कुटिला लिपि में लिखित बदरीनाथ के चार ताम्रपत्रों में स्पश्ट किया गया है कि कत्यूरी वंष में कार्तिकेयपुर (वर्तमान जोषीमठ) के राजाओं में ललितसुरदेव, पदमदेव और सुभिक्षराज ने नन्दादेवी को अपनी ईश्टदेवी घोशित की थी। यह ताम्रपत्र नौवीं सताब्दी के प्रतीत होते हैं। उनके द्वारा सम्पूर्ण गढ़-कुमाउँ में नन्दा के पावन मन्दिरों का निर्माण किया गया। गढ़वाली जागरों में नन्दा हिमालय-मैना पुत्री के रूप में भी स्वीकार की गई। नन्दा, गौरा, उमा, षैलपुत्री आदि नामों से भी सम्बोधित एवं प्रसिद्ध है।
कत्यूरी नरेष ललितसूरदेव ने सन् 853 ई0 में एक ताम्रपत्र में लिखा है कि कत्यूरी वंष के संस्थापक श्री निम्बरदेव नंदा भगवती के चरण कमलों के अशीम भक्त थे। कत्यूरीवंष के दूसरी षाखा के संस्थापक सलोणादित्य थे। पदमदेव द्वारा 10वीं सताब्दी में लिखित ताम्रपत्र में सलोणादित्य को भी माँ नन्दा का भक्त होना बताया गया है। कत्यूरीवषं की इसी दूसरी षाखा में आगे चलकर गढ़वाल के राजा चाँदपुर गढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुए। जिन्होनें लम्बे समय तक गढ़-कुमायूँ पर राज किया।
कत्यूरी वंष की पहली षाखा कार्तिकेयपुर से कुमायूँ क्षेत्र में गई और दूसरी षाखा ने चाँदपुरगढ़ी को राजधानी बनाकर राजकाज किया। एक जनश्रुति के अनुसार इसी वंष में आगे चलकर राजा भानुप्रताप हुए। वह बड़े प्रतापी एवं योग्य राजा थे। उनकी दो पुत्रियां थी। उनमें से एक पुत्री का विवाह धार राजकुमार कनकपाल से हुई। इसका वर्णन पूर्व में किया जा चुका है।
यहाँ पर इन जनश्रुतियों को झुठलाना या असिद्ध करना मेरा उद्देष्य नहीं है। इतिहास के काल घटनाक्रम में देखें तो भानुप्रताप का राज्यकाल आठवीं सदी के आसपास रहा है। किन्तु कत्यूरी नरेष ललितसूरदेव ने अपने सन् 853 ई0 में एक लिखित ताम्रपत्र में कत्यूरी वंष के संस्थापक श्री निम्बरदेव नंदा भगवती का भक्त होना बताया है। यह सिद्ध है कि गढ़-कुमायूँ के जनमानस का नन्दा के प्रति अघाध प्रेम और श्रद्धाभाव तब भी था, और अब भी है। यहाँ के राजा आपत्ति या युद्ध के समय कहीं न कहीं नन्दा की षक्ति से परिचित हुए हैं। साक्षात वृत्तासुरमर्दनी, नन्दा-माहेष्वरी भगवती तथा द्वापरयुग की देवकी-नन्दजाया व कृश्णभगिनी योगमाया को अपनी ईश्टदेवी घोशित की होगी। समय-समय पर देवी का स्नेह एवं आर्षीवाद प्राप्त होने पर माता, रूंदन-क्रुंदन के समय बहिन-पुत्री जैसे मधुर सम्बन्ध भी नंदा से जोडे़ होगें।
इस प्रकार 15वीं एवं 16वीं सदी में रचित जागरों से पता चलता है कि गढ़वाल के इतिहास में सबसे षक्तिषाली राजा अजयपाल हुए। नन्दा राजजात को विधिवत आयोजित करने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। इसी कालखण्ड में कुमायूँ में चन्दवंष के राजाओं के इतिहास में नन्दाजात का वर्णन आता है।
इस सम्बन्ध को मैं एक घटना से जोड़ना चाहूगाँ कि आज से लगभग 30 बर्श पूर्व मेरे गाँव में एक बुजुर्ग दादी कहती थी कि जब कभी हम जंगल में गाय-बकरियों के साथ अकेले रहते थे। जंगल के समीप एक गधेरे के किनारे नरसिंग का मन्दिर है। उस जमाने में सभी लोग पतबीड़ा (तम्बाकू) पीते थे। जंगल में अकेले रहने पर डर लगती थी। डर के मारे नरसिंग को याद करने पर नरसिंग किसी अपरिचित बुजुर्ग आदमी के रूप में आकर तम्बाकू पीने के लिए कहते थे। जब सचमुच किसी मानव के आने की आहट पर वह व्यक्ति तुरन्त जाने को कहता था। गाँव वाले आज भी अकेले होने पर नरसिंग को दगड्या (साथी) के रूप में पुकारते हैं।
दूसरी जनश्रुति पुशों भैरवनाथ की है। इस भैरव का मण्डूला (बड़े-बड़े पत्थरों से निर्मित मन्दिर आकार) गाँव के घराट वाले रास्ते में है। जब कोई घट्वाळा (घराट में अनाज पीसने वाला व्यक्ति) घराट से घर अकेला आता रहा होता तो यह भैरव भी उस व्यक्ति से काफी दूरी पर आगे-आगे चलकर किसी व्यक्ति के जाते हुए होने का आभास करता था। ताकि वह घट्वाळा डरे नहीं। गाँव की ओर बसागत क्षेत्र के समीप तक पँहुचने पर अदृष्य हो जाते थे। एतएव इस देवभूमि में देवी-देवताओं को षक्ति का प्रतीक के साथ-साथ उनसे सम्बन्ध भी जोड़े।
इस आधार पर ऋशिकेष वासी राजा हेमन्त और रानी मैणावती की पुत्री नंदा से बहिन-बेटी का रिष्ता स्थापित किया गया। इस विशय पर अभी गहनता से षोध और खोज की आवष्यकता है।
