यात्रा मार्ग- काँसुवा-महादेवघाट-चाँदपुरगढ़ी- उज्ज्वलपुर-तोप होते हुए सेम में विश्राम
यह पड़ाव समुद्रतल से 1530 मीटर की ऊँचाई पर गढ़ी के सबसे समीप वाला स्थान है। राजजात काँसुवा से चलकर दरमोली, पयां, महादेवघाट, मिरोली, हड़कोटी, चाँदपुरगढ़ पँहुचती है। चाँदपुरगढ़ी गढ़वाल के राजाओं की प्राचीन राजधानी रही है। यहाँ गढ़वाल नरेष टिहरी दरबार के महाराजा द्वारा षाही पूजा होती है। चाँदपुरगढ़ में पूजा का अधिकार खण्डूड़ी और नौनी ब्राह्मणों का है। षाही-पूजा को देखने के लिए सबसे अधिक श्रद्धालु आते हैं। यहाँ तोप गोरजा माई होते हुए राजजात सेम में विश्राम करती है। यहाँ के पुजारी सेमवाल जाति के ब्राह्मण हैं। सेम में नन्दा के साथ षिवजी, षैलपुत्री, उफरांईदेवी के मन्दिर (चाँदफूर्यांसैण) भी हैं। आदिबदरी के समीपस्थ लगभग तीस गाँव नन्दामय हो जाता है।
पुजारी के अनुसार उस काल में सेम प्रथम पड़ाव था। यहाँ से राजधानी स्थानान्तरित होने के बाद पड़ाव और यात्रामार्ग में बदलाव किया गया। तोपगाँव तोपाल जाति का प्रमुख निवास स्थान था। जिसे तोपगढ़ भी कहा जाता है। तोप मार्ग में प्राचीन बनावट का मंगरा (जलधारा) और राजराजेष्वरी का मन्दिर है। यहाँ के पुजारी नवनी ब्राह्मण हैं, वर्तमान पुजारी प0 जगदीष प्रसाद नवनी हैं।
इसी मार्ग के मध्य में प्रथम बदरी के समीपस्थ महादेवघाट गुफा और गढ़वाल के राजाओं की प्रथम राजधानी चाँदपुरगढ़ी स्थित है। जिसका वर्णन इस प्रकार है-
काँसुवा-चाँदपुरगढ़ी के मध्य महादेवघाट गुफा
काँसुवा से चलकर यात्री महादेव घाट गुफा स्थित प्राकृतिक षिवलिंग के दर्षन करते हैं। यहाँ आपलिंग है जो खण्डित आकृति का है। प्रचलित कथा के अनुसार महादेव घाट षिवलिंग, बगोली का बबलेष्वर षिवलिंग, और पिण्डर नदी के दांई ओर स्थित छांतेेष्वर पर्वत पर स्थित षिवलिंग एक ही ’’षिला’ के भाग हैं।
एक दन्त कथा अनुसार- छांतेष्वर क्षेत्र में एक ग्रामीण की गायें दिनभर जंगल में चुगने जाती थी। सांय को गाय का मालिक दूध दुहने लगाता था तो उनमें से एक गाय दूध नहीं निकलता। यह क्रम कही दिन तक चला। वह सोचने लगा कि आखिर इसका दूध कहाँ सूख रहा है। एक दिन पशुपालक ने जंगल से आते समय गायों का पिछा किया। देखा कि वह गाय जंगल रास्ते में ही झाड़ी की आड़ में लिंग आकृतिनुमा पत्थर के ऊपर अपना दूध गिरा रही है। यह देख पशुचारक ने गुस्से में अपनी कुल्हाड़ी से पत्थर पर ताकत से प्रहार किया, उस पत्थर के तीन टुकड़े पृथक हुए। इनमें से एक टुकड़ा बगोली के समीप गिरा वह बबलेष्वर महादेव, दूसरा भाग बैनोली के पास गिरा वह षैलेष्वर महादेव तथा तीसरा भाग काँसुवा के समीप गिरा वह महादेव घाट नाम से स्थापित हुए। मूल भाग इसी पर्वत पर रहा जो छांतेष्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है।
यहाँ से राजजात नारायणगंगा-आटागाड़ को पार करते हुए गढ़वाल के राजाओं की आदि-राजधानी चांदपुरगढ़ी आदिबदरी पहुँचती है। यहाँ आज भी गढ़ नरेषों के परिवार के हाथों नंदा-राजराजेष्वरी, कैलबीर, दक्षिणकाली की अतिविषिश्ठ पूजा होती है।
