आस्था और विश्वास की इस राजजात को लेकर जहाँ लोगों में भारी उत्सुकता बनी रहती है, वहीं इस यात्रा में सन् 2000 से तीर्थ यात्रियों की उमड़ती भीड़ भी देखने लायक होती है। प्राचीन काल से ही यात्रा में चैंसिंग्या खाडू के साथ प्रतीक के रूप में रिंगाल से बुनी छंतोलियां भी काँसुवा से होमकुण्ड तक जाती हैं। यह छंतोली रिगांल (बाँस की प्रजाति) की बनी होती है। इसी छंतोली को ’’राजछंतोली’’ कहते हैं। इसका निर्माण करने का अधिकार भी विषेश जाति है, जिन्हे राजरूड़िया कहते हैं। बुनाई के बाद इसे रंग-बिरगें कपड़ों से सजाते हैं।
राज छंतोली को चाँदपुरगढ़ से लगे छिमटा गांव के राज रूड़िया परिवारों का पारम्परिक अधिकार है। राज छंतोली की पूरी जात्रा में विशेष पहचान है। षुभ-लग्नानुसार छंतोली का छिमटा से कांसुवा लाने के बाद विशेष पूजा अर्चना के बाद इस पर विद्वान पंडितों के द्वारा जड़ी बूटियों एवं धार्मिक अनुष्ठान से प्राण प्रतिष्ठा चढ़ाकर यात्रा में सम्मिलित करते हैं।
रिंगाल की छंतोली ही क्यों?
इस सचल हिमालयी पैदल राजजात में ंिरंगाल की छंतोलियों का उपयोग एक विषिश्ठ महत्व रखता है। पहला उच्चहिमालयी क्षेत्र एवं कठिन मार्ग से गुजरने वाली यात्रा में भारी सामग्री के साथ चलना आसान नहीं है। दूसरा भाद्रपद माह तक तीव्र बर्शा होने की परिस्थिति में उससे बचने का एक सरल उपाय भी है।
छंतोली का निर्माण: राजरूड़िया छिमटा गाँव
मनौती के समय राजकुँवर द्वारा राजजात की प्रस्तावित तिथि राज-रूड़िया के गाँव छिमटा ( आदिबदरी- सुगढ़- प्यूरा-लंगटाईं-सिलपाटा मार्ग) ’’पत्र’’ भेजा जाता है। राज-रूड़िया षुभलग्नानुसार छंतोली का निमार्ण आरम्भ करते हैं।
राजजात में चैसिंग्या खाडू के बाद राज छंतोली विषिश्ट पहचान रखती है। आइए इसकी निर्माण की जिम्मेदारी संभालने वाले चाँदपुरगढ़ के समीप बसे छिमटा गाँव के ’’राज रूड़िया’’ की कहानी जानना आवष्यक है।
राजरूड़िया बलवन्त राम के अनुसार ’’मैंने बचपन से अपने पिता स्व0 अमरी राम (मृत्यु 2024) और स्व0 श्री छेपडू लाल के साथ पूर्व की तीन और सन् 2026 सहित चैथी राजजात छंतोली का निर्माण करने में सहयोग किया’’।
सम्र्पूण राजरूड़िया परिवार श्री हरीष, श्री प्रेमलाल, विशुलाल पुत्र स्व0 हरिलाल, बिन्दीलाल पुत्र स्व0 पदमूलाल, नरेन्द्रलाल पुत्र बचन लाल सहयोग करते आये हैं। सन् 2026 की प्रस्तावित जात के लिए राजकुँवर काँसुवा से निमंत्रण की प्रतीक्षा में है।
राजरूड़िया बलवन्तराम के अनुसार राजरूड़िया राजजात के लिए सर्वप्रथम छोटी और बड़ी आकार की दो अलग-अलग छंतालियों का निर्माण करते हैं, जो कि इस प्रकार हैं-
उच्यांणा छंतोली- इसे छोटी छंतोली कहते हैं। राजकुँवरों द्वारा राजजात आयोजन से एक बर्श या छः माह पूर्व राजरूड़िया को दी जाती है। राजरूड़िया दूधातोली और भराड़ी के जंगल से रिंगाल लाकर सुभ दिनबार के साथ निर्माण करते हैं। ’’उच्याया छंतोली’’ को आदिबदरी मंन्दिर होते हुए काँसुवा लाते हैं।
मुख्य छंतोली- इसे बड़ी छंतोली कहते हैं। उच्याणा छंतोली के बाद इसका निर्माण आरम्भ होता है। राजजात आरम्भ होने से एक दिन पूर्व राजकुँवर छंतोली को लेने छिमटा जाते हैं। राजरूड़िया आदर सत्कार करते हैं। उसी दिन छंतोली को आदिबदरी में साह परिवार श्री विनोद साह पुत्र स्व0 मनोरी लाल साह की पारम्परिक कपड़ें की दुकान में विभिन्न रंगों के मखमली कपड़े लगाकर आकर्शक बनाई जाती है। उसके बाद भगवान आदिबदरी नारायण के मन्दिर में राजकुँवर द्वारा पूजा की जाती है। स्थान में राजरूड़िया बलवन्त राम के अनुसार राज-छंतोली बनने के बाद अन्य गाँवों की चैदह-पन्द्रह छंताली बनाते हैं।
राज-छंतोली निर्माण करने वाले राज-रूड़िया सूची
क्र0सं0 बर्ष राज-रूड़िया परिवार/नाम
1 -1988 स्व0 अमरी राम (मृत्यु 2024) और स्व0 श्री छेपडू लाल, बलवन्त राम।
2 -2000 स्व0 अमरी राम (मृत्यु 2024) और स्व0 श्री छेपडू लाल, बलवन्त राम।
3 -2014 स्व0 अमरी राम (मृत्यु 2024) और स्व0 श्री छेपडू लाल, हरिलाल, पदमू लाल, बलवन्त राम। अन्य सहयोगी श्री हरीष, श्री प्रेमलाल, विशुलाल पुत्र स्व0 हरिलाल, बिन्दीलाल पुत्र स्व0 पदमूलाल, नरेन्द्रलाल पुत्र बचन लाल
4 -2026 (प्रस्तावित) श्री बलवन्त राम, श्री हरीष, श्री प्रेमलाल, विशुलाल पुत्र स्व0 हरिलाल, बिन्दीलाल पुत्र स्व0 पदमूलाल, नरेन्द्रलाल पुत्र बचन लाल
