यात्रा मार्ग- वाण से प्रस्थान कर लाटू देवता मन्दिर-रिणकीधार- कैलगंगा- द्वाणीग्वेर-जौलधारा होते हुए गैरोली पातल में विश्राम
समुद्रतल से 3021 मीटर पर स्थित गैरोली-पातल खुले वायुमण्डल में आसमान को छूती हुई हरी-भरी और बर्फ से लगदक चोटियाँ देखने को मिलती हैं। समस्त छंतोली-डोलियाँ, चैसिंग्या खाडू और यात्री लाटू की ’’अग्वानी’’ में रणकाधार होते हुए नीलगंगा पार कर खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए गैरोली-पातल की ओर बढ़ते है।
कैलगंगा में स्नान करके तिलपात्र करने का विधान है। मान्यता है कि इस नदी का जलस्तर और बहाव कितना भी अधिक हो पर ज्योंहि ’लाटू’ अपना निषान स्पर्ष करते हैं, तो नदी पार करना आसान हो जाती है। यात्रा की रक्षा के लिए धर्मभाई लाटू ने देवी से बचन लिया था। वास्तव में यहाँ से यात्रियों की सच्ची भक्ति और साहस की परीक्षा की घड़ी आरम्भ होती है।
द्वाणीग्वेर से जुड़ी कहानी: दानू देवता
नन्दा के एक और धर्मभाई दानू देवता हैं। इनकी वृद्ध पत्नी मृत्यु द्वाणीग्वेर में हुई थी इस स्थान पर राजकुँवरों द्वारा पूजा की जाती है। आगे दाड़िमडाली की चड़ाई पार करते हुए गैरोली पातल में विश्राम करते हैं। यहाँ देवदार के घने और हरे-वृक्षों हैं, इन्हीं वृक्षों के नीचे खुले आसमान में रात गुजारते हैं।
