लगभग 17500 फीट ऊँचाई बर्फीली चोटी से गुजरने वाली यह ऐतिहासिक व धार्मिक यात्रा अनोखी है। ’’हिमालयी सचल महाकुम्भ’’ के नाम से प्रचलित नन्दा राजजात की महत्वपूर्ण विषेशता यह है कि इसकी अगवाई चार सींग वाला खाडू (मेंडा) करता हैं। जिसे स्थानीय बोली में ’’चैसिंग्या खाडू’’ कहते हैं।
सन् 1987 और सन् 2000 में उत्तराखण्ड की ग्रीश्मकालीन राजधानी भराड़ीसैण के समीप सिराणा गाँव में पैदा हुआ था।
सन् 2014 की राजयात्रा में चैसिंग्या खाडू का जन्म कर्णप्रयाग-नौटी- नन्दासैण-पैठाणी मार्ग पर ग्राम डडोली (किरसाल) में हुआ था।
उपरोक्त के अलावा सन् 2000 में कपीरी पट्टी के कनखुल-चेपड्यों के श्री चन्द्र सिंह और सन् 2014 में चाँदपुर के स्यालकोट में श्री पुश्कर सिंह बिश्ट की गोठ में अन्य चैसिंग्या जन्मे थे।
जिस दिन चैसिंग्या खाडू काँसुवा के लिए चलता है वह विदाई का दृश्य भी बड़ा मार्मिक होता है। इस दृष्य को देखने के लिए स्थानीय गांवों के नर-नारी पहुंचते हैं। यह एक संयोग है सन् 1987 एवं 2000 जात में अगवानी चैसिंग्याखाडू एक ही बखर्वाटे (गौशाला) में पैदा हुए। राजकुँवर चैसिंग्या खाडू और छंतोली को लेकर नौटी जाते हैं। राजगुरु दोनों की विशेष पूजा कर आभूशण पहनाते हैं। माँ नन्दा के लिए अर्पित किये जाने वाले विषेश प्रकार की नक्काषी के स्वर्ण और चाँदी के जेवर (आभूशण) का निर्माण कार्य नौटी में होता था। परन्तु बाजारवाद ने इसे समाप्त ही कर दिया।
