नन्दा से जुड़े अन्य लोकोत्सव

क-नन्दा पाती- चाँदपुर क्षेत्र (मायका) सहित सम्पूर्ण गढ़-कुमाऊँ में जहाँ-जहाँ नन्दादेवी के थान (मंदिर) हैं उन गाँवों में ’’पत्ती या पाती ’’ लोकोत्सव धूमधाम से मनाते हैं। यह प्रतिबर्श या विषिश्ट समय अन्तराल में भाद्रपद अश्टमी (माह अगस्त) के दिन लोकपर्व और त्योहार दोनों रूप में मनायी जाती है।
पाती निर्माण विधि-
 पाती लोकोत्सव का सबसे विशेष पहलू अश्टमी से एक सप्ताह द्वितीया के दिन ’’ब्यूड़ा’’ (गेहूँ के बीज को घर में अंकुरित करने की विधि) जमाने रखते हैं। कहीं-कहीं तीन या सात दिन पूर्व नन्दा पाती पूजा आरम्भ होती है। पाती के दिन सबसे पहले भूम्याळ देवता- लाटू, घण्डियाल, हरू-हीत, बिनसर, द्यौसिंग-भौसिंग, द्योराड़ी, भराड़ी आदि की पूजा होती है। इन दिनों रात्रि के समय महिलाएं मिलकर ’’नन्दा की पेरी’’ (नन्दोळ) गायन होता है। कही स्थानों में देवताओं का ’’मण्डाण’’ (सामूहिक देव नृत्य) भी लगता है। जिसमें देवता अपने पश्वा (मानव षरीर) में अवतरित होते हैं। नौना, नैणी, रतूड़ा, खण्डूड़ा, नौटी की ’’पेरी’’ प्रसिद्ध हैं।
 अश्ठमी के एक दिन पूर्व समस्त गाँववासी बाजे-भंकोरों को गुंजायमान कर जंगल जाकर पाती निर्माण करने के लिए पेड़ का चयन करते हैं। पाती पेड़ की लम्बाई तीस से साठ फीट तक होती है। पाती चीड़, देवदार, सुराई के पेड़ से बनाते हैं। पाती को जंगल से गाँव में नन्दा थान में लाते हैं। इस समय का दृष्य भी बड़ा मनोहारी होता है। जिसमें अनेक देवी देवता अवतरित होते हैं।
 कहीं-कहीं पाती पेड़ की छाल उतारकर घी, दूध, मक्खन, तेल, षहद का लेप लगाते हैं। तत्पष्चात पाती पर ’कुणजु’ (विषेश प्रकार की वनस्पति जिसे षुभ कार्यों में उपयोग) घास बाँधते हैं। फिर ककड़ी, मंुगरी, ब्यूड़ा, नव-अनाज (नौं-नाज) में कौणी-धान का खाजा, बुखणा (धान और कौणी की बाली को भुनकर ओखली में कूटना) को छोटी-छोटी पोटलियाँ बनाकर बाँधते हैं। इसके बाद पाती को श्रृंगार की सामग्री चूड़ी, चुनरी, साॅल, अंगवस्त्र आदि से सजाते हैं।
 अष्ठमी के दिन पूजा- अर्चना कर रस्सीयों के सहारे पाती को नन्दा चैक में गड्ढा कर खड़ा करते हैं। नन्दोळ और ढोल-दमाऊँ की थाप पर नन्दा की घोड़ी और अन्य देवता अवतरित होते हैं। लाटू का पश्वा पाती पर चढ़कर कुणजु, श्रृंगार, खाजा आदि वितरित करता है। अन्त में पाती को मिलकर उखाड़कर नीचे उतारा जाता है।

अन्य जनपदों में पाती या पत्ती मेला
 पौड़ी गढ़वाल- बगेली थलीसैण, खण्ड तासपानी (पैठाणी) पट्टी कण्डारस्यूँ, जितोली बूँखाल, मणखोली-बुरानी, खातोली, सलोन, धूलेर में पाती मेला होता है। कई स्थानों में पाती के आयोजन को नया रूप दिया गया जिसमें गाँववार नवयुवकों की टोली बनाई जा रहीं है। फिर उनमें पाती पर चढ़ने की प्रतिस्पर्धा होती है। जो टोली पाती पर सबसे ऊपर तक चढ़ेगा उस गाँव के युवक को विजयी घोशित किया जाता है।
 चमोली में झिंझोणी, गैरसैण, धारापानी, कुंजापानी, आदिबदरी में पंज्याणा, नौना तोप, जोषीमठ के भ्यूण्डार, उर्गम, लाता, माणा, हरियाली देवी (धनपुर) क्षेत्र के दर्जनों गाँव में नन्दा अश्ठमी को पाती होती है।
 नागपुर परगना (रूद्रप्रयाग) में इसी उत्सव को ’’नन्दा कौथि’’ कहते हैं। यहाँ केले के घेंजे (तना) पर नन्दा मुख की आकृति बनाकर सजाते हैं। यहाँ बीरों-देवल, क्वीली-कुरझण, धनपुर में लाटू देवता में यह कौथि होता है।

ख- नन्दा-भितली पाती
चाँदपुर क्षेत्र के जिन गाँवों में नन्दा पाती या पत्ती नहीं होती है उनमें व्यक्तिगत या कुछ परिवार मिलकर विधि-विधान से ’कुणजू’ (विषेश प्रकार की औशधीय घास का पौधा) से छोटे रूप में ’’पाती’’ का निर्माण करते हैं। फिर पाती लोकोत्सव की भाँति इसमें भी ककड़ी, मंुगरी, ब्यूड़ा, खाजा (धान और कौणी को भुनकर ओखली में कूटकर) आदि नन्दा को भेंट करते हैं। नई चुनरी, अंगवस्त्र, साॅल, श्रृंगार आदि से सजाते हैं। चुनरी के अन्दर नव-अनाज (नौं-नाज) की छोटी-छोटी पोटलियाँ रखते हैं। इसे ही ’’भितली पाती’’ कहते हैं। बच्चे मिलकर घर-घर में पाती को नचाते हैं। अन्त में भितली पाती को गाँव के ’मंगरा’ (पानी के स्रोत) में ले जाकर विसर्जन करते हैं।

ग- मौडिवी लोकोत्सव
मौडिवी लोकोत्सव को जानने के लिए नौटी क्षेत्र की भूम्याळ उफराईं ठाँक को जानना आवष्यक है।
 कौन हैं? ऊफराईं देवी
इस कथा का आधार नन्दा के अनन्य भक्त स्व0 देवराम नौटियाल की पुत्रबधू प्रेमलता नौटियाल के आलेख और बैनोली गाँव में प्रचलित किवदन्तियाँ हैं। इस दैवीय षक्ति की उत्पति लगभग 1400 साल पूर्व मानी गई है। नन्दाधाम और चाँदपुर गढ़ किले के मध्य बैनोली गाँव है। यहाँ की महिलाएँ पशु-चारा, लकड़ियाँ इत्यादि लेने दस किमी दूर उफराईं ठाँक (डांडा) गये। इनके साथ आलम सिंह बैनोला की कुँवारी (अविवाहिता) पुत्री भी गई। दिनभर जंगल में घास-चारा-लकड़ी इकठ्ठा करने के बाद सभी घसेरियाँ घर की ओर प्रस्थान करने लगी। परन्तु वह छोटी कन्या दिखाई नहीं दी। घसेरियों ने चारों ओर जाकर कन्या को ’’धा’’ (आवाज) लगाई। परन्तु कोई उत्तर नहीं मिला। काफी ढूंढ-खोज करने के बाद घसेरियां निराष घर लौटी। गाँव में खबर मिलते ही समस्त गाँववासी इकठ्ठा हुए और ’’ऊफराईं ठांक’’ की ओर कन्या को ढूंढने निकले।
लगातार दो दिन तक ढूंढने के बाद भी कन्या का पता नहीं चला। निराष ग्रामवासी बैनोली लौट आये। यह संयोग था कि इसी रात्रि को नौटी के नौटियाल परिवार के मुखिया के सपने में वही कन्या दिव्य रूप में प्रकट हुई और कहा-
’’मैं बैनोली गाँव के आलम सिंह बैनोला की पुत्री हूँ। मैं आज से तीन दिन पूर्व जंगल घास लेने गई थी। यहीं से मैं अदृष्य हो गई हूँ। जिस ठाँक से अदृष्य हुई हूँ वहाँ मेरे स्वामी षिव षिलारूप (पत्थर) में विराजमान हैं। अब मेरा नाम ऊफराईं देवी होगा। मैं जिस डांडे से अदृष्य हुई हूँ उसे ऊफराईं ठाँक के नाम से जाना जायेगा। मैं वहीं वास करूंगी और तुम्हारे सम्पूर्ण क्षेत्र की रक्षा करूँगी।

 बिजौंण और मौडवी
षिव-अद्र्धांगिनी ऊफराईं ने आगे कहा- प्रतिबर्श बसन्त ऋतु आगमन के समय धान बोने से पूर्व एक ’’पाथा’’ (तौल का मापक ताँबे या रिंगाल का बर्तन) बिजोना (बुवाई के लिए रखा विषेश बीज) मेरी भेंट रखना। बैषाख माह (अप्रैल-मई) में गेहूँ की फसल पकते समय उसकी साबुत बाल, गेहूँ की ऊमी (भूनी हुई गेहूँ की बालियां से बने च्यूड़े), फसल कटने के बाद नये गेहूँ का आटा और पूर्व में रखा बिजौंण (धान) कूटकर मुझे भेंट चढ़ाने उफराईं ठाँक आना। इसी लोक-परम्परा को ’’बिजौंण (नया अनाज पूजा) कहते हैं।
कन्या स्वरूपा देवी ने आगे कहा- प्रतिबर्श बिजौण के अलावा प्रति बारह बर्शों में सभी मिलकर मेरी बड़ी पूजा करना। नौटियाल ब्राह्मण ने सपने की बात अगले दिन गाँवसासियों और बैनोली जाकर बताई। तब से नौटी और बैनोली की अगवानी में सम्पूर्ण क्षेत्रवासी उफराई ठाँक जाकर अनाज का भोग चढ़ाते हैं। इसी लोकोत्सव को ’’मौडवी’’ कहते हैं।
यह लोकोत्सव लग्नानुसार जेठ माह (मई, जून) में बड़े धूमधाम से होता है। नौटी में उफराईं देवी के निमित्त प्रतिबर्श चैत्र और षारदीय नवरात्रा का आयोजन होता है। जिसे राजगुरू नौटियाल के कुलगुरू मैठाणी ब्राह्मण करते हैं। गाँव की समस्त धियाणियाँ (विवाहिता) अपने मैत (मायके) आकर इस लोकोत्सव में आर्षीवाद ग्रहण करती हैं।

 पूजा ही नहीं एक अनोखी परम्परा:ः मौडिवी लोकोत्सव
’’मौडिवी’’ केवल सामूहिक पूजा के साथ एक अनोखी परम्परा भी है। इसे समझने के लिए षब्द का अर्थ जानना आवष्यक है। मो (प्रति परिवार) ़ डिबीली (पीतल धातु की खाना पकाने का बर्तन)। अर्थात इस पर्व के दिन प्रत्येक परिवार डिबीली (बर्तन) को ठाँक पर ले लाकर मौडिवी स्थान पर उसमें भात (चावल) पकाता है। देवी को भोग चढ़ाने के बाद यहाँ रखी ’’पठाल’’ (सपाट पत्थर) में परोसकर सामूहिक भोजन करते हैं।
 मौडवी का आयोजन बर्श
सन् 2026 में प्रस्तावित/आयोजित राजजात से पूर्व की मौडवी लोकोत्सव 02 से 11 दिसम्बर सन् 2024 में आयोजित हो चुकी है। मौडिवी लोकोत्सव में नौटी, मैठाणा, नैंणी, झुरकण्डे, बैनोली, छांतोली सहित चाँदपुर और रानीगढ़ परगने के कई गाँव सामिल होते हैं।
नौटी से उफराईं की यात्रा- स्व0 देवराम नौटियाल और प्रेमलता नौटियाल के आलेख के अनुसार अब तक मौडिवी सन् 1922, 1948, 1963, 1980, 1996, 2010, 2024 में आयोजित हुई हैं। मौडिवी लोकोत्सव के बाद तीन से सात बर्शों के अन्तराल में नन्दा राजजात यात्राएं आयोजित हुई हैं।
 पूर्व में बलिप्रथा- एक जानकारी के अनुसार सन् 1922 तक मौडिवी में बलिप्रथा का प्रचलन था। जिस पर मालगुजार (पदान), पैंचुली, सिर सुनार, औजी, बैनोली के मैतियों, काँसुवा के राजवंषियों, थोकदारों, षैलेष्वर के मठ पुजारियों का हक होता था। परन्तु सन् 1927 से बलिप्रथा बन्द हो गई, इसी के निमित्त सन् 1948 से यज्ञ का प्रावधान किया गया। यह यज्ञ अनुश्ठान प्रथा आज भी कायम है।
राजजात से मौडवी का सम्बन्ध
राजजात और मौडिवी का पारम्परिक सम्बन्ध नहीं है। श्री नन्दा राजजात यात्रा का नौवीं सदी से प्रारम्भ हुई। जबकि ’’मौडवी’’ लोकोत्सव उससे भी पूर्व आरम्भ हो चुकी थी। गढ़ नेरषों द्वारा राज षक्ति का प्रतीक ’’देवी भाश्य श्रीयंत्र’’ चाँदपुर गढ़ से नौटी में स्थापित करने के बाद राजजात यहाँ से आरम्भ की। नौटी की भूमि की ’’भूम्याळ’’ (क्षेत्र रक्षक) उफराईं देवी है।
गढ़ नरेषों द्वारा ’’मौडवी’’ लोकोत्सव को ’’श्री नन्दा राजजात यात्रा’’ से पूर्व पूजा की मान्यता और ऊफर्राइं को राज-राजेष्वरी का दर्जा दिया। क्यों किसी भी धार्मिक अनुश्ठान से पूर्व भूमि के भूम्याळ (क्षेत्र-रक्षक) की पूजा सर्वप्रथम की जाती है। यह परम्परा सभी जगह आज भी कायम है।
गढ़वाल की राजधानी चाँदपुर गढ़ (आदिबदरी) से देवलगढ़-श्रीनगर स्थानान्तरित होने के बाद से राज परिवार की ओर से काँसुवा के राजवंषी कुँवर को निमन्त्रण दिया जाता है।
 हरियाली पूड़ा त्यौहार
यह त्यौहार प्रत्येक बर्श चैत्र (मार्च) में नौ दिन तक राजगुरू नौटियाल के ग्राम में धूमधाम से मनाया जाता है। देवी को ’’धियाण’’ (बेटी या बहिन) की संज्ञा देते हुए चैत्र संक्रान्ति से नौ दिन तक नवरात्रा का आयोजन होता है। अन्य नवरात्रों की भाँति इसमें भी ’’जौ की हरियाली’’ जमाई जाती है। इसी नवरात्रि पूजा को ’’हरियाली पूड़ा त्योहार’’ कहते हैं। नवमी के दिन महिलाएं अपने-अपने घरों से रिंगाल की डालियों (टोकरी) में श्रृंगार सामग्री और चावल का हलवा मन्दिर में लाकर देवी को अर्पित करते हैं।
उत्तराखण्ड के अलग-अलग स्थानों की दृश्टि से देखें तो इसी चैत्रमास (मार्च) की संक्रान्ति के दिन से फूलदेई या फूल-फूलमाई या फूलसंक्रान्द लोकपर्व आरम्भ होता हैं। यह लोकपर्व एक दिन संक्रान्ति या संक्रान्ति से आठ गते तक या सम्पूर्ण चैत्रमास के दिनों में मनाया जाता है।

घ- राजजात मनौती लोकोत्सव
मनौती में राज-रूड़िया की भूमिका- राजकुँवर बसन्त पंचमी से लगभग एक माह पूर्व राजरूड़िया के गाँव छिमटा (दूधातोली के समीप) जाकर राजजात मनौती करने के लिए छोटी छंतोली निर्माण का निमत्रंण देते हैं। सन् 2027 की प्रस्तावित जात के लिए मनौती छंतोली निमत्रंण पदान श्री रघुनाथ सिंह कुँवर द्वारा दिया। बसन्त पंचमी से दो दिन पूर्व राजरूड़िया मनौती छंतोली को आदिबदरी धाम में लाकर राजकुँवर को सौंपते हैं। मनौती छंतोली को आदिबदरी से काँसुवा लाया जाता है। इस दिन पूरी रात नन्दा के जागर, पैरी गायन होता है। अगले दिन छंतोली लेकर नौटी जाते हैं। यहाँ मनौती छंतोली के साथ आये राजकुँवर और अन्य श्रद्धालुओं का भव्य स्वागत होता है। पंचमी के दिन राजगुरू और विद्धान ब्राह्मण राजजात का दिन-बार निर्धारित कर राजजात समिति के अध्यक्ष राजकुँवर घोशणा करते हैं। इसे ही ’’मनौती मेला’’ कहते हैं।
 मनौती में षैलेष्वर मठ का महत्व- नौटी में मनौती के बाद छंतोली बाबा औघड़नाथ की गद्दी-स्थल षैलेष्वर मठ में रखी जाती है। मनौती (बसन्त पंचमी) के बाद छः माह से एक बर्श के अन्तराल में चाँदपुर क्षेत्र में चारसींग वाला खाडू (मेण्डा) जन्म लेता है। ऐसी मान्यता है, और विगत राजजात तक यही हुआ है। यहीं से जात की तैयारियांँ आरम्भ होती हैं।

सिद्धपीठ कुरूड़ की नन्दा राजराजेष्वरीःः लोकजात
(कुरूड़ से बेदनी बुग्याल तक)
बधाण की नन्दा के नाम से प्रसिद्ध माँ राजराजेष्वरी नन्दानगर (नन्दाख) के कुरुड़ गाँव में विराजमान है। श्री राजराजेष्वरी नन्दा के बधाण में दो थान है। देवी ऋतु के अनुसार माघ से श्रावण तक कुरुड़ और छः माह भाद्रपद से माघ तक देवराड़ा थान में छः-छः माह वास करती है। कुरूड़ में गौड़ और देवराड़ा में हटवाल ब्राह्मणों द्वारा पूजा की जाती है। यहाँ देवी षिला के रूप में एकमंजिला इमारतनुमा स्थान में विराजमान है। यह सबसे प्राचीन मंदिर है। इसीलिए कुरुड़ सिद्धपीठ है। देवी ने सर्वप्रथम यहीं पर वास किया था। इसके पिछे अति सुन्दर कहानी है। कुरूड़ से प्रतिबर्श नन्दा की लोकजात का बैदनी बुग्याल तक जाती है, जिसमें चैदह सयानों सहित नन्दाख और बधाण क्षेत्र के नन्दाभक्त सम्मिलित होते हैं।
कुरूड़ डोली का राजजात में महत्व
कुरूड़ की डोली और राज छंतोली का आपस में घनिश्ठ सम्बन्ध है। अर्थात एक सिक्के के दो पहलू हैं। इन्हें पृथक नहीं किया जा सकता है।
राज-छंतोली के बिना राजजात नहीं हो सकती,
तो डोली के बिना राजजात पूरी नहीं हो सकती।
एक भक्ति तो दूसरी षक्ति का प्रतीक है,
षक्ति बिना भक्ति ’’श्रीहीन है,
इसलिए षाही काल से राजा राज-छंतोली के श्रीषक्ति को समर्पित करता है। तब नन्दकेषरी से कुरूड़ की राजराजेष्वरी डोली राजजात की अगवानी करती है। राजकुँवर द्वारा राजगुरू नौटियाल के माध्यम से कुरुड़ राजराजेष्वरी के पुजारी गौड़ ब्राह्मणों को डोली को लग्नानुसार प्रस्थान करने की सूचना दी जाती है। जब-जब श्री नंदा राजजात का आयोजन होता है दोनों का मिलन नन्दकेषरी में होता है।
कुरुड़ सिद्धपीठ डोली प्रस्थान कर छटवें दिन नंदकेषरी में राजजात के साथ मिलन करती है। सिद्धपीठ कुरुड़ में राजराजेष्वरी का मंदिर गांव के षीर्श स्थान देवसारी तोक में बना है। जनश्रुति के अनुसार यह मंदिर पहले चैनी के निकटवर्ती पालक गांव के पास था। वहां भूस्खलन होने से देवी की स्थापना इस थात में करनी पड़ी थी। वर्तमान में मंदिर का जीर्णोद्धार सन् 1915 में हुआ था। गर्भगृह में अधगड़ी पांच इंच की देवी की मूर्ति है। पास ही में सिंहवाहिनी दुर्गा की अश्ट भुजा मूर्ति विराजमान है। नंदा भगवती मंदिर के परिसर में ही एक स्थान पर पत्थरों का ढेर है, जिसे लाटू का स्थान कहा जाता है।
उत्सव डोली को मंदिर के सभा मंडप में प्रस्थान से दो दिन पहले से सजाकर श्रद्धालुओं के दर्षनार्थ रखी जाता है। भक्तजनों द्वारा नंदा को भेंट अर्पित की जाती है। ढोल-दमाऊं, घंटी, भंकोरों की स्वर-लहरी से सारा वातावरण उद्वेलित होता है। नंदा के अपने पष्वा पर अवतरित होती है और उससे पूछ (दोश, कारण और निवारण सम्बन्धी सवाल) की जाती है। मान्यता है कि पष्वा के निर्देषों पर ही विवादित मुद्दों को सुलझाया जाता है।
नन्दा की लोक जात
प्रत्येक बर्श भाद्रपद में लोकजात कुरुड़ से बैदनी तक अपने पौराणिक पन्थों से होकर सप्तमी के दिन वेदनी पंहुचती है। इसे छोटीजात कहते हैं। बैदनी में नन्दा के निमित्त लाई गई भेंट पूजा-अर्चना इत्यादि के बाद इसी दिन छोटीजात विश्राम के लिए वापस बांक गाँव पहुँचती है। दूसरे दिन विभिन्न गाँवों से होकर श्राद्धपक्ष की पूर्व बेला पर देवराड़ा स्थित अपने दूसरे थान में पहुंचती है। अतः भाद्रपद से माघ तक छः मास तक यहीं वास करती है।

लोकजात के प्रमुख पड़ाव
1-प्रथम दिन- श्री-षक्ति की यात्रा धरगांव-घाट होते हुए उस्तोली में विश्राम करती है। सम्पूर्ण गांववासी देवीयात्रियों के स्वागत के लिए रात्रि के समय अपने दरवाजों पर दिये जलाते हैं। जिससे सम्पूर्ण देवीमार्ग और गाँव प्रकाषमय हो जाता है। यात्रियों के खान-पान की व्यवस्था गांववासी करते हैं। रातभर जागरण होता है।
2-दूसरे दिन- उस्तोली से देवयात्रा भोजन के लिए लांखी जाती है। लांखी में गांव द्वारा आधे रास्ते तक बाजे-गाजे व भंकोंरों के नाद के साथ देवी की आवाभक्ति की जाती है। दिन के भोजन के बाद सरपाणी गांव में सांय को जनमानस से भेंट कर देवी रात्रि विश्राम को भेटी पहुंचती है। यहाँ इस दिन भगवती जागरण और घर-घर घी के दिए जलाते हैं।
3-तीसरे दिन- भेंटी से चलते समय दषोली क्षेत्रवासी (नन्दाकिनी घाटी) सुखताल तक भगवती को बधाण क्षेत्र (पिण्डर घाटी) छोड़ने आते हैं। मध्यमार्ग में डंुग्री गांव के बुटोला व बूंगा के फस्र्वाण सहित सम्पूर्ण गांव यात्रियों के स्वागत के लिए तैयार रहता है।
4-चैथे दिन- इस दिन भगवती के दर्षन के लिए सोल (बधाण) क्षेत्र के बूंगा, गेरुड़, कोलपुड़ी, बुरसोल, रतगांव, गुमुड आदि गांवों के लोगों का तांता लगता है। दिन का भोजन केरा व मैन गाँव में होता है। नन्दा दर्षन देने के बाद रात्रि विश्राम के लिए सूना गाँव आती हैं। यह थराली बाजार से दो किमी0 दूरी पर है। सूना देवराड़ी ब्राह्मणों का गांव है। अमावस्या की अंधेरी रात को उजाले में तब्दील करने के लिए घर-घर घी के दिये जलाकर दीवाली जैसी तैयारी की जाती है। परन्तु अब विद्युतीकरण के कारण यह प्रचलन कम हो रहा है। फिर भी देवी थान पर यह उत्सव देखने को मिलता है।
5- पाँचवे दिन- इस दिन सूना गाँव से चलकर थराली बाजार होते हुए चेपड़ों में विश्राम करती है। इस दिन का यात्रा मार्ग सबसे छोटा है।
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वेदनीकुण्ड से देवराड़ा थान आगमन मार्ग
सप्तमी के दिन पूजा-अर्चना के बाद छोटीजात समाप्त होती है। इसी दिन राजराजेष्वरी डोली-बाँक-चगड़ीगाड़-ल्वाणी-बमणसेरा-उलगां-हाट-बेड़ाधार-टुण्ड्री-गोठिण्डा-कूली-कुराड़- स्वगाड़ा-ढुंगाखोली-नन्दकेषरी-चिडिगां-दोलाग्वालदम-हाटकल्याणी-बुढजोला-त्रिकोट-बिजपुर-तलवाड़ी-थालाबैनाली-लोल्टी-तुंगेष्वर-देवराड़ा में पँहुचती है। यहाँ पूजा के लिए कुरूड़ के गौड़ ब्राह्मणों की बारी लगती है। बड़ीजात के समय भी कुरूड़ की राजराजेष्वरी के वापसी के पड़ाव इसी प्रकार रहते हैं।

देवराड़ा थान से कुरूड़ आगमन के पड़ाव
प्राचीन काल से ही इस हिमवान क्षेत्र में विराजमान नन्दादेवी हो या कुरूड़ की राजराजेष्वरी जन-जन की आराध्य रही है। क्योंकि दोनों ही षक्ति स्वरूपा हैं। केवल कार्य के आधार पर अलग-अलग नाम से पुकारी जाती हैं। प्राचीन काल से नन्दा राजषाही काल में कत्यूर षासकों से लेकर कुमाऊं में चंद व गढ़वाल में पंवार राजवंषियों की आराध्य रही है। इसी कारण भक्तों को दर्षन देने के निमित्त देवी का भ्रमण किया जाता रहा।
कुरूड़ की राजराजेष्वरी की छोटीजात बेदनीकुण्ड तक जाने के बाद वापस कुरूड़ न जाते हुए दूसरे यात्रामार्ग से देवराड़ा में आती है। यहाँ छः माह वास करती है। मूल थान कुरूड़ जाने के लिए प्रत्येक एक-एक बर्श के लिए यात्रा मार्ग और पड़ाव अलग-अलग हैं। जो इस प्रकार से हैं-
प्रथम बर्श
देवराड़ा से कुरूड़ आने का यात्रामार्ग- देवी पहले बर्श में देवराड़ा से प्रस्थान करते हुए सुनाईग्वाड़-मेटा-रायखोली-चैण्डा-काकड़ा-सूना-देवलग्वाड़-सुनाऊंतल्ला-पेनगढ़- सिलोड़ीकोठा-चिड़िगांमल्ला-अंगतोली-सैनाड़-सिमली-नाखोली-सणकोट-बांजबगड़-सैंती-घाट षिवालय में पूजाअर्चना के बाद कुरूड़ में अपने थान में विराजमान होती है।
दूसरे बर्श
देवराड़ा से कुरूड़ आने के यात्रामार्ग- देवराड़ा से प्रस्थान करती हुई सुनाऊंतल्ला- बज्वाड़-माल-मेल्ठा-देवल-किमनी-ढाल-नैल-आद्रा-पास्तोली-सालपुर-नौणा-बज्वाड़- आलकोट- भटियाणा-मेटा-धारबारम-गैरबारम-रैन-नामतोल-प्यूला-बमणगाँव-हरमनीमल्ला-देवपुरी-निलाड़ीद्यूला-खैनोली-स्यूंटानौगाँव-मरोड़ा-गढ़कोट-हंसकोटी-पाली-तल्लाबै-मींग-पैठाणी-बनैला-सिमली-नाखोली-सणकोट-अपने थान कुरूड़ में विराजमान होती है।
मान्यता है कि तत्कालीन गढ़पति षालिपाल पर नंदा का दोश लगा था। राजा ने अपने क्षेत्र में सुख-षांति और दोश निवारण के निमित्त प्रतिबर्श वेदनी और प्रति बारह बर्श में होमकुण्ड (त्रिषूली पर्वत के पाद क्षेत्र) तक नंदा को श्रद्धा से पूजा और विदाई का विधान तय किया गया।

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