नन्दा का चाँदपुरगढ़ी के राजाओं से सम्बन्ध

दक्ष प्रजापति के यज्ञ में माता सती के अग्निदाह करने के बाद षिवजी द्वारा सती के मृत षरीर से मोह हुआ। देवताओं के आग्रह पर विश्णु जी ने अपने सुदर्षन चक्र से पार्थिव षरीर के टुकड़े-टुकड़े किये। सती के षरीर के टुकड़े अलग-अलग इक्यावन स्थानों पर गिरे। कलयुग में वही स्थान सिद्धपीठ कहलाते हैं।
ऋशिकेषवासी राजा हेमंत और माता मंडूला के गर्भ से सती-पार्वती का पुनर्जन्म नंदा के रूप में हुआ, जो पुनः षिवजी को ब्याही।
हेमंत ऋशि के भाई भारद्वाज के वंष में एक प्रकांड ब्राह्मण ’’आद्यगौड’’़ पैदा हुए। आद्यगौड़ ऋशि देषाटन करते हुए धार मालवा गए। पँवार वंष के राजाओं ने उन्हें गुरूपद से सम्मानित किया। आद्यगौड़ ब्राह्मण ने राजा को बदरीनाथ यात्रा हेतु आमन्त्रित किया। कालान्तर में पँवार वंषीय राजकुमार कनकपाल बदरीनाथ यात्रा के लिए हरिद्वार-ऋशिकेष पहुँचे।
दूसरी ओर बदरी क्षेत्र में स्थित चाँदपुरगढ़ी में राजा भानुप्रताप राज्य करते थे, उनकी दो पुत्रियाँ थी, परन्तु पुत्र नहीं था। राजा को चिन्ता सता रही थी कि बिना पुत्र के राजवंष को आगे कैसे बढ़ाया जाय? एक रात बदरीनाथ जी भानुप्रताप के सपने में आये और कहा ’’राजन् धार मालवा का राजकुमार मेरी यात्रा के निमित्त हरिद्वार पँहुचें हैं। राजन! तुम वहाँ जाकर राजकुमार को मेरी यात्रा पर बदरीनाथ ले आओ। तत्पष्चात राजकुमार को चाँदपुरगढ़ी लाकर उनसे अपनी छोटी कन्या का विवाह करवा दो। तत्पष्चात राजपाट राजकुमार को सौंपकर मोक्ष की प्राप्ति हेतु मेरे धाम आना। अतः राजा ने बदरीनाथ जी के आदेष का अक्षरषः पालन किया।
चाँदपुरगढ़ी के राजाओं के पास देवताओं से संवाद करने के लिए ‘श्रीयंत्र’ था, जिसे ’’देवि-भाश्य यंत्र’’ कहा जाता है। वर्तमान में देवी का यह मूल ’’श्री यंत्र’’ राजगुरू के गाँव नौटि में स्थापित है। गढ़ नरेषों द्वारा बदरीनाथ जी की पूजा दुर्ग के समीप आदिबदरी और षिवजी की पूजा षैलेष्वर मठ में की जाती थी। अतः संवत् 745 विक्रमी (सन् 888) में कनकपाल राजगद्दी पर बैठे।
आद्यगौड़ और कनकपाल का ब्राह्मण-यजमान का अटूट रिष्ता धार मालवा से बन गया था। कनकपाल का चाँदपुरगढ़ी का जामाता बनने के बाद एक बार भारद्वाज-वंषज आद्यगौड़ ब्राह्मण किसी विषिश्ठ मौके पर राजा कनकपाल के निमन्त्रण पर चाँदपुरगढ़ी आये। राजा द्वारा गौड़-ब्राह्मण का श्रद्धा और प्रेम से सत्कार किया गया।
नरेष द्वारा आद्यगौड़ ब्राह्मण की खूब सेवा की। यह देखकर गई को देखकर हिमवन्त पुत्री नन्दा राजा से प्रषन्न हुई। देवी ने कनकपाल को दर्षन दिये। तब राजा ने नन्दा से बचन लिया कि देवी जब-जब आप अपने मायके ऋशाषों से ससुराल कैलाष की ओर गमन करेगीं, तब-तब कुछ दिन मेरे राज्य में रूककर विश्राम करेगीं। फिर देवी आपकी विदाई चाँदपुरगढ़ से होगी। देवी ने हाँ कहकर बचन दिया। उस समय से नन्दा का राजा से मायका का रिष्ता कायम हो गया। उसी विदाई को ’’श्री नन्दादेवी राजजात’’ कहते हैं। कनकपाल के वंषज गढ़वाल नरेष या टिहरी नरेष और बाद में उनके काँणसे छोटा भाई अर्थात कुँवर उस परम्परा का निर्वहन आज तक करते आ रहे हैं। राजजात चाँदपुगढ़ी पँहुचने पर टिहरी महाराजा की ओर से विषिश्ठ पूजा की जाती है। अपने छोटे कुँवर भाई को खड्ग भेंट की जाती है।
नंदादेवी राजजात समिति के संस्थापकों में से एक दिवंगत देवराम नौटियाल ने अपने संस्मरणों में लिखा है ’’राजा कनकपाल के छोटे भाई (कान्से भाई) चांदपुरगढ़ी के नजदीक जा बसे। उस स्थान का नाम काँसुवा पड़ा और वे काँसुवा के कुँवर कहलाये। राजा के गुरू आद्य गौड़ ब्राह्ममण के भाई-बंधु गोदी नामक तोक में बसे। गोदी का अपभ्रंष ‘नौटी’ हो गया और वे ब्राह्मण नौटियाल कहलाए। आठवीं सदी में राजा कनकपाल ने ’’देवता भाश्य श्री यंत्र’’ को नौटी ले जाकर एक चबूतरे में भूमिगत कर दिया था। वहीं पर राजपुरोहित द्वारा दैनिक विधि-विधान पूजा-अर्चना अब तक की जाती है। तब से यह स्थान ’’नंदा देवी श्री-पीठ’’ माना जाता है।

इस सम्बन्ध में मेरा मत कुछ भिन्न है, ’’श्री यंत्र’’ कनकपाल के समय नहीं अपितु अजयपाल द्वारा राजधानी देवलगढ़ स्थापित करने के समय श्री यंत्र नौटी में स्थापित किया होगा। क्योंकि कोई भी राजा ’’श्रीषक्ति’’ के बिना नहीं रह सकता। इसका उदाहरण श्रीनगर में ’श्रीयंत्र टापू’’ है। तब यह सम्भावना ज्यादा है कि अजयपाल ने मूल श्रीयंत्र नौटी और उसका प्रतीक श्रीनगर में अलकनन्दा के मध्य श्रीयंत्र टापू में स्थापित किया हो। नंदा जब ऋशिकेष से इस क्षेत्र से होते हुए ससुराल जाती थीं तो देवी की उसी विदाई-यात्रा को नंदा देवी राजजात कहते थे।
नंदादेवी ने इच्छा की थी कि मेरे पिता ने मुझे एक ‘नंगे साधु’ एवं निर्जन-निरीह भूमि में ब्याहा हैं, इसलिए मेरे मायके वाले आज से ससुराल क्षेत्र के अन्तिम सीमा कैलाष के पर्वतपाद होमकुण्ड तक मुझे विदा करने आएंगे।
अतः स्पश्ट है नौवीं षताब्दी (सन् 888 ई0 के बाद) से पंवार वंषीय कनकपाल ने श्री नंदादेवी राजजात का वृहद आयोजन आरंभ किया। कनकपाल से छत्तीसवीं पीढ़ी में आनन्दपाल तक ने राजजात का आयोजन चाँदपुरगढ़ी से किया। इससे आगे सैंतीसवीं पीढ़ी के नरेष अजयपाल ने राजजात का भार अपने छोटे भाई काँसुवा के कुँवर को सौंपी, तब से राजजात यहीं से आरम्भ हुई। कुँवर के साथ-साथ राजजात की व्यवस्था में सहयोग के लिए चैदह सयाने और मालगुजारी को नियुक्त किया।
पहले नन्दा राजजात समिति यात्रामार्ग के गाँवों, पड़ाव के गाँव के सहयोग से इसका अयोजन करती थी। देश आजादी के बाद सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन के साथ अब पर्यटक विभाग, वन विभाग, संस्कृति विभाग, जिला प्रषासन बाद में राज्य सरकारें, मिलकर राजजात के आयोजन में सहयोग कर रहे हैं। सन् 2000 से विभिन्न सामाजिक संस्थाएं भी अभूतपूर्व सहयोग कर रहीं हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *