राजजात में विशिष्ट महत्व होता है नंदा-जागरों का

उत्तराखण्ड में दैवीय षक्ति के आह्वान के लिए गाये जाने वाले लोक गाथाओं के गीतों को जागर कहा जाता है। इनमें तन्त्र, मंत्र और यंत्र तीनों का समावेष रहता हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी जागरी (जागर गाने वाले) नंदा के पूजन, जातवर्णन, आह्वान, गाथा आदि जागर के माध्यम से सुनाते हैं। इन जागरों की महत्वपूर्ण दो विषेशताएं है-
 पहला- जागर साधारण बोलचाल की षैली में गाये जाते हैं ताकि इन्हें हर कोई व्यक्ति समझ सके।
 दूसरा- इन गाथाओं में आवाह्नन किये जानेवाले देवी-देवताओं द्वारा तात्कालिक समाज या समुदाय की रक्षा के लिए किये गये उपकार या कृपा-दृश्टि का वर्णन मिलता है। इससे आने वाला समाज परिचित होता रहता है। भले ही इन कहानियों अथावा गाथाओं में षब्द-संयोजन केवल लयवद्धता के लिए किया जाता है। पर भाव मूल में उन्हीं से जुड़ा रहता है।
भवगती नंदा को उत्तराखण्ड़ में देवी धियाण के रूप में पूजी जाती है। इसलिए इसके गीत आदि करूणमय है। परन्तु जागरों के माध्यम से कही मार्मिक घटनाओं का उल्लेख किया जा रहा है। पर जागरों के माध्यम से कही जागरों में भी नंदा को हिमालय के हेमंत ऋषि व माता मैनावती की पुत्री कहा गया है। नंदा-त्रिशूली कैलाश में शिव को ब्याही गई थी। राजपाट के सुख-वैभव को भोगने वाली राजकुमारी के विवाह के पश्चात निर्जन-कैलाश में कभी-कभी असह्यकष्ट एवं दूर तक फैले वीरान में एकाकीपन की वेदना उठानी पड़ी थी। उसका भी जागरों मंे वर्णन इस प्रकार मिलता है। कुछ इस प्रकार से हैं-
‘क्वी बैंणी दिने बाबान् सैण सिरीनगर,
क्वीं बैंणी दिन बाबान् बांका वनगढ़।
‘क्वी बैंणी दिने बाबान् नौलखा सलाण,
क्वी बैंणी दिने बाबान् काठी कुमाऊं।
सबसे लाडली मि दिन्यू ई त्रिशूली,
त्वै बाबा पर मेरो सराप पड्यान’……….।
उत्तराखण्ड में षक्ति रुपी धियाण (ब्याहता-स्त्री) दोष लगने व उसकी पूजा का विधान काफी प्रचीन है। नंदा धियाण हिमवंत ऋषि के यहां दोष लग जाती है। राजा हिमवंत के यहा प्राकृतिक विप्लव-सूखा पड़ जाता है। माता मैनावती नंदा के बुलावे के लिए धर्म भाई लाटूू और हीत भेजती है। गौरा अपने परमेष्वर से मायके जाने की अनुमति का वर्णन कुछ इसप्रकार से है-
‘चार दिन स्वामी मीं मैत जयांेदू,
खड़ी उठा स्वामी मेरो दादू बलालो आयूँ च।
गौरा तेरू कनौ मैत ह्वेये,
ब्याली सांझ बोदी मों मैत जयोंदो,
सांझ-सबेर नंदा त्योरो कनो मैत होये’
नन्दा के मायके वाले उनका विवाह अलौकिक औघड़ स्वरूप भोलेशंकर से नहीं करना चाहते थे। इसलिए ऋशाशु राज-परिवार उनसे नाराज रहते थे। भोले-षंकर नंदा को यह समझाते हुएकहते हैं कि मायके में तुम्हारा अपमान होगा। तुझे वहां सुस्वादु भोजन नहीं मिलेगा। जबकि तुम्हारी बहिनों एवं उनके जामातों को अच्छे-अच्छे पकवान खिलाये जायेगें। नंदा फिर भी अनुनय-विनय करके मायके चली जाती है। त्रिकालदर्षी के कथनानुसार मायके में षिव को अभद्र षब्द कहकर गोरा को अपमान किया जाता है। और कोई भी सगे-सम्बन्धी उनसे बात नहीं करता है। सभी बहिनों-जामातों को अच्छा खाना दिया जाता है, लेकिन गौरा को कंडाली (बिच्छु-घास) पकाकर खिलाया जाता है। और गौरा रुष्ट होकर अपने पतिगृह कैलाश-त्रिशूली वापस आ जाती है। नंदा का बोझिल-चेहरा देखकर भोलेनाथ को समझने में तनिक भी देर नहीं लगती हैं कि मायके में गौरा का अपमान हुआ है। शिवजी गौरा से पूछते हैं कि तुमने मायके में क्या-क्या भोजन किया है। षिवा मायके में हुए अपमान को छुपाना चाहती है जिसका बर्णन इस जागर से समझा जा सकता है-
मुलमुल हैंसदा तब शंकर कनी छुई लांदी, कनी
गांठ बांधीक गौरा तू रखणी छै।
ऊंन मेरी बड़ी आदर खातर करे स्वामी, खाण क’
दूधभात देई और क्या दैणू छौ।
झूठ न बोल गौरा त्वै ऊंन दूधभात नि देई,
त्वेन मैत कंडाली-कापली खाई।
अंतर्मन से दुखी नंदा अपने मायके के प्रति स्नेह ही व्यक्त करती है। शिवजी गौरा से कहते हैं कि यदि वास्तव में तुमने मायके में दूधभात खाया है तो उसका प्रमाण क्या है। नंदिनी द्वारा सत का अन्तः-स्मरण करती हुई मायके में हुए अपमान को छिपाने की प्रार्थना करती है। और ग्रहण किये अन्न को उगल देती है। लेकिन शंकर भगवान देखकर आष्चार्यचकित हो उठते हैं गौरा कनाली-भात की जगह खीर उगल रही है। देखते ही देखते कि चारों दिशाओं में दूधभात फैल गया है और हिमालय की चोटियाँ सफेद चादर सी दिखाई देने लगते हैं-जो बाद में ओला-वृश्टि कहलाया। इस कथा वृतान्त इस गीत में सुनने को मिलता है-
ना स्वामी मेरा मैत्यों भगार न लगावा, ऊंन मिं
दूधभात खिलाए, सच्ची बोलणी छऊं
तब शंकर बोदा, त मेरा सामणी उखाल,
नंदा खांयू ऊ दूधभात,
तब नंदा भगवती न सत जए,
उखाले वीं खायूं मैत को।
शंकर जी न देखें दूधभात फैलिगै चैदिसु,
जन डांडा मां हयंूऊ।
देवी-आगमन में जागरी, षुभ कार्यों में महिलाओं द्वारा मांगल आदि में गाने वाले बीच-बीच में परिवर्तन करते रहते हैं। लेकिन नंदा के जागरों की मूल-कथा और कथावस्तु एक ही रहती है। स्वामी प्रणवानंद द्वारा नंदा राजजात क्षेत्र में संकलित जागरों में चांदपुर गढ़ की राजकुमारी बलंफा (बल्लभा) नंदा की धर्म बहिन बताई गई थी दोनों में बडा़ अघाध प्रेम था।
गढ़वाल कुमाऊं की ईष्ट देवी के रूप में पूजी जाने वाली नंदा हीऐसी देवी है जिसकी जात(देवयात्रा) में गढ़वाल कुमाऊं के नर-नारी मिलकर श्रद्धा व भक्ति के साथ हिस्सा लेते हैं। इन जागरों में इतिहास और संस्कृति भी समाहित है। अतः पर्वतीय संस्कृति को जानने-पहचाना और समझना है तो इन जागरों की ओर ध्यान देना ही होगा।

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