नन्दाजात एवं चैसिंग्यां खाडू़ का सम्बन्ध

पार्वती स्वरूपा नन्दा का विवाह कैलाषवासी औघड़ षिव के साथ हुआ। गढ़वाल नरेष ने नन्दा को अपनी धियाणी (बेटी-बहिन) माना, इसका विस्तृत वर्णन पहले किया जा चुका है। गढ़ नरेष ने नन्दा को बचन दिया कि तुम्हें बारह बर्शों में अपने राज्य (मायके) में बुलाऊगाँं। निर्जन एवं कठिन यात्रा या फिर राजकाज में व्यस्तता के चलते राजा नन्दा को दिये बचनानुसार बुलाना भूल गये।
यह सर्वविदित है बहिन-बेटी को लम्बे समय तक मायके नहीं बुलाते हैं तो धियाणी नाराज होती है। भले ही सूचना क्रान्ति और सोषल मीडिया के युग में नई पीढ़ी को यह तथ्य अजीबोगरीब लगेगा। लेकिन आज से 20-25 बर्श पहले तक यही सत्य था। तब ससुराल से बहिन-बेटी की कुषल क्षेम का माध्यम पत्र, सन्त-रैबार एवं बुलावा होता था। इसका प्रमाण लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी के गीत ’’घुघुती घुरोण लगी म्यरा मैत की’’………….है। इसी प्रकार की परिस्थितियाँ नंदा और गढ़नरेषों के साथ हुई।
कई बर्शों तक मायके नहीं बैदाने (बुलाने) से नन्दा नाराज एवं रूश्ट हुई। नन्दा के रूश्ट होने से राज्य में अनिश्ठकारी और अमंगलकारी घटनायें होनी लगी। जैसे बकरियों के गोठ (बकरियों का निवास स्थान) में दो सींग के स्थान पर चार सींग वाली ’’चिनखी’’ (बकरी का बच्चा) पैदा हुए। गाय-भैंसों के दो-दो बच्चे होने लगे। यह घटना राज्य में चर्चा का विशय बनी। पशुपालक राजा के पास गये और कोई दोश होने की सम्भावना व्यक्त की। राज दरबारियों द्वारा ज्योतिशियों को बुलाया गया। ज्योतिशियों ने गणत (गणना) कर बताया कई बर्श बीत जाने पर भी नन्दा को मायके नहीं बुलाने से यह अनिश्ठकारी घटना हो रही हैं।
आज भी हिमालय क्षेत्र में भैंस या गाय में दो बच्चे होना, बकरियों के गोठ में खुरस्या रोग एवं चारसिंग बकरी बच्चा और पालतू जानवरों में खुर्या रोग होना अलग-अलग देवी-देवताओं के दोश के प्रतीक की मान्यता है। दोश निवारण के लिए पहले उच्याणा (दोशमुक्त हेतु मनौती) कर निर्धारित सम्बन्धित देवी-देवता की पूजा-अर्चना, जागरी, जात, मण्डाण, सिरोट (चढ़ावा बलि, घण्टी आदि) करते हैं।
नन्दा ने अपने मायके वालों (राजाओं) से कहा- जब-जब तुम्हारे राज्य में बारह बर्श में दो सिंग के स्थान पर चैसिंग्या खाडू उत्पन होगा, वह मेरे दोश होने का संकेत होगा कि मुझे मायके की याद आ रही है। तब-तब प्रति बारह बर्श में चैसिंग्या खाडू की अगवानी में तुम प्रजा सहित छायाचैरड़ी तक मुझे विदा करने आवोगे। राजा ने नन्दा की बात स्वीकार की। तब से इस परम्परा का निर्वहन गढ़वाल के राजाओं की पीढ़ियों द्वारा किया जा रहा है। नन्दा का मायका आगमन बसन्त ऋतु में हो सकता है। जिसके पीछे यह प्रमाण है-
नब्बे के दषक से पूर्व बेटियों की षादियाँ छोटी उम्र में होती थी। बसन्त ऋतु में फूल-फूल माई खेलने के लिए बेटी को मायके बुलाया जाता है। राजगुरू नौटियाल द्वारा नन्दाधाम में चैत्र नवरात्र उत्सव प्रति बर्श बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। मायके में खेलने-मिलने के पश्चात बर्शा-ऋतु समाप्त होने पर पर छंतोली पर ख्वाजे-बुखणे, स्यून्दी-फौन्दी, ककड़ी, मुंगरी आदि समौण (भेंट) देकर नन्दा को विदा करते हैं। अतः गढ़वाल एवं कुमायूँ में बड़ी आस्था और भक्ति के साथ इस परम्परा का निर्वहन किया जाता है।

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