के माध्यम से भी सांस्कृतिक धरोहर की जानकारी

सन् 2000 ई0 से आधुनिक प्रिन्ट एवं इलैक्ट्रोनिक मिडिया के प्रयोग ने भी इस ऐतिहासिक विरासत की गाथा को नई पीढ़ी तक पँहुचाने में बड़ी मदद की है। पिछली राजयात्रा के समय निर्मित आॅडियो-विडियो कैसेटों के माध्यम से इससे जुड़े जागरों, झुमैलो, चैंफुला बाजूबन्द से भी जनमानस परिचित हुए हैं। इस कड़ी में गढ़वाल के

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