उत्तराखंड का एक प्रमुख पारंपरिक लोकपर्व है, मुख्य रूप से यह त्यौहार उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं चैत्र मास की संक्रांति (मार्च मध्य) को बसंत ऋतु और नए प्रकृति बर्ष के स्वागत में मनाया जाता है। इस त्योहार को मुख्य रूप से बच्चे (फुलारी) घर-घर जाकर दहलीजों (डेळि)पर बुरांस और प्योंली, पैंया ग्विर्याळ, मेळू आदि के फूल डालते हैं जिनमें सुख-समृद्धि की कामना करते हैं । इसके लिए अलग अलग क्षेत्रों में लोक गीत गाते हैं
1-“फूलदेई, छम्मा देई”
2- जै घोघा माता पयां पाता,
फ्योंल्यां फूल,
मैनो बोलि क्येंका फूलों,
घोघान बोलि,
फ्योंल्यां फूल,
3-“फूलदेई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार”।
इस लोक परंपरा का उद्देश्य: यह त्योहार हिंदू कैलेंडर के चैत्र महीने की संक्रांति से मनाना आरंभ होता है, जो उत्तराखंड में बसंत के आगमन और नए साल का प्रतीक है।
इसे मुख्य रूप से छोटे बच्चों द्वारा मनाया जाता है, जिन्हें ‘फुलारी’ कहा जाता है। इसमें नन्हे बच्चे सुबह-सुबह रिंगाल की टोकरी (कंडी) में रंग-बिरंगे फूल लेकर घर-घर जाते हैं। वे घर की डेळि (चौखट) फूल अर्पित करते हैं।
लोकगीत: बच्चे
उपहार और आशीर्वाद: फूल चढ़ाने के बदले में प्रत्येक घर के लोग बच्चों को चावल, गुड़, मिठाई, और पैसे देते हैं।
यह त्योहार प्रकृति के प्रति प्रेम, सामुदायिक सौहार्द और उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति को दर्शाता है।
इस त्योहार को मनाने की लोक परम्परा भी क्षेत्रों के अनुसार अलग-अलग हैं,। जो इस प्रकार है –
1- अलकनंदा और मंदाकिनी घाटी में चैत्र माह की संक्रांति से 8 दिन तक।
2- कहीं-कहीं चमोली, अल्मोड़ा इत्यादि में एक दिन
3- टिहरी, उत्तरकाशी में एक माह तक चलती हैं।
फूलदेई पर्व बड़े धूमधाम और हर्षोल्लास से मनाया जाता है परंतु धीरे-धीरे यह स्थानीय परम्परा भी विलुप्त की ओर अग्रसर है क्योंकि बड़े त्यौहार आयातित त्यौहार और पाश्चात्य की ओर अधिक झुकाव के कारण लोक महत्व के इन पर्वों की ओर लोगों का ध्यान कम आकर्षित हो रहा है। क्योंकि पहाड़ में ही नहीं अपितु वैदिक और ज्योतिष विज्ञान में विभिन्न माह की संक्रांति और अमावस्या पर शुरू होने वाले त्योहारों का बड़ा महत्व है।
उत्तराखंड हिमालय के कुछ भागों में चैत्र माह की संक्रांति के एक दिन, कुछ भागों में संक्रांति से आठ दिन तथा कुछ भागों में पूरे चैत्र माह में यह पर्व छोटे नन्हे मुन्ने बच्चों द्वारा प्रत्येक घर की देहली में रंग-बिरंगे फूल डालकर मनाया जाता है। अंतिम दिवस पर सभी बच्चे सामूहिक भोजन पका कर आपस में मिल बांटकर खाते हैं।
इस अवसर पर अपने गांवौं मैं शक्ति की प्रतीक घोगा माताजी की डोली भी नाचे जाती है।
यह केवल निर्माण और लोक हर्षोल्लास नहीं अपितु अपनी नई पीढ़ी का भी इस विलुप्त होते पर्व से भी परिचय करवाना है।।
