आठवीं सदी में निर्मित यह मठ इतिहास, परम्परा और धार्मिकता के अनूठे संयोग के लिए प्रसिद्ध है। यह मठ और चाँदपुरगढ़ी एक-दूसरे के आमने-सामने हैं। दूधातोली से निकलने वाली उत्तरवाहिनी आटागाड (नारायणगंगा) दोनों को गहरी संकरी घाटी द्वारा पृथक करती है। दोनों ही टीलानुमा भौगोलिक इकाईयों पर बने हैं। ऐतिहासिक गढ़ एवं धार्मिक आस्था का प्रतीक ’षलेष्वर मठ’ का निर्माण समय लगभग एक ही है। यह मठ कर्णप्रयाग विकासखण्ड के बैनोली गाँव में है। बैनोली राजमिस्त्रीयों का मूल गाँव भी है।
नन्दाराज एवं षैलेष्वर मठ का सम्बन्ध
गढ़ नरेष की अधिश्ठात्री होने से माँ नन्दा एवं षैलेष्वर मठ में घनिश्ठ सम्बन्ध स्वााभाविक है। जिसका वर्णन पूर्व में किया जा चुका है। बसन्त पंचमी के दिन मनौती के बाद छंतोली यहीं औघड़ बाबा के सिंहासन पर रखते हंै। राजजात आरम्भ होने के दिन से पूर्व छंतोली को पुनः काँसुवा लाते हैं। इस दिन रात्रि भर जागरण होता है। दूसरे दिन राजपरिवार छंतोली और चैसिंग्या खाडू सहित नौटी पँहुचते हैं। यात्रा नौटी से ईड़ा-बधाणी प्रथम पड़ाव पँहुचने तक षैलेष्वर मठ में ग्रामीण पूरी रात्रि जागरण कर दीपोत्सव करते हैं।
