अब तक आयोजित राजजात यात्रा

इस राजयात्रा को आरम्भ करने का श्रेय नौवीं सदी में राजा षालिपाल को जाता है। लेकिन इसके पुश्ठ प्रमाण नहीं होने से इस तिथि पर भ्रांन्ति बनी रहती है। यह यात्रा 12 साल के अन्तराल में आयोजित की जाती रही है। लेकिन कभी-कभी इसके आयोजन में अधिक समय का अन्तर भी रहा है।
इसी क्रम में 12वीं सदी में कन्नौज के राजा यषधवल (परिहार वंष यषोबर्मन) भी इस यात्रा पर आया था। देवीय आपदा के कारण यषधवल एवं उसकी सेना रूपकुण्ड से आगे नहीं बढ़ पाई। मार्ग में ही मृत्यु को प्राप्त हो गई। जिनके नर-कंकाल आज भी रूपकुण्ड के आसपास देखने को मिलते हैं। नन्दा-राजयात्रा आठवीं सदी से पूर्व आरम्भ हो चुकी थी। उसका सही-सही लिखित इतिहास नहीं है।
कुरूड़ के पुजारी प0 दिनेष चन्द्र गौड़ जी के कथनानुसार सन् 740 ई0 में चित्तौड़ के राजा परिहार वंष के यषोधवल बर्मन ने इस यात्रा का आरम्भ किया था, जिसकी यात्रा प्राकृतिक आपदा के कारण रूपकुण्ड से आगे नहीं बढ़ सकी जिसमें सम्पूर्ण यात्रीदल वहीं मृत्यु को प्राप्त हुए जिनके षव आज भी रूपकुण्ड के आसपास बिखरे पडे़ हैं। उस यात्रीदल में गौड़ पुजारी बचे। उन्हीं के द्वारा कुरूड़ में पूजा के लिए नन्दा मन्दिर स्थापित किया। यहाँ से प्रतिबर्श छोटीजात या लोकजात और बारह बर्श में राजजात आयोजित होती है।
प0 दिनेष चन्द्र गौड़ जी के अनुसार पूर्व में कुरूड़ से ही राजजात का आयोजन होता था। जो कि तर्क संगत नहीं है, क्योंकि नन्दा राजजात के पूर्व में ’’राज’’ उपसर्ग का अर्थ राजा से है, जिसे नकारा नहीं जा सकता है। जब तत्कालीन राजधानी चाँदपुरगढ़ी थी, तो फिर राजजात यहीं से आरम्भ हुई। राजधानी देवलगढ़ स्थानान्तरित होने पर इस लोक परम्परा का दायित्व कांसुवा के कुँवर परिवार पर आई। जिसका निर्वहन वर्तमान तक जारी है। नन्दकेषरी में राजछत्र का कुरूड़ की डोली मिलन के बाद राजछत्र (छंतोली) की अगवानी कुरूड़ नन्दा-डोली ही करती है।
अतः राजछत्र के बिना कुरूड़ की नन्दा डोली राजजात यात्रा नहीं कहलायेगी और कुरूड़ की नन्दा डोली के बिना राजजात यात्रा अधूरी है। इसमें कोई दो राय नहीं है।
प0 देवराम नौटियाल के एक लंेख को आधार बनाते हुए अब तक आयोजित राजजात यात्राएं इस प्रकार हैं-
राजजात यात्राओं का विवरण और प्रतिनिधित्व
क्र0सं0 आयोजन का बर्श राज परिवार से प्रतिनिधित्व करने वाले का नाम (अध्यक्ष) राज पुरोहित परिवार से प्रतिनिधित्व करने वाले का नाम (महामन्त्री)
1 -सन् 1843 ई0 में कुँवर हयात सिंह
2 -सन् 1863 ई0 में कुँवर हयात सिंह
3 -सन् 1886 ई0 में
कुँवर षिव सिंह (षिक्षा के क्षेत्र में कार्य करते हुए कर्णप्रयाग में में हाईस्कूल की स्थापना में विषेश योगदान)
4 -सन् 1905 ई0 में कुँवर बख्तावर सिंह
5 -सन् 1925 ई0 में कुँवर केषर सिंह
6 -सन् 1933 ई0 में
7 -सन् 1951 ई0 श्री रघुनाथ सिंह कुँवर परन्तु प्रतिनिधि के रूप में श्री ध्यान सिंह कुँवर प0 स्व0 देवराम नौटियाल
8 -सन् 1968 ई0 खुषाल सिंह कुँवर एवं दरम्यान सिंह कुँवर ( टिहरी महाराजा के प्रतिनिधि के रूप में उनके छोटे भाई भी सम्मिलित) प0 स्व0 देवराम नौटियाल
9 -सन् 1987 ई0 में स्व0 श्री बलबन्त सिंह कुँवर प0 भुवन नौटियाल
10-21 अगस्त सन् 2000 ई0 में स्व0 श्री बलबन्त सिंह कुँवर परन्तु प्रतिनिधि के रूप में डाॅ0 राकेष सिंह कुँवर। प0 भुवन नौटियाल
11-29 अगस्त 2014 ई0 में श्री राकेष सिंह कुँवर बेदनी से आगे प्रतिनिधि के रूप में उनके पुत्र कुँवर तेजेन्द्र सिंह।
प0 भुवन नौटियाल एवं उनके पुत्र।
12 -प्रस्तावित सन् 2027 में डाॅ0 राकेश सिंह कुँवर प0 भुवन नौटियाल


2-देव-डोलियाँ एवं छंतोलियों के मिलन स्थान
सन् 2026 में प्रस्तावित हिमालयी सचल नन्दादेवी राजजात काँसुवा से प्रस्थान होने के साथ आरम्भ होती है। अलग-अलग गाँवों से आने वाली देवी-देवताओं की छंतोलियाँ, न्यूजा-निषान, डोलियाँ, खड्ग-कटार का मिलन होता है। उक्त के अतिरिक्त नवीन गाँव/क्षेत्रों से भी सैकड़ों प्रतीक-डोलियाँ-छत्र षामिल होने की सम्भावना है।

क्र0सं0 पड़ाव/स्थान/गाँव जहाँ पर डोली षामिल होती है। गाँव/क्षेत्र जिनकी छंतोली, डोली, निषान षामिल होती हैं।
1-गढ़सारी देवल
2-चोपड़गली (बैनोली) नैणी
3-ऐरोली मलेठी
4-नौना नौना
5-सेम गैरोली, चमोला
6-कोटी चूलाकोट, रतूड़ा, खण्डूड़ा, थापली, बगोली के लाटू
7-छैकुड़ा कण्डवालगाँव, छैकुड़ा, मनोड़ा
8-केवर (भगोती)
कड़ाकोट-ना0बगड़ बधाण किमोली, कोब, भगोती, रैंस, चोपता, कड़ाकोट, पैंतोली, असेड़, सणकोट, जुनेर, पांखोली, डुंगरी
9-नन्दकेषरी कुरूड़, नैनीताल, अल्मोड़ा, कोट-भ्रामरी, डंगोली, मारतोली-जुहार
10-छेवाल वदियासेम (बागेष्वर)
11-वाण कुरूड़ की राजराजेष्वरी डोली
दशोली की राजराजेष्वरी
दषमद्वार की डोली
दशमद्वार (दषोली) की डोली -इस डोली के मार्ग में अन्य सामिल होने वाली छंतोलियाँ- सोर्खा, नौली, हड़कोटी, हिण्डोली, आदि।
कपीरी क्षेत्र -बदरीश छंतोली, नौली-तल्ली, स्वार्का, जस्यारा, डिम्मर, कनखुल, मैखुरा
फस्र्वाणफाट -दषोली क्षेत्रपाल, खैनुरी, पटेल, रांगतोली, गोलिम, हरमनी, लस्यारी, लासी, मजोठी, सेमढुुंग्ता, मैठाणा, पलेठी, मैड़, सरतोली, भगत्याला, धारकोट आदि।
जोशीमठ क्षेत्र की- लाता-मलारी, रविग्राम, काण्डई
बंड क्षेत्र की -लासी, मजेठी, किछली, खातीघट, किंली, गेरेखगाँव, अगथला, रैंतोली, कम्यार, दिगोली आदि।
विरही-गौणा क्षेत्र की -गाड़ी, सैंजी, दुरमी, पगना, झींझी, पाणी, इराणी आदि।

12-पातरनचैणियाँ -सुतोल, कनोल से द्यौसिंह-भौसिंह सुतोल, कनोल से द्यौसिंग, भौसिंग की।

उपरोक्त छंतोलियों के अलावा राजमार्ग में पड़ने वाले लगभग 180 गाँवों से कही छंतोली/न्योजा-निषान भी षामिल होते हैं।

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