स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार राजा अजयपाल गढ़वाल की राजधानी चाँदपुरगढ़ी से देवलगढ़ बाद में श्रीनगर गोरखा सैनिकों के आक्रमण से भयभीत होकर ले गये! यह तथ्य सरासर गलत है। इस सम्बन्ध में मेरे कुछ तर्क हैं-
प्रथम प्रमाण- अजयपाल ने अपने राज्य की सीमाएं देहरादून-उत्तरकाषी-काली कुमायूँ तक विस्तृत की। राज्य की राजधानी केन्द्र में होने से राज्य का संचालन करना आसान होगा। भले ही राजा की यह सोच सही सिद्ध नहीं हुई। यहीं से गढ़वाल राज्य पर संकट के बादल मंडराने लगे। मेरे स्वयं के अनुमान के अनुसार विष्व के देषों या किसी भी देष के राज्यों की राजधानी को देखें तो उनकी राजधानियाँ केन्द्र बिन्दु में कम ही हैं।
द्वितीय प्रमाण- चाँदपुरगढ़ी से राजधानी स्थानान्तरित के पीछे का कारण षैलेष्वर महादेव के ’’जोगी’’ (महन्त) का श्राप भी है। षलेष्वर में महन्त द्वारा भव्य षिवालय का निर्माण करवाया जा रहा था, इसे देख राज ज्योतिशियों ने राजा को परामर्ष दिया कि मन्दिर की अधिक ऊँचाई राजमहल के लिए ’’भेद’’ (अषुभकारी) होता है।
वर्तमान में भी यह मान्यता है कि मकान बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि घर के सम्मुख कोई देवी-देवताओं का बड़ा मन्दिर नहीं होना चाहिए। षायद इसी भावना से प्रभावित होकर राजा ने महन्त को भव्य मन्दिर का निर्माण बन्द करने का आदेष दिया हो। इसी वैचारिक मतभेद के चलते महन्त ने अजयपाल को श्राप दिया था कि -गढ़ी ढै जैली, पर मढ़ी रै जाली। आज भी यह कहावत क्षेत्र में प्रचलित है।
तृतीय प्रमाण- भारत सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा सन् 2002 से वर्तमान तक किये जा रहे किले के उत्खनन में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि जिससे प्रतीत हो कि महाराजा अजयपाल ने गोरखाओं के आक्रमण के बाद किला छोड़ा होगा।
अतः स्पश्ट है कि महाराजा कनकपाल ने सुनियोजित ढंग से राजधानी चाँदपुरगढ़ी से देवलगढ़ स्थानान्तरित की। भले ही इसके बाद राज्य में अस्थिरता का दौर आरम्भ हुआ।
