यात्रा मार्ग-बेदनी बुग्याल से प्रस्थान कर निरालीधार (पातर नचैणियाँ) में विश्राम
पातर नचैणियाँ- समुद्रतल से ऊँचाई 3650 मीटर स्थित है। राजजात यहाँ के ढलानों पर छितरी-पतली पगडंडियों और गहरी घाटियों के बाद अब आकाश छूती बर्फीली पर्वत चोटियों से घिरे दूर-दूर तक पसरे मखमली बुग्यालों में प्रवेष करती है। वेदनी से आगे पत्थरों के गोल घेरे में बना खलिहान नुमा स्थल पातर-नचैणियां के नाम से जाना जाता है।
पहले इस पीक का नाम निरालीधार (रमणीक स्थान) था। एक बार कन्नौज के राजा यषधवन अपने षानो-षौकत के साथ होमकुण्ड की यात्रा पर आये। पातरों (नृत्यांगनाएं) ने यषधवल के मनोरंजन के लिए का नृत्य किया। तब से इस स्थान का नाम पातर नचैंणियां पड़ा। गढ़देष में नृत्य करने वाली महिलाओं को ’’पातर’’ कहा जाता था।
वेदनी से आगे बर्जित है महिलाओं का प्रवेष- क्यों?
आइए इस तथ्य को धार्मिक परिपेक्ष में जानें, एक बार शिवजी नन्दा घुघंटी पर्वत पर तप लीन थे। नन्दा अपनी सहेलियांे के साथ मध्य हिमालय पाद-क्षेत्र (नन्दाक) विचरण करने निकली। घूमते-घूमते समतल कन्नौज राज्य पर दृष्टि पड़ी। नन्दा सहेलियों को छोड़ अकेले कन्नौज की गढ़वाली रानी बल्लभा के राज प्रासाद पहुँची। बल्लभा श्री षक्ति को अचानक देख आष्चार्य चकित हुई। रानी ने नन्दा की खूब सेवा की।
नन्दा को राज्य की सुख-सौन्दर्य से मोह हो गया। रानी-बल्लभा से राज्य चाहने की इच्छा प्रकट की। लेकिन रानी ने असहमति व्यक्त की। तब देवी ने आवेश में अपनी मुद्रिका निकालकर भूमि पर पटकते हुए षाप देते हुए कहा देखती हूँ अब तू कैसे राज्य भोगेगी। देवी नाराज होकर षिवधाम नंदा घुघटी लौट आई। अन्तर्यामी शिव सब कुछ देख रहे थे। भविश्य में देवी को ऐसी लालसा फिर कभी उत्पन्न न हो षंकर भगवान ने इस प्रकार के विचरण की मनमानी को निशिद्ध किया।
इस ऐतिहासिक घटना को राजजात के परिपेक्ष में महत्वपूर्ण प्रसंग माना जाता है। इसीलिए सम्पूर्ण जात खासतौर पर बेदनी कुण्ड से ऊपर महिलाओं का जाना प्रतिबन्धित हुआ हो सकता है।
कन्नौज और गढ़वाल राज्य का सम्बन्ध
कुछ समय पष्चात कन्नौज राज्य में देवी के श्राप से घोर अन्न संकट, अवर्षण होने लगा। इतना ही नहीं दूध-दही और भात (पका चावल) में कीड़े पड़ना, साँपों का विप्लव जैसी अनहोनी घटनाएं होने लगी। राज्य में हाहाकार मच गया। यषोधवन ने पुरोहितों से मंत्रणा की। उनकी सलाह पर गणवा (राजज्योतिशों) को बुलाया गया। रानी बलभ्भा ने पूजा इत्यादि सामग्री तैयार की। राजज्योतिश ने ईश्वर को नमन कर गण्य (ज्योतिश) करते हुए कहा! राजन तुम्हारे ससुराल गढ़वाल के राजा की षिव-विवाहिता पुत्री श्री नंदा की दोषोत्पत्ति निकल रही है। इसके निदान का उपाय नन्दा के ससुराल षिवधाम तक की यात्रा करनी पडे़गी।
तत्पष्चात दोश निवारणार्थ राज पुरोहितों के द्वारा नंदा राजजात आयोजन का उचाणा (मनौती) की। परिणाम स्वरूप कनौज में पूर्व की भाँति सुख-समृद्धि लौट आई। राजा यशधवल यात्रा की तैयारी करने लगे। इसकी सूचना दूत के माध्यम से अपने ससुराल चाँदपुरगढ़ी के राजा के पास भेजी।
यह संयोग था रानी बलभ्भा गर्भवती थी, परन्तु उसने भी यात्रा पर जाने की जिद् की। यषधवल रानी को मना नहीं कर सके। बल्लभा अपने बारह बर्ष की पुत्री जड़ीली और दस वर्ष का पुत्र जड़ीला और दास-दासियों, सेविकाओं को साथ लेकर चल पड़ीं। यषधवल अपने जीवनकाल की सबसे लम्बी ऐतिहासिक यात्रा पर सैनिकों सहित निकल पड़े। कन्नौज से वाण तक यात्रा सुगमता पूर्वक चलती रही।
राजा यशधवल अभिमान के कारण वाण से आगे देवयात्रा के नियमों एवं प्राकृतिक प्रतिबन्धों को अनदेखा कर गये। राजसी ठाठ-बाठ, दास-दासियों, रानियों एवं दल-बल सहित बेदनी की ओर बड़े। राजजात की मर्यादाओं के अनुसार आज भी वाण से आगे महिलाओं एवं बच्चों का प्रवेष निशिद्ध है। यहाँ पर यह स्पश्ट कर दूँ कठिन, दुर्गम मार्ग तथा उच्च हिमालयी भागों में भौगोलिक नियमों के अनुसार ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ आॅक्सीजन लेबल कम होता है। इसलिए महिलाओं एवं बच्चों पर प्रतिबन्ध रहा होगा। इसी प्राकृतिक (देवीय) नियम के साथ लोगों ने अन्य तर्कों को जोड़कर अपने ढंग से परिभाशित करने लगे। इस देवीय मर्यादा का उल्लंघन करते हुए यषधवल सम्पूर्ण जत्थे के साथ वैतरणी कुंड को भी पार करते हुए निरालीधार पँहुचे। इस उच्च स्थान पर राजा ने मनोरंजन के लिए साथ आई ’’पातरों’’(नृत्यागंनाओं) से नृत्य करवाया। राजा की इस धृष्टता व यात्रा नियमों के उल्लंघन पर क्रोधित होकर देवी ने पातरों को नृत्य की अवस्था में शिला रुप में बुत (आकृति) बना डाला। इसीलिए निरालीधार का नाम पातर-नचैंणिया पड़ा।
राजा यशधवल इस अनहोनी पर भी सचेत न हुए। उनका जत्था रानी एवं बच्चों सहित बगुवावासा में विश्राम के बाद आगे बढ़ी। बगुवाबासा से लगभग 100 मीटर आगे गंगातोली शिला के आसपास रानी-बल्लभा को प्रसव-पीड़ा आरम्भ हुई। राजा यशधवल रानी और सेविकाओं सहित गुफा में रुक गए। षेश सेना और दल ने आगे बढ़ते हुए रूपकुंड के ऊपर ज्यूंरागली-ढाल पर डेरा डाला। उधर, गांगतोली गुफा में बल्लभा ने को जन्म दिया। पहले देवीय मर्यादाओं का उल्लंघन और अब प्रसव सूतक के कारण भयंकर बर्फीली-आंधी होने लगी, जिससे गांगतोली में राजा अपनी रानी, सेविकाओं, सैनिकों सहित अकाल मौत के शिकार हुए। तब से गांगतौली की गुफाओं को बल्लभा स्वैलड़ा/स्वेलफाड़ा (प्रसूति गृह) नाम पड़ा। इसके साथ ही रूपकुण्ड के उपर सैनिकों के डेरे भी उखड़कर रूपकुंड में समा गए।
जब चांदपुरगढ़ी राजा षालिपाल के द्वारा नन्दा देवी राजाजात आरम्भ की गई थी उस समय देवी ने आकाशवाणी कर आदेश दिया कि मेरी यात्रा करते समय रूपकुंड से पहले वैतरणी में यषधवल के मृतक परिवार-जनों का पिंड-तर्पण करना। तब से राजजात के समय राज-परिवार द्वारा वैतरणी में पितृ-तर्पण किया जाता है।
क्यों? हुए देवीय प्रकोप के भाजन:ः राजा यषधवल
प्रथम- दैविक दोश का अर्थ प्राकृतिक नियमों का पालन नहीं करना से है। मानव जब-जब इन नियमों का उलघंन करता है, तब-तब उसका जीवन खतरे में पड़ता है। वर्तमान विकास की अन्धाधुंध दौड़ में प्राकृति से छेड़-छाड़ से अनेक प्राकृतिक आपदायें आये दिन घटित हो रहीं हैं। ठीक उसी प्रकार राजा यषधवल हिमालय की मौसमीय घटनाओं का ध्यान नहीं रखते हुए अपने ठाठ-बाट से यात्रामार्ग पर चल रहे होगें। उच्च हिमालय क्षेत्र भारी जन-दबाव नहीं झेल सकता क्यों कि हिमालय आज भी निर्माण की अवस्था में है।
दूसरा- प्रसव वेदना में रानी चल न सकी, तो विश्राम/पड़ाव अधिक करने पडे़ होगें। इस स्थिति में 20-25 सितम्बर (भाद्रपद) के बाद हिमालय में तेज बर्शा, बर्फीली हवाएं, तूफान आदि आरम्भ होते हैं। तब इस अवधि में मानव प्रवेष कठिन ही नहीं अपितु असम्भव है। अतः यषधवल के यात्रीदल की असमायिक मृत्यु मानवीय भूल एवं दैवीय प्रकोप दोनों का संयोग हैं।
नंदादेवी राजजात समिति के संस्थापकों में से दिवंगत देवराम नौटियाल ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि 1951 की नंदाजात के अवसर पर वाण से आगे यात्रीदलों द्वारा जात की मर्यादा का उल्लंघन किया गया था। फलस्वरूप दैवीय कोप से बर्फ-बवंडर इतना अधिक हुआ कि यात्री दल पातर नचैंणियां से आगे नहीं बढ़ पाया और यात्रा अधूरी ही समाप्त करनी पड़ी थी।
द्यौसिंह-भौसिंह की छंतोली का मिलन स्थल: पातर नचैणियाँ
क्र0सं देव डोली का नाम कहाँ से आगमन
01 द्यौसिंह-भौसिंह की छंतोली सुतोल
सुतोल (नन्दानगर) क्षेत्र से द्यौंसिंह-भौसिंह के निषान इस स्थान में राजजात में षामिल होते हैं। इसके बाद कोई भी छंताली और न्यौजा-निषान षामिल नहीं होते है। वाण का लाटू की भाँति द्यौंसिंह-भौसिंह नन्दा के धर्म भाई हैं।
प्रथम दिन- सुतोल से चलकर तातड़ा-वालीग्याड़ जंगल होते हुए कनोल में विश्राम।
दूसरे दिन- कनोल से चलकर वालीग्वाड़ जंगल होते हुए घड़गना-मेढ़ाफाड़-देवढुंग में विश्राम।
तीसरे दिन- देवढंुग से चलकर चनखाली-ह्वागंमनार होते हुए पातरनचैणियाँ में राजजात के साथ मिलन कर करता है।
