चतुर्थ भाग (चाँदपुरगढ़ किला)

गढ़-नरेषों की राजसत्ता की प्रतीक: चाँदपुरगढ़ी दुर्ग

राजजात का आरम्भिक स्थल रही चाँदपुरगढ़ी के इतिहास को जानना अति आवष्यक है। राजजात के समय महाराजा टिहरी नरेष के हाथों से पूजा होती है। सन् 2000 में स्व0 महाराजा मानवेन्द्रषाह द्वारा की गई। सन् 2014 में महाराजा मनुजेन्द्रषाह और राजपरिवार के ठा0 भवानी सिंह के हाथों हुई।
आज तक का राजजात का इतिहास रहा है कि यहाँ सबसे अधिक जनमानस देवी के दर्षन करता है। परन्तु किन कारणों से किले को पड़ाव नहीं बनाया गया है। किले में कालिंका, राज-रक्षक कैलबीर का प्राचीन निषान और मुख्य सड़क पर गोर्जिया मन्दिर है। पूर्व समय में यहाँ पशु बलि प्रथा थी वर्तमान में बन्द कर है।

जनश्रुुुतियों एवं स्थानीय गीतों से पता चलता है कि गढ़वाल क्षेत्र के राजघराने में राजा भानुप्रताप सबसे साहसी, षक्तिषाली एवं प्रजापालक हुए हैं। इससे पूर्व के राजाओं के नामों की चर्चा कहीं भी सुनने को नहीं मिला है। लेकिन यह निष्चित है कि इस वषं का यहां इससे पूर्व भी लम्बा षासन रहा, नकारा नहीं जा सकता है।
1-राजप्रताप- इस राजा के बारे में कथा प्रचलित है कि वे उस समय अपनी माता के गर्भ में थे, जब उनके पिता की दिल्ली में मुगल सलतन के यहाँ अचानक आक्रमण होने से मृत्यु हो गयी। तब उनके बफादार सैनिकों एवं दासियों ने बड़ी चतुराई से महारानी को दिल्ली से गुपचुप षीधे भगवान बदरीनारायण की षरण में लाये। जहाँ रानी ने पुत्र के रूप में राजप्रताप को जन्म दिया। राजप्रताप का बचपन का लालन-पालन बदरी क्षेत्र में ही हुआ।
2-भानुप्रताप- यह राजा राजप्रताप के पुत्र थे। ये बड़े दयालु एवं सरल स्वभाव के साथ बदरी नारायण के परम भक्त थे। पिता के द्वारा प्राप्त राज्य से ही सन्तुश्ट थे। भानुप्रताप की केवल दो पुत्रियां थी। बड़ी पुत्री का विवाह कुमायूँ के चन्द राजाओं में हुई। परन्तु दूसरी कन्या के विवाह की राजा को बहुत चिन्ता थी। वे सोचते थे कि कन्या हेतु सुयोग्य वर और राजकाज के संचालन हेतु अच्छा राजकुमार मिल जाय तो जीवन सफल हो जाता। प0 हरि कृश्ण रतूड़ी द्वारा रचित गढ़वाल का इतिहास में उद्धरित किया गया है कि एक दिन बदरीनाथ उनके सपने में आये और कहा कि धार मालवा (गुजरात) नरेष का अनुज कनकपाल मेरी यात्रा के लिए आ रहा है। तुम्हारी कन्या के लिए सबसे सुयोग्य एवं अच्छा वर उसके सिवा कोई नहीं हो सकता है। उसी से तुम्हारा राज्यवषं भी चलेगा।
गढ़वाल में पँवार वंष का आगमन
राजा भानुप्रताप की कोई पुत्र नहीं होने से लगभग सन् 888 ई0 (संवत् 945 विक्रमी) में चाँदपुरगढ़ी के पाल वषं को इतिहास अपने पन्नों में समेट चुका था। यहाँ से गढ़वाल में पँवार वंष का आगमन हुआ। गढ़वाल में पँवार वंष का मूल पुरूश कनकपाल था। सन् 875 में धार की राजगद्दी पर वाक्पति बैठा था। कनकपाल वाक्पति का कनिश्ठ भाई था। वह बदरीधाम के दर्षन एवं तीर्थाटन करने आया था। वह सर्वप्रथम हरिद्वार होते हुए सहारनपुर में आया था। यहां पर कुछ दिन रहकर उन्होने गंगोह नगर बसाया। जिसके प्रमाण सहारनपुर के इतिहास में गंग नगर एवं कनिश्ठ या कनक नाम के सिक्के से पता चलता है।
कनकपाल साहसी और चतुर होने के साथ षिक्षा, संस्कृति और वेदान्त में बड़ी रूचि रखता था। सो गंगोह नगर मे एक ब्रह्मचारी साधु से षिक्षा लेकर उसी का षिश्य हो गया था। युवावस्था में ही उसके मन में परम वैराग्य धर कर गया। वेदान्ती गुरू का देहान्त होने के पष्चात कनकपाल अपने मित्रों एवं सहयोगियों के साथ गंगोह नगर को छोड़कर हरिद्वार गंगा स्नान एवं बदरीधाम के दर्षन करने निकला।
यद्यपि कनकपाल के हृदय पर कठोर वैराग्य एवं सांसारिक भोगों से दूर रहने की लालसा छाई थी। इधर परम असीम षक्ति की नियति कुछ और ही थी। भगवान बदरी-नारायण द्वारा कही बात के अनुसार राजा अपनी पुत्री सहित हरिद्वार पंहुचे। कनकपाल से मुलाकात कर उनको बदरीधाम की यात्रा कराने अपने साथ लाये। यात्रा-दर्षन करने के पष्चात राजा ने कनकपाल से बदरी-भगवान द्वारा सपने में कही बात सुनाई। कनकपाल बड़ा दयालु प्रवृत्ति का था। राजा के प्रेमपूर्वक आग्रह और बदरीनाथ जी की कही बात को ठुकरा नहीं सका। राजा की विनती स्वीकार की। भगवान के वरदान के अनुसार राजकन्या से विवाह कर कनकपाल यहीं राजसत्ता का आनन्द लेने लगा।
राजपूत जातियों का धार, मालवा, आबू क्षेत्र से इस पहाड़ी भाग में आगमन कनकपाल के बाद ही हुआ होगा। इन राजपूत-थोकदारी जातियों का यहाँ आना और आकर यहीं बसना इसके पिछे कई कारण हो सकते हैं-
पहला कारण यह हो सकता है कि धार-मालवा एक गरम प्रदेष था। ये जातियाँ घूमने आई होगीं तो यहाँ की ठण्डी जलवायु इन लोगों को अच्छी लगी।
दूसरा कारण धार-मालवा मैदानी इलाका एवं अनेक राजपूताना-गढ़ होने से अपने राज्य की सीमा विस्तार के लिए आपसी लड़ाई झगड़े अधिक होने के कारण इन जातियों ने अपने को यहाँ ज्यादा सुरक्षित महसूस किया होगा।
तीसरा कारण ये राजपूताना-जातियां बदरी-नारायण के दर्षन के निमित्त इस विश्णुपुरी में आये थे। राजा कनकपाल से परिचित होने पर स्वदेष प्रेम और अपनत्व की भावना से राजा ओतप्रोत हुए। तब चाहे राजा ने उन राजपूतों को यहीं बसने को कहा होगा या फिर यात्रा पर आये राजपूत-जातियों ने अपने को धार-मालवा से अधिक सुरक्षित महसूस करते हुए यहीं रहने का अनुरोध किया हो। इसका उल्लेख प0 हरिकृश्ण रतूड़ी द्वारा भी किया गया है।
उपरोक्त तथ्यों में सबसे अधिक सभ्भावना राजा में स्वदेष-प्रेम की भावना ने इन राजपूती जातियों को यहाँ बसने में काम किया। राज्य की सुरक्षा और सहयोग के लिए राजा ने ही इन राजपूतों को छोटे-छोटे गढ़ोें का दायित्व सौंपा। राजाओं द्वारा इस प्रकार के ठाकुरी-गढ़ों की स्थापना करना ही आगे चलकर उन राजपूती गढों में झगड़े की नीव पड़ गई थी। उनमें फिर से अपने भूमि विस्तार के लिए आपसी झगड़े-विवाद होने लगे। जिससे आजीज होकर इन्हीं की 37वीं पीड़ी में अजयपाल ने सन् 1500 से 1519 ई0 के मध्य लगभग 48 ठाकुरी-किलों को पुनः अपने राज्य में षामिल कर दिया था।

चाँदपुरगढ़ी (गढ़वाल) के राजाओं की सूची
इतिहास के पन्नों में गढ़वाल के राजा अर्थात टिहरी महाराजा को साक्षात बौलान्दा बदरी की पदवी से आज भी जाना जाता है। आज अल्पज्ञान के कारण कुछ जन टिहरी के महाराजा का राज्य केवल वर्तमान टिहरी, उत्तरकाषी और आंषिक देहरादून जनपद तक ही मानते है। जो कि भविश्य में आने वाले इतिहास के लिए गलत सूचना हो जायेगी। सन् 1815 से पूर्व सम्पूर्ण गढ़वाल एवं आंषिक कुमायुं भी चाँदपुरगढ़ी अर्थात टिहरी नरेष के राज्य का हिस्सा था।

श्राजप्रताप
1-राजा भानुप्रताप ,11-भक्तिपाल ,21-षुभयपाल, 31-पूर्वदेवपाल
2-कनकपाल, 12-जयचन्दपाल ,22-बिक्रमपाल ,32-अभयदेवपाल
3-ष्यामकपाल ,13-पृथ्वीपाल ,23-विचित्रपाल ,33-जयरामदेवपाल
4-पाण्डुपाल, 14-मदनपाल ,24-हंसपाल ,34-आषलदेवपाल
5-अभिगतपाल ,15-अगस्तपाल ,25-सोहनयासोनपाल ,35-जगतपाल
6-सांगतपाल ,16-सुरतिपाल, 26-कान्तिपाल ,36-जीतपाल
7-रत्नपाल ,17-जयत्सिंहपाल,27-कामदेवपाल ,37-आनन्दपाल
8-षालिपाल ,18-सत्यपाल, 28-सुलक्षणपाल ,38-अजयपाल
9-विधिपाल ,19-आनन्दपाल ,29-सुदक्षणपाल
10-मदनपाल ,20-विभोगपाल,30-अनन्तपाल

डाॅ0 षिव प्रसाद नैथानी लिखते है कि राजा अजयपाल को कुमायूँ के चन्दवंष के राजाओं ने युद्ध में पराजित कर किले को ध्वस्त किया था। तब राजा यहाँ से भाग खड़ा हुआ था। जो कि सरासर गलत है। क्योंकि किले की सन् 2004 से वर्तमान तक आधा से अधिक भाग की खुदाई होने पर कोई भी ऐसा प्रमाण अभी तक नहीं मिला है। यदि अजयपाल आक्रमण होने के

बाद किला छोड़ता तो अस्त्र-षस्त्र, वर्तन, अन्य सामग्री अथवा वस्तुओं के अवषेश अवष्य प्राप्त होते। अतः राजा यहाँ से अपनी राजधानी देवलगढ़-श्रीनगर सुनियोजित ढंग से ले गया था। जिसका पहले भी वर्णन किया जा चुका है।

2-आदिबदरी:ः मन्दिर समूह
आदिबदरी मन्दिर-समूह की निर्माण षैली उत्तराखण्ड के केदारनाथ, त्रियुगीनारायण मन्दिर, उखीमठ, गोपेष्वर गोपीनाथ, उत्तरकाषी विष्वनाथ, कालीमठ, तपोवन, मैखण्डा, बागेष्वर बागनाथ, सोमेष्वर, द्वाराहाट मन्दिर समूह, से मिलती-जुलती है।
नौठा-नारेण-आदिबदरी को नौठा नारेण भी कहते है। जो कि नारायण मठ का विगड़ा हुआ उच्चारण है। नारायण मठ का उल्लेख गढ़वाल राज्य में चलने वाली मुद्राओं में भी अंकित था। उत्तराखण्ड में स्थित सभी मन्दिरों का निर्माण षंकराचार्य द्वारा बताया गया है। लेकिन यह मन्तव्य संदेह पैदा करता है। क्योंकि मानवषक्ति, षिल्पी और साधन आदि षंकराचार्य जी साथ लेकर नहीं आये होगें। तब जगत्गुरू की प्रेरणा से चाँदपुरगढ़ी के राजाओं ने इस भब्य मन्दिर समूह का निर्माण किया होगा।
मन्दिर समूह के प्रमुख मन्दिर
विश्णु मन्दिर (मुख्य मन्दिर)
यस्मादिदं जगदुदेति चतुमर्मुखाद्यं, यस्मिन्नवस्थितमषेशमषेशमूले।
यत्रोपयातिविलयं च समस्तमन्ते, दृग्गोचरो भवतु मेद्य से दीनबन्धुः।।
काले पत्थर पर पर बनी श्री हरि की मूर्ति खड़े आयताकार रूप में है। मूर्ति मुख्यरूप चार प्रकार की आकृतियों में बंटी हुई है। सबसे उपर षंक्वाकार आकृति में मन्दिर की प्रतिमूर्ति है। जिसके नीचे दूसरे भाग में ऋशिनारायण का चित्र अन्य ऋशियों के साथ बैठी हुई आकृति में दिखाई गयी है। ऋशि चित्र के नीचे तीसरे भाग में षिव और पार्वती का चित्र आलिंगनबद्ध रूप में है। चैथे भाग में विश्णु जी के चारों दिषाओं में किन्नौर और गांधर्व षैली में सजावट की गई है। जिसमें विश्णु के दस अवतारों का चित्रण किया गया है। मूर्ति में बदरीनारा
यण जी के चार हाथ हैं। उठे दोनों हाथों में गदा एवं चक्र और नीचे की ओर आसन्न वाले बायें हाथ में षंक और दायां हाथ खाली वरदमुद्रा में है जो सम्पनता और भक्तों को आर्षीवाद प्रदान करने वाला है। गले में कण्ठाहार बैजन्तीमाला पहने हुए है।
मन्दिर समूह की सूची

1-विश्णु भगवान
2-गरूड़ मन्दिर
3-गणेष मन्दिर
4-गौरी षंकर मन्दिर
5-हनुमान मन्दिर
6-जानकी मन्दिर
7-राम-लक्ष्मण-सीता मन्दिर
8-षिव मन्दिर
9-काली मन्दिर
10-अन्नपूर्णा मन्दिर
11-लक्ष्मीनारायण मन्दिर
12-चक्रभान मन्दिर
13-सत्यनारायण भगवान
14-कुबेर मन्दिर

3- ओंकारानन्द आश्रम:ः आदिबदरी
महादेवघाट एवं बबलेष्वर महादेव के महन्त तारागिरी महाराज तक एक ही हुआ करते थे। तारागिरी के षिश्य कारानन्द हुए जिनका 70 के दषक में गढ़वाल विष्वविद्यालय स्थापना आन्दोलन में बड़ा योगदान रहा है। उन्हीं के नाम से आदिबदरी में ओंकारेष्वर षिवालय एवं धर्मषाला स्थापित है। वर्तमान में ओंकारानन्द के षिश्य रामानन्द महाराज इसके महन्त हैं।

सन्र्दभित सूची
1-हिमालय गजेटियर भाग-एक तथा दो-प्रकाष थपलियाल
2-गढ़वाल का इतिहास- प0 हरिकृश्ण रतूड़ी
3-उत्तराखण्ड अभिलेख एवं मुद्रा- षिवप्रसाद डबराल
4-आदिबदरी महात्म्य-भवगवती प्रसाद नवनी
5-चमोली जनपद तब और अब- उत्तराखण्ड सूचना विभाग
6-आदिबदरी पूजा विधि-कैलाष षाह
7-उत्तराचंल गाइड मैप एवं कुमायूँ गाइड मैप-नेस्ट एण्ड विंग्स
8-उत्तराचंल रोड एटलस-इण्डियन मैप सर्विस
9-विश्णुपुराण एवं मत्स्यमहापुराण कल्याण
10-नीतिसार अंक गीता प्रेस कल्याण
11-कुमायूँ हिमालय का समाज एवं पुरातत्व-प्रो0 षेर सिंह बिश्ट
12-यमुना बेसिन (गढ़वाल हिमालय) सांस्कृतिक भूगोल-डाॅ0 कमलेष कुँवर व आर0एस0 पँवार
13-देवराम नौटियाल का हस्तलिखित लेख
14-दुर्गासप्तषती-सन्तराम सन्त
15-उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्र नन्दादेवी राजजात
16-हीरा सिंह बिश्ट आलाजोखना, बीरेन्द्र सिंह रावत तेफना, प0 भुवन हटवाल पुजारी देवराड़ी, रमेष देवराड़ी देवराड़ा, प0 मन्षाराम गौड़ कुरूड़, हयात सिंह कठैत जाखणी अध्यक्ष दषोली बधाण, बलवीर सिंह रावत अध्यक्ष कोट-कण्डारा, मुन्षीचन्द्र गौड़, सुषील रावत अकेला पूर्व प्रमुख थराली, विनय बहुगुणा पत्रकार अमर उजाला, बसन्तषाह पत्रकार आदिबदरी, नरेन्द्र सिंह चाकर सामाजिक कार्यकर्ता, रामानन्द जी महाराज ओंकारेष्वर आश्रम आदिबदरी, ग्राम जुलगढ़ महिला मांगल समूह,
17-गड़िया ट्रेजरी आफिसर घण्डियाल थराली फोटोग्राफी एवं मिंगवाल जैंटा-कोटि एवं विभिन्न नन्दादेवी मन्दिरों से जुड़े पुजारीगण
18-बारह थौकी ब्राह्मण एवं चैदह सयानों से प्राप्त जानकारी
19-रघुनाथ सिंह कुँवर काँसुवा, त्रिलोक सिंह खत्री रा0जू0हाईस्कूल बेड़ी, सुषील कैलखुरा ग्राम-नैणी, महाबीर सिंह बिश्ट सीआरसी गैरसैण, अनवर सिद्धिकी जू0हा0स्कूल नगली, सुदर्षन सिंह बिश्ट सेंचुरी ट्रेडर्स कर्णप्रयाग, श्री किषनसिंह नेगी फोटोग्राफर आदिबदरी, प्रेमपाल नेगी रा0इ0का0 बूरा, बेनीलाल से0नि0 प्रधानाध्यापक, बृजेष कँुवर पूर्व जेश्ठ प्रमुख ग्राम-जुलगढ़, श्री विनोद रावत ग्राम-जुलगढ़, लोक गायक श्री किषन सिंह दानू ग्राम-बांक बधाण प0 चक्रधर प्रसाद थपलियाल पुजारी आदिबदरी, स्व0महेन्द्र सिंह भण्डारी अध्यापक रतूड़ा, राजेन्द ्रप्रसाद नौटियाल अध्यापक मालसी, हरिसिंह कुँवर सेवा नि0 अध्यापक, अनूप गुँसाईं (अध्यापक) ईड़ा बधाणी, राकेष कुमार टम्टा रा0इ0का0 भराड़ीसैण, डाॅ0 त्रिलोक सिंह कण्डारी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य, बचन सिंह नेगी प्रधानाचार्य जनता इण्टर कालेज प्यूँरा, मुकेष कुँवर प्रधानाचार्य एसजीआरआर आदिबदरी, अरूण कुँवर अध्यापक जनता इण्टर कालेज यमकेष्वर।
20- प0 भुवन नौटियाल महामंत्री राजजात समिति उत्तराखण्ड,
21-डाॅ0 राकेष कुँवर प्रो0 एवं अध्यक्ष राजजात समिति उत्तराखण्ड,
22-कल्याण सिंह रावत उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष केन्द्र देहरादून
23-राकेष कुमार कुँवर निदेषक पूर्व षिक्षा निदेषक डाॅ0 देवेन्द्र सिंह भण्डारी से0नि0 प्राचार्य, डाॅ दषम सिंह नेगी प्राचार्य पीजी काॅलेज कोटद्वार, डाॅ बी0पी0 नैथानी रीडर केन्द्रीय गढ़0 वि0वि0, डाॅ0 महावीर सिंह नेगी रीडर केन्द्रीय गढ़0 वि0वि0।
24-एक थी टिहरी-प्रताप षिखर, डाॅ0 सृजना राणा
25-नरेन्द्र सिंह नेगी के काव्यगीत
26-सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक हिमालय का महाकुम्भः श्री नन्दादेवी राजयात्रा सन् 2000
27-नन्दा राजजात 2000-रमाकांत बेंजवाल व नन्दकिषोर हटवाल
28-महर्शि अगस्त्य विजयते-मन्दाकिनी जन चेतना विकास समिति
29-श्री नंदा राजजात 2000-बदरी-केदार मन्दिर समिति
30-श्री जाखघार जी -गोविन्दराम षास्त्री
31-खजुराहा-कृश्णादेव
32-स्मारिका 2010-पर्वतीय पत्रकार एसोसिएषन उत्तराखण्ड
33-स्मारिका षताब्दी समारोह 1910-2010-श्री बदरीष कीर्ति संस्कृत विद्यापीठ डिम्मर
34-श्री उत्तराखण्ड रहस्य-महेषचन्द्र सारस्वत वैश्णव
35-महाकुम्भ हरिद्वार -प्रकाष थपलियाल
36-गढ़वाल हिमालय के मेले एवं त्योहार-डाॅ0मोहन पँवार व डाॅ0राकेष गैरोला
37-हमारा गढ़वाल- सत्य प्रसाद रतूड़ी
38-गढ़वाल गौरव गाथा-सत्य प्रसाद रतूड़ी
39-उत्तराखण्ड का नवीन इतिहास-डाॅ0 यषवन्त सिंह कठोच

लेखक परिचय
नाम-डाॅ ताजबर सिंह पडियार ’’परिहार’’
पिता का नाम- स्व0 श्री जसपाल सिंह पडियार
माता का नाम -श्रीमती षान्ति पडियार
जन्म- ग्राम-अरखुण्ड जनपद रूद्रप्रयाग
षैक्षिक योग्यता -एम0ए0 भूगोल, पी0एच0डी0
व्यवसाय-षिक्षक
कार्यरत स्थल- राजकीय इण्टर कालेज सलियाना, भराड़ीसैण, रा0उ0मावि0 विजयसैण रा0इ0का0 मालसी ब्लाॅक-गैरसैण चमोली।
वर्तमान में कार्यरत- रा0इ0का0 खदरी खड़कमाफ जनपद देहरादून
मेरी पसंद-सामाजिक सरोकारों से जुड़ा रहना ( छात्र जीवन से ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़कर पर्यावरण, स्कूली षिक्षा, रोजगार परक षिक्षा, 1198 में उखीमठ भूस्खलन, 1999 में चमोली-रूद्रप्रयाग-टिहरी भूकम्प में आपदा एवं पुर्नवास में मदद. तथा 2013 केदारनाथ बाढ़ में पीड़ित परिवारों की मदद करना आदि।
अब तक प्रकाषन- चण्डिका बन्याथ, -प्रयास पत्रिका-1 संकुल स्तर पर स्कूली छात्रों के साथ मिलकर सम्पादन 3-विभिन्न पत्रिकाओं में आलेख 4-प्रयास पत्रिका-2 ब्लाॅक स्तर पर स्कूली छात्रों के साथ मिलकर सम्पादन।

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