यात्रा मार्ग- नन्दानगर से चलकर से चलकर सेंतोली-सेरा-काण्डई पुल-ग्वाला- तेफना- नन्दप्रयाग- कर्णप्रयाग होते हुए नौटी में विश्राम
राजयात्री नन्दानगर से प्रस्थान कर नन्दाधाम नौटी पँहुचते हैं। प्राचीनकाल में नन्दप्रयाग (छभ्.7) भी पड़ाव था। यात्रीदल के कर्णप्रयाग पँहुचने पर भव्य स्वागत होता है। यहाँ पर कोटी के ड्यूँडी ब्राह्मण बारह थोगी ब्राह्मणों को विदा करते हंै। कर्णप्रयाग से राजकुँवर एवं राजगुरू नौटियाल ईणाबधाणी-जाख-पुडियाणी होते हुए नन्दाधाम नौटी पँहुचते हैं।
नौटी में श्रीमद्भागवत कथा समापन
यात्रीदल का नन्दाधाम पँहुचने पर भव्य स्वागत होता है। उपस्थित विद्वतमण्डली, वेदपाठियों, राजपुरोहितों, पीठाधीष्वरों, महन्तों आदि की उपस्थिति में श्रीमद् भागवत पुराण होता रहता है। राजपरिवार के पँहुचने पर पुनः माँ नन्दा श्रीयंत्र स्थान में पूजा-अर्चना की जाती है। गुरू-राजकुँवर द्वारा विगत दिवसों से होने वाले श्रीमद्देवीभागवत कथा की पूर्णाहुति, ब्रह्मभोज, के साथ आज्ञानुसार समापन करवाया जाता है। सभी श्रीमद्भागवत कथा-वाचकों को राजवंषियों द्वारा दक्षिणा एवं भेंट देकर विदा किया जाता है।
राजगुरू नौटियाल द्वारा राजकुँवरों की विदाई
श्री नंदा राजजात यात्रा के सफल आयोजन पर चर्चा करते हैं। सन् 1987 तक लेखा-जोखा किया जाता था। दूसरे दिन राजगुरू प्रातः राजवंषी कुँवरों को श्री-आर्षीवाद देकर काँसुवा के लिए विदा करते हैं। इसके साथ इस ऐतिहासिक एवं साहसिक यात्रा का समापन होता है।
