ग्यारहवाँ पड़ाव- मुन्दोली ल्वाजंग

यात्रा मार्ग- फल्दियागाँव से प्रस्थान कर तिलफाड़ा-ल्वाणी-कोलानी-पडियारगाँव होते हुए मुन्दोली में विश्राम
समुद्रतल से 1750 मीटर ऊँचाई पर मुन्दोली सुगमित आवागमन की दृश्टि से अन्तिम स्थान हैं। यहाँ से ठण्डी का अहसास आरम्भ हो जाता है। फल्दिया गांव से आगे पिलफाड़ा है। इस स्थान में देवी ने ’’पिल्हवा’’ नामक दैत्य का संहार किया गया था। मंदिर में देवी की आधुनिक संगमरमर की मूर्ति स्थापित है। इससे आगे ल्वाणी में पूजा पाकर देवी रात्रिविश्राम के लिए मुन्दोली के लिए प्रस्थान करती है। मंुदोली में गोरिल, भूम्याल, जैपाल देवता और नंदादेवी की कटार विद्यमान है।
मुन्दोली के सम्बन्ध में एक रोचक कथा जुड़ी है- पूर्वकाल में इस स्थान पर एक दानू परिवार के यात्री की राजजात के दौरान मृत्यु हुई थी। तब से इस गांव में छतोली नहीं जाती है। मुंदोली गांव की परंपरा है कि जब भी वहां किसी वृद्ध की मृत्यु होती है तो उसकी याद में एक सुराई का पेड़ लगाया जाता है। यहाँ पर जवार बुड़िया का सुराई का पेड़ प्रसिद्ध है। जात पिलफाड़ा, ल्वाणी, बगरिगाड़ होते हुए विश्राम के लिए मुन्दोली पँहुचती है।
इधर यात्रा की सकुषलता और निर्विघ्नता की कामना के लिए राजपुरोहित नौटियाल के गाँव नौटी में श्रीमद्भागवत आरम्भ किया जाता है। कई यात्री इसी दिन रात्रि आवास के लिए समीप स्थित लोहाजंग तक भी आते हैं। यहाँ पर ठहरने के लिए खुला स्थान और कुछ होटल हैं।
हिमालय की मनोरम छटा का दर्षन कराता:ः लोहाजंग
मुंदोली से एक किमी0 आगे लोहाजंग एक रमणीक स्थल है। यहां से हिमालय समीप दिखाई पड़ता है। मानों हर यात्री हिमालय की चोटी को छूना चाहता हो। लोहाजंग 1910 मी0 की ऊंचाई में होने से यहाँ से बधाण परगना दूर-दूर तक दिखाई देता है। लोकगीतों व जागरों के अनुसार भगवती ने यहां लोहाजंग (लोहासुर) नामक दैत्य को मारा था। लोहासुर के साथ लड़ी गई इस जंग की स्मृति में इस रणभूमि को लोहाजंग के नाम से जाना जाता है। स्थानीय बोली में इस रण के मैदान को ’’ल्वाजिंग’’ भी कहते है। यहां सुराई के पेड़ पर बड़े-बड़े घंटे टंगे हुए हैं। घंटों के टंकार के बीच में हिमालय का दृश्य अत्यंत षोभनीय व नयनाभिराम सुख देने वाला दिखता है।
लोहाजंग में नंदादेवी का चबूतरा, धो-सिंह, काली, दानू तथा नंदादेवी के मंदिर हैं।

 वायसराय लार्ड कर्जन भी हुए प्रभावित यहाँ की मनोरम छटा देखकर
वर्ष 1905 में भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन ने ग्वालदम से आली बुग्याल जाते हुए कुछ दिन मंदिर के समीप के मैदान में डेरा डाल कर हिमालय-प्राकृति का आनंद लिया था। कर्जन द्वारा भ्रमण के लिए ग्वालदम-कनोल होते हुए दशोली तक निर्मित मार्ग को आज भी लार्ड कर्जन रोड़ कहा जाता है। गढ़वाल मंडल विकास निगम द्वारा यहां पर गेस्ट हाउस का निर्माण किया गया है। लोहाजंग में बांक, मुंदोली और बांण के उद्यमियों ने छोटे-छोटे होमस्टे, गेस्टहाउस, पेईंग गेस्ट के बनाये हैं। यहाँ पर प्रतिबर्श बांक, बलाण, मुंदोली गाँव मिलकर ’’रूपकुण्ड महोत्सव’’ सांस्कृतिक मेले का आयोजन करते हैं।
लोहाजंग में कई गाँवों की छंतोलियाँ राजजात के साथ मिलती हैं। यहाँ से त्रिशूल पर्वत श्रंृखला के दर्षन होते हैं। दूसरी ओर घाटी में पिंडर नदी नागिन सी बलखाती, सदानीरा, आत्मा को प्रषन्न करने वाले दृश्य प्रस्तुत करती है। लोहाजंग से वाण तक ऊंची-ऊंची ढलानों, पगडंड़ियों व बरसाती नालों व घने जंगलों के बीच विभिन्न वन्य जन्तुओं, पुष्पों, झरनों व पक्षियों के कलरव से सारा वातावरण गुंजित रहता है।

 ट्रेकिंग रूट:ः लोहजंग टू ब्रह्मताल
साहसिक और पैदल यात्रा के सौकीन पर्यटकों को लोहाजंग टू ब्रह्मताल साल के अधिकांष महीनों में सुलभ है। इसका टेªकिंग रूट- लोहजंग से चलकर-दालदुम-चैटियालढाबा- भेंकलताल- गुजरणी-तेलन्दी-झण्डीटाॅप-कुंजी-ब्रह्मताल हिम-उड्यार होते हुए ब्रह्मताल है। भेंकलताल में पुराने पेड़ों में लोहे की संगले लगी हुई देखने को मिलती हैं। ब्रह्मताल से आगे सुखताल, झपताल ट्रेकिंग भी हैं जिनका पैदल मार्ग नन्दानगर के बंगाली और थराली के सोल-डुंगरी से मिलता है। राजजात मुन्दोली से चलकर वाण की ओर प्रस्थान करती है।

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