12-बारहवाँ पड़ाव- वाण
यात्रा मार्ग- मुन्दोली से प्रस्थान कर लोहाजंग-ल्वालिंग-देवी चबूतरा होते हुए वाण में विश्राम
समुद्रतल से ऊँचाई-2450 मी0 की ऊँचाई में नीलगंगा और कैलगंगा के मध्य वाण गाँव अपने में कई प्राकृतिक, नैसर्गिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं को समेटे हुए है। यहाँ से हाड-मांस कंपकपा देने वाली ठण्ड आरम्भ होती है। इसलिए बर्शभर गरम कपड़े एवं षुद्ध ऊन के वस्त्र पहने जाते हैं। लोहाजंग से आगे घनघोर जंगलों को पार करके कई उतार-चढ़ावों के कच्चीबगड़ में नौटी व कुरुड़ से लाए गए चूरमा प्रसाद का हलवा देवी को चढ़ाकर पुजारियों में बांटा जाता है। इस स्थान को देव-दर्शनी भी कहते है। कच्चीबगड़ से वाण के प्रसिद्ध लाटू देवता के मंदिर के दर्शन होते हैं। इस मार्ग में कैलाचक, कुलिंग, खेत, पेरी, कोदिमा, डिडणा आदि छोटे-छोटे अस्थाई आधिवास हैं।
रहस्य और भक्ति का प्रतीक लाटू देवता: वाण
विष्व में षायद ही कोई ऐसा मन्दिर है जहाँ के द्वार या कपाट (किवाड़) भक्तों के दर्षन हेतु बारह बरस में एक बार खोले जाते हैं। ऐसा रहस्य और भक्ति और षक्ति का प्रतीक वाण का लाटू देवता है। स्थानीय बोली में लाटू का अर्थ जिसकी जीभ न होने से आवाज नहीं आती है। उसे लाटू कहते हैं। यहाँ जात के पँहुचते ही कपाट खोले जाते हैं। नन्दा राजजात से भेंट और पूजा के तुरन्त बाद पुनः दूसरी यात्रा तक के लिए कपाट बंद कर दिए जाते हैं।
नन्दा के धर्म भाई हैं लाटू देवता
लाटू नन्दादेवी का चचेरा भाई था। मान्यता है कि लाटू बहिन-नंदा को विदा करने जा रहा था। अत्यधिक थकान लगने से लाटू ने यहाँ पर मादक द्रव्य (षराब) का सेवन किया। जबकि इस क्षेत्र में मादक पदार्थ का आहार बर्जित है। जब देवी को पता चला तो वह लाटू भाई से रूश्ठ हो गई। देवी की रूश्ठता के प्रायष्चित करने के लिए लाटू ने खड्ग से अपनी जीभ काट दी। जिस कारण लाटू की आवाज नहीं है। लाटू का पश्वा नृत्य करते समय केवल इषारा करता है । वाण से लाटू का निशान (ध्वज) भी यात्रा की अगवानी करते हुए होमकुण्ड तक जाता है।
प्राचीन मान्यता के अनुसार यहां से आगे महिलाएं, बच्चे और बाजे-भंकोरे राजजात यात्रा वर्जित हैं। आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होने से यह प्रतिबन्ध कम हो रहा है। परन्तु देवीय मान्यताओं और प्राकृतिक विपदाओं को ध्यान में रखकर इसका पालन जरूरी है। क्योंकि इस यात्रा आधार धार्मिक मान्यताएं और परम्पराएं ही हैं। वेदनी से आगे महिलाएं और बच्चों के लिए वर्जित करने के पीछे हर पल प्राकृतिक विपदाओं का खतरा रहा है। जो कि हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है। सन् 2014 में ही भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। सन् 2027 में इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। राजजात से जुड़े कही चिन्तकों का मानना है कि यात्रा का मूल स्वरूप बनाये रखना आवष्यक है।
वाण में षामिल होने वाली प्रमुख देव-डोलियाँ
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सं0 देव डोली का नाम कहाँ से आगमन
1 दषोली की राजराजेष्वरी डोली दषोली
2 दषमद्वार की नन्दा दशोली
3 केदारकोट-रैंसचोपता की नन्दा केदारकोट
4 जस्यारा-कण्डारा की नन्दा जस्यारा
5 कनखुल की नन्दा कनखुल कपीरी
6 लाता नीती घाटी की नन्दा लता
7 सलूड़-डूंग्रा की नन्दा सलूड़
8 विरही-गौणा की नन्दा गौणा
9 बण्ड दषोली की नन्दा बण्ड
10 फस्र्वाण फाट की नन्दा क्षेत्रपाल
11 लासी का जाख देवता जाख थान
12 बदरी विषाल का प्रतीक बदरीनाथ
13 बदरीश छंतोली (2014) डिम्मर
14 अन्य निषान, डोलियाँ एवं छंतोलियाँ-
दषोली क्षेत्र से- पौल्या की छंतोली, हिंडोली की नंदा छंतोली, लासी की छंतोली (फस्र्वाण फाट), नौना-दशोली की छतोली।
पैनखण्डा क्षेत्र से- कोठी, मैठाणा की छंतोली।
अल्मोड़ा से- अल्मोड़ा की कटार, कोट-डंगोली की छंतोली।
नन्दानगर क्षेत्र से- स्यांरी, भीटी, भगवती, लाखी, दानू, रुपदानू, बूरा की नंदा छंतोली, यूना की छंतोली, सैंजी का सूर्य भगवान, आदि 200 से अधिक देवी-देवता षामिल होते हैं।
1- दषोली की राजराजेष्वरी डोली का मिलन स्थल: वाण
प्रथम दिन- दषोली की देवी डोली कुण्डबगड़-कुमजंुग-लुणतुरा में विश्राम।
द्वितीय दिन- मल्लाकाण्डा- फरखेत- बीजार- जाखनी-खुनाणा में विश्राम-लमसोड़ा- माणखी में विश्राम।
तृतीय दिन- चोपड़ाकोट- चरी- कांडई में विश्राम।
चतुर्थ दिन- खलतरा-मोठा-चामा-स्याना में विश्राम
पंचम दिन- मटई-बैरासकुण्ड-बैंरों में विश्राम।
छटवां पगना में विश्राम।
सातवां दिन- लणतरा में विश्राम।
आठवां दिन- ल्वांणी-सुंग-बोटाखाल-रामणी में विश्राम।
नौवा दिन- पडेरगाँव-आलाजोखना में विश्राम।
दसवां दिन- कनोल में विश्राम।
ग्यारहवां दिन- दषोली की डोली कनोल से चलते हुए वाण में राजजात में षामिल होती है। मुख्य दषोली की देवडोली के साथ जाख समेत नौ गाँवों डोली, छंतोली, निषान भी साथ-साथ आते हैं।
क्या? एक ही हैं कुरूड़ और दषोली की देवी
हाँ दोनों एक ही हैं! प्रष्न है दोनों जब एक ही हैं और रहती भी एक ही थान कुरूड़ में तो आखिर क्यों? डोलियों का भ्रमण पृथक-पृथक होता है। आइए जानते हैं-
चाँदपुरगढ़ी के राजाओं द्वारा यह व्यवस्था की गई थी कि कुरूड़ स्थित माँ राजराजेष्वरी की डोली 385 गाँवों में जात्रा करेगी। इसके लिए राजाओं द्वारा 14 सयाना भी निर्धारित किये, जिन्हंे वर्तमान में थोकदार भी कहते हैं। इन 385 गाँवों देवीनाली (अनाजभेंट) उगाने का अधिकार कुरूड़ के गौड़ ब्राह्मणों को दिया गया था। कालान्तर में समय अभाव के कारण देवी के भ्रमणक्षेत्र में गाँव अधिक होने से गौड़ ब्राह्मणों द्वारा दो डोलीयाँ बनाई गई। जिनमें से एक कुरूड़-बधाण की डोली तथा दूसरी यह कुरूड़-दषोली की डोली प्रसिद्ध हैं। कुरूड़-दषोली की देवडोली के गूँठ अधिकार में 72 गाँव रखे गये। तथा यहाँ के सयाना तेफना के दिगोली रावत है। षेश 313 गाँव कुरूड़-बधाण की देवडोली के यात्रा अधिकार में में रखे गये।
दषोली की राजराजेष्वरी(कुरूड़) देवडोली की मुख्य राजजात के अतिरिक्त दो अन्य छोटीजात और अर्द्धजात भी हैं। जो इस प्रकार से हैं-
प्-प्रतिबर्श लगने वाली छोटीजात
इस जात को स्थानीय जात भी कहते हैं। दषोली परगना देवी के मुख्य गोठ गाँव कुण्डबगड़ है। कुरूड़-दषोली देवडोली की प्रतिबर्श लगने वाली छोटीजात अगले तीन बर्शों में अलग-अलग मार्ग और पड़ाव से होकर जाती है। यह यात्रा रामणी (विकासनगर) के उपर बालपाटा बुग्याल तक जाती है। जो इस प्रकार है-
पहला मार्ग (प्रथम बर्श)- कुरूड़ से प्रस्थान करती हुई-फाकेख-विजार-जाखणी- चमतोली- कमेड़ा- तल्लामल्ला- तेफना से मंगरोल-रामवोरी-सेम-नन्दप्रयाग-महरबगटी-राजबगटी- सिमली-पाणीगैर-भेरणी-बैरासकुण्ड-इदमोली-मटई-पगना-ल्वाणी-सुन्न-नोठाखाल-रामणी- बालपाटा में भाद्रपद की सप्तमी को पूजा होती है।
इसी दिन पूजा के बाद डोल वापस रामणी आते हैं। यहाँ स्थानीय समिति द्वारा देवी को प्राप्त भेंट दो हिस्सों बाँटी जाती है। आधा हिस्सा पुजारी ब्राह्मणों को और आधा हिस्सा देवडोली यात्रा पर व्यय की जाती है। डोली अगले बर्श की छोटी जात तक कुरूड़ में विराजमान होती है।
दूसरा मार्ग (दूसरे बर्श)- कुरूड़ से प्रस्थान करते हुए नन्दप्रयाग तक प्रथम बर्श वाले मार्ग से सही आती है। इसके बाद नन्दप्रयाग से मठियाणा-चमोली- क्षेत्रमाल- गोणागाड़ी-निजमुला-पाणी-इराणी-झेंजी से बालपाटा में पूजा अर्चना के बाद इसी दिन पूजा के बाद डोल वापस रामणी आती है। पुनः डोली कुरूड़ में अगले बर्श की छोटीजात तक बारह माह तक विराजमान रहती है।
तीसरा मार्ग (तीसरे बर्श)- कुरूड़ से देवडोली प्रस्थान करती हुई-कुण्डबगड़- धारगाँव- नारंगी-गढ़कोट-सुंग-रामणी-बालपाटा में पूजा अर्चना के बाद उसी दिन रामणी में वापस आती है। डोली अगले बर्श की छोटीजात तक कुरूड़ में विराजमान होती है।
प्प्- अर्द्धजात के समय यात्रा के पड़ाव
कुरूड़(दषोली) देवडोली की प्रति छः बर्श में यहाँ से सप्तकुण्ड तक देवजात्रा लगती है। जिसे ’’अर्द्धजात’’ कहते हैं। अर्द्धजात कृश्ण जन्माश्ठमी से आरम्भ होकर षुक्लपक्ष की नन्दा-सप्तमी के दिन सप्तकुण्ड में पूजा-अर्चना एवं हवन होने के बाद सम्पन्न होती है। अर्द्धजात का मार्ग इस प्रकार है-
1-प्रथम दिन- देवी की अर्द्धजात हजारों यात्रियों के साथ कुरूड़ से प्रस्थान करती हुई कुण्डबगड़-लुणतरा में विश्राम।
2-दूसरे दिन- लुणतरा से प्रस्थान करते हुए खुनाणा-माणखी में विश्राम।
3-तीसरे दिन- माणखी से पैदल चलते हुए चैरी-चड़कोट होते हुए काण्डई में विश्राम।
4-चैथे दिन-काण्डई से खलतरा होते हुए नौठा मे विश्राम।
5-पाँचवे दिन-नौठा से चाका-सेमा होते हुए बैरासकुण्ड में विश्राम।
6-छटवें दिन- बैरासकुण्ड से प्रस्थान करती हुई बैरों-इकमौली-मटई-ग्वाड़ होते हुई मल्ला मटई में विश्राम।
7-सातवें दिन मटई से चलते हुए पगना में विश्राम।
8-आठवें दिन- पगना से चलकर भौंधार- चरबंग होते हुई ल्वाणी मे रात्रि विश्राम।
9-नौंवें दिन-ल्वाणी से प्रस्थान करती हुई बौंठाखाल होते हुई रामणी में रात्रि विश्राम।
10-दसवें दिन- यात्रामार्ग का अन्तिम आवासीय पड़ाव रामणी से देवीडोली पंचगण्डा-विनायक-बालपाटा में पूजा के बाद रात्रि विश्राम। कभी-कभी इसी दिन आगे-दणियानौली-पत्थरकूली-सूर्यहट-षान्तिविनायक-सिमटाईबुग्याल होते हुए सप्तकुण्ड में देवडोली और यात्री स्नान करते हैं। माँ के खुदेड़ नन्दोळ गाते हैं। पूजा, हवन एवं श्री संवाद के बाद ’’अर्द्धजात’’ सम्पन्न होती है।
11-ग्यारहवें दिन- देवडोली एवं यात्री वापस रामणी में आते है। रामणी में सयानों द्वारा देवी-चढ़ावे के दो भाग कर एक यात्रा पर व्यय और दूसरे षेश भाग को देवी के पुजारी गौड़ पुजारियों को भेंट की जाती हैं। पुनः अगले बर्श की छोटीजात तक दषोली की देवडोली कुरूड़ थान में विराजती है।
2- दषमद्वार की नन्दा का मिलन स्थल: वाण
रहस्य व रोमांच की श्रीनंदादेवी राजजात यात्रा से जुड़े ऐतिहासिक व धार्मिक पहलुओं पर नजर डाली जाए तो पूरी राजजात का अनोखा वृतान्त मिलता है। जात में दशमद्वार डोली का महत्व भी कम नहीं है। यही वजह है कि इस दशमद्वार डोली के बिना राजजात की कल्पना साकार रूप में नहीं आ सकती है।
गढ़वाल के गढ़ों में विषिश्ठ पहचान: दषोलीगढ़ (दषमद्वार)
गढ़वाल जिसकी पहचान गढ़ों के रुप में जानी जाती है उनमें से एक दशोलीगढ़ भी है। यह गढ़ नंदप्रयाग कसबे से 9 किमी0 दक्षिण की ओर कोट कंडारा गांव से करीब डेढ़ किमी0 की दूरी पर 5000 फीट की खड़ी ऊँचाई पर है। संभवतः इस गढ़ के गढ़पति ने सुरक्षा की दृष्टि से खड़ी चट्टान के ऊपर बनाया होगा। दुर्ग में पहुंचने के लिए दशोली गाँव के पूरब की ओर से कठोर चट्टान को काटकर करीब 200 सीढ़िया बनाई गई हैं। गढ़ 80 फीट चैड़ा एवं 80 फीट लंबे गोल से टापू पर स्थित है।
दुर्ग में सबसे पहले गढ़ का नौबतखाना स्थित है। यहाँ प्रातःकाल एवं रात्रिकाल में नौबत बजाई जाती थी। राज निवासस्थान और भगवती नंदा-दशमद्वार का मंदिर भी गढ़ में ही था। लेकिन गढ़ अब ध्वस्त हालत में है। जिसकी ध्वस्त दीवारें ही राजभवन की एकमात्र निशानी बची है।
दुर्ग से कुछ दूर सोन-धारियंू के पास एक प्राचीन लेंगुड़ा (बरसाती पहाड़ी सब्जी) का पेड़ था। किंतु वह अब टूटकर नष्ट हो गया है। आश्चर्यजनक बात यह है कि उसकी मोटी-मोटी कोंपलें जो 8 से 10 फीट लंबी और फुट भर मोटी अभी भी विद्यमान हैं। दूर-दूर से लोग इसे देखने के लिए आते हैं। समीप में भूस्खलन से इस ऐतिहासिक धरोहर को खतरा पैदा हो गया है।
नवरात्र पक्ष में सम्पूर्ण कोट क्षेत्र प्रति तीसरे वर्ष 64 बकरियों की बलियाँ देकर पूजा संपन्न करने की परम्परा रही है। लम्बे समय इस प्रकार की पूजा नहीं होने से 64 बलियांे की प्रथा समाप्ति की ओर है।
गढ़ से सटे ग्राम-समूह कंडारा, जेंटी, भटकोटी, सुनाली, नौली, हिंडोली, बांतोली, चटिग्याला आदि गांव हैं, जिन्हें कोट के नाम से जाता है। प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में कोट क्षेत्र के ग्रामवासियों को जब इस अद्भुत षक्तिषाली नंदा के दर्शन हुए तब से उन्होंने अपनी कुलदेवी के रूप में पूजा-अर्चना षूरू की। बाद लोगों ने नन्दा की शिलामूर्ति को द्योल में स्थापित किया। द्योल में लाते समय नंदा रोने-बिलखने लगी और पत्थर की शिलाओं को पकड़ने लगी, उन षिलाओं पर उंगुलियों के निशान आज भी स्पष्ट दिखते हैं। रोते हुए आँसू जिन शिलाओं पर अश्रुधार बनकर गिरे उनके निशान बने। जहाँ पर माता रोती हुई जमीन पर लेटी, उन शिलाओं के सपाट पत्थरों पर बालों के निशान बने। ग्रामीण इस स्थान को नन्दा आँसू कहकर पुकारते हैं। दशोलीगढ़ जाने वाले यात्री व भक्तगण इस अमिट स्मृति-चिन्हों को देखकर रहस्य में खो जाते हैं।
दषमद्वार देवी पूजा-अधिकार
यहाँ के पुजारी हिंडोली के पंत ब्राह्मण हैं। एक मान्यता के अनुसार- लंबे समय तक बर्षा नहीं होती है और फसलें सूख जाती हैं। तब कोट क्षेत्र के 09 गांवों के निवासी मिलकर वर्षा की कामना के लिए दषमद्वार देवी से प्रार्थना करते है। पूजा-अर्चना के कुछ घण्टे या दिन बाद बर्षा होती है। यहाँ दक्षिण काली, लाटू देवता भी हैं। देवी के द्वार पर जय-विजय व षील-सुशील नामक चार द्वारपाल की आदम-कद मूर्तियाँ अस्त्र-शस्त्रों से लैस हैं।
1- प्रथम पड़ाव- दषमद्वार से प्रस्थान करते हुए स्वर्खा (केदारू)-नौली हिन्डोली-कोट कण्डारा-तेफना-नन्दप्रयाग होते हुए राजबगटी में विश्राम।
2- दूसरे दिन- राजबगटी से प्रस्थान गण्डासू-काण्डई (यहाँ से दषाली की डोली और दषमद्वार डोली का एक ही मार्ग) में विश्राम।
3- तीसरे दिन- काण्डई से प्रस्थान-लमसड़ा-लुंणतरा-ल्वाणी में विश्राम।
4- चैथे दिन- ल्वाणी से प्रस्थान- रामणी-कनोल में विश्राम।
5- पाँचवें दिन- इस दिन कनोल से प्रस्थान कर वाण में राजजात से मिलन होता है।
परिवर्तन मार्ग- सन् 2014 राजजात में दषोली की दशमद्वार-डोली की यात्रा पड़ाव में कुछ परिवर्तन किया गया। प्रस्थान से मिलन तक के पड़ाव इस प्रकार निर्धारित किये गये हैं-
1-प्रथम दिन-डोली कोट-कंडारा से प्रस्थान करती है।
2-दूसरे दिन-नंदप्रयाग,
3-तीसरे दिन- राजबगठी,
4-चैथे दिन- कांडई,
5-पाँचवें दिन- ल्वाणी-लुंतरा,
6-छटवें दिन- रामणी,
7-सातवें दिन- आला,
8-आठवें दिन- कनौल में विश्राम
9-नवें दिन- वाण में राजजात के साथ मिलकर होमकुण्ड तक जाती है। और फिर इन्हीं पड़ावों से होकर वापस लौटती है। समापन के दिन यहाँ बड़ा मेला लगता है। अतः दशमद्वार के बिना नंदादेवी राजजात की कल्पना अधूरी है।
3- केदारकोट-रैंसचोपता की नन्दा मिलन स्थल: वाण
1- प्रथम दिन- देवडोली षुभलग्नानुसार अपने विश्रामस्थलों से होकर केदारकोट से -सैंज-खतोली सैंज में विश्राम।
2- दूसरे दिन- सैंज से प्रस्थान कर रैंस, चोपता (विनायक) में विश्राम।
3-तीसरे दिन- रैंस विनायक से चलकर जुनेर में विश्राम।
4- चैथे दिन- जुनेर से चलकर झलताल में विश्राम -ब्रह्मकुण्ड- क्वार-जडंग- खालिमा सिमार में विश्राम।
5- पांचवे दिन- खालिमा सिमार से चलकर लाटूविगड़ा होते हुए-वाण में राजजात के साथ मिलती है।
4-जस्यारा की नन्दा मिलन केन्द्र: वाण
1- प्रथम पड़ाव- जस्यारा से देवी प्रस्थान करते हुए जस्यारा-सिलगीं में विश्राम।
2-दूसरे दिन- सिलगीं से प्रस्थान कर-कण्डारा में विश्राम।
3- तीसरे दिन- कण्डारा से चलकर बांटोली में विश्राम।
4- चैथे दिन बान्तोली से प्रस्थान कर-सितेल-कनोल होते हुए-वाण में राजजात के साथ मिलती है।
5-कनखुल की नन्दा मिलन स्थल: वाण
1- प्रथम दिन- जात्री कनखुल-मैखुरा-कनखुल कण्डारा में विश्राम।
2- दूसरे दिन- कण्डारा से प्रस्थान कर बांटोली में विश्राम। बान्तोली से जस्यारा की नन्दा वाला मार्ग एक ही है।
3- तीसरे दिन- जस्यारा से प्रस्थान कर-नन्दानगर में विश्राम।
4- चैथे दिन- नन्दानगर से प्रस्थान कर सितेल-कनोल में विश्राम।
5- पांचवे दिन- कनोल से चलकर वाण में लाटू मन्दिर में राजजात के साथ मिलती है।
6- लाता-नीती घाटी की माँ नन्दा का मिलन स्थल: वाण
1- प्रथम दिन- देवी अपने मूल थान लाता से प्रस्थान कर-रेणी-तपोवन में विश्राम।
2- दूसरे दिन- तपोवन से चलकर औली-गौरसों-कुँवारीपास-पाणी-इराणी में विश्राम। 3- तीसरे दिन- पाणी इराणी से चलकर विनायकसैंण-रामणी में विश्राम।
4- चैथे दिन- रामणी से चलकर कनोल में विश्राम।
5- पांचवे दिन- कनोल से प्रस्थान करते हुए वाण में राजजात के साथ मिलन करती है। यहाँ की डोली सन् 1905 के बाद पहली बार सन् 2014 में जात में षामिल हुई है। लाता का मन्दिर षिव-षक्ति समय का माना जाता है। लाता की नन्दा का जात में षामिल होने का दिन मकर संक्रान्ति को तय करते हैं। सलूड़-डुंग्रा देवी का मायका माना जाता है।
7- सलूड़-डुंग्रा की नन्दा मिलन स्थल: वाण
सन् 2014 की राजजात के समय पहली बार लाता की नन्दा का सलूड़ में विश्राम स्थल बनाया गया। उसी समय सलूड़ से नन्दा डोली चली थी यात्रा मार्ग सलुड़ से प्रस्थान कर -सेमकुड़ा-ढकवानी- कालीगढ़-झेंकी-रामणी-सीतेल-कनोल होते हुए वाण में राजजात से मिलन किया।
8-विरही-गौणा (जोषीमठ) की की नन्दा मिलन स्थल: वाण
इस देवडोली के दो यात्रा मार्ग हैं-
पहला मार्ग- गौणागाड़ी से प्रस्थान कर -सैंजी-तड़ाकताल रामणी-कनेाल होते हुए वाण में राजजात से मिलन।
दूसरा मार्ग- प्रथम दिन-गौणागाड़ी से प्रस्थान करते हुए विरही-दुर्मी-पगना-झिंजी में विश्राम।
दूसरे दिन- झिंजी से चलकर-ईराणी-विनायकसैण-रामणी में विश्राम।
तीसरे दिन- रामणी से प्रस्थान कर कनोल में विश्राम।
चैथे दिन- कनोल से चलकर वाण में राजजात से मिलन करती है।
9- बण्ड क्षेत्र (जोषीमठ) की नन्दा मिलन स्थल: वाण
इस देवडोली के भी दो मार्ग है-ं
प्रथम मार्ग- नौरखगाँव-अखतला-रैंताल-खातीघट-किछली-कम्यार-किरूली-पांथरी-गौणा- तड़ाताल-रामणी-कनोल-होते हुए वाण।
दूसरा मार्ग-
प्रथम दिन- बण्ड से प्रस्थान करते हुए-दिगोली-लुँहा-मेहरगाँव-किरूली में विश्राम।
दूसरे दिन- किरूली से प्रस्थान कर पांथरी-गौणा-तड़ाताल में विश्राम।
तीसरे दिन- तड़ागताल से प्रस्थान कर रामणी में विश्राम।
चैथे दिन- रामणी से चलकर कनोल में विश्राम।
पांचवे दिन- कनोल से चलकर वाण में राजजात से मिलन।
उक्त दो यात्रा मार्ग अतिरिक्त एक अतिरिक्त मार्ग भी है।
10-फस्र्वाण फाट (दषोली) की नन्दा का मिलन स्थल: वाण
फस्र्वाण फाट (क्षेत्र) के क्षेत्रपाल से चलने वाली नन्दा देवडोली के तीन यात्रा मार्ग हैं-
पहला मार्ग-
प्रथम दिन- क्षेत्रपाल ’’देवथान’’ से चलकर-खैनुरी में विश्राम।
दूसरे दिन- खैनुरी से प्रस्थान कर भिकोट में विश्राम।
तीसरे दिन- भिकोट से प्रस्थान कर-धनाखर्क-रामणी होते हुए कनोल में विश्राम।
चैथे दिन कनोल से प्रस्थान करते हुए -वाण में राजजात से मिलन।
दूसरा मार्ग-
प्रथम दिन- क्षेत्रपाल से प्रस्थान करते हुए पाल-रांगताली-गोलिम- हरमनी- लस्यारी- लासी-मजेठी-क्वेरालीजंगल में विश्राम।
दूसरे दिन- क्वराली से प्रस्थान कर दानला जंगल में विश्राम।
तीसरे दिन- दानला जंगल से प्रस्थान कर रामणी में विश्राम।
चैथे दिन- रामणी से प्रस्थान कर कनोल में विश्राम।
पांचवे दिन- कनोल से चलकर वाण में राजजात से मिलन।
तीसरा मार्ग-
प्रथम दिन- क्षेत्रपाल से प्रस्थान कर मैठाणा-पलेठी-मैड़ में विश्राम।
दूसरे दिन- पलेठी से चलकर-सरतोली- भतग्याला- धारकोट-ग्योंखर्क में विश्राम।
तीसरे दिन-ग्योंखक से प्रस्थान कर दानलाजंगल-होते हुए रामणी में विश्राम।
चैथे दिन- रामणी से प्रस्थान करते हुए कनोल में विश्राम।
पांचवे दिन- कनोल से प्रस्थान करते हुए वाण में राजजात के साथ मिलन।
11-लासी जाख देवता (दषोली) निषान का मिलन स्थल: वाण
प्रथम दिन- जाख देवता के थान से प्रस्थान करते हुए लासी-लसियारी-संघाट महादेव-मजोठी में विश्राम।
दूसरे दिन- मजोठी से चलकर- सेमलग्गा सरतोली-मुनेर खर्क-पंचूणी डांडा- मृगचैण-पगना- रामणी- बूरा-गैरी- होते हुए कनोल विश्राम।
अगले दिन- कनोल से प्रस्थान करते हुए उपरोक्त वर्णित कई छंतोलियाँ साथ चलती हैं। सभी देव न्योजा-निषान, देव यात्री पैदल मार्ग में छोटे-बड़े खर्क (घास बुग्याल के मैदान) होते हुए वाण में राजजात से मिलन होता है।
12-श्री बदरीनाथ का प्रतीकात्मक विग्रह मिलन स्थल: वाण
ज्योर्तिमठ के रविग्राम के डिमरी श्री बदरीनाथ जी से प्रतीक को लेकर ज्योर्तिमठ-चमोली-नन्दप्रयाग में डिम्मर की बदरीष छंतोली के साथ यात्रा मार्ग में आगे बढ़ते हैं।
13-डिम्मर से श्री ’’बदरीष छंतोली’’
डिम्मर के डिमरी बदरीष की प्रतीकात्मक छंतोली को लेकर राजजात में षामिल होते हैं। यह राजजात से जुड़ी पारम्परिक प्रतीक और छंतोली नहीं है। बदरीष छंताली डिम्मर से प्रस्थान करते हुए-उमटा-नन्दप्रयाग-नन्दानगर-कनोल होते हुए वाण में राजजात से मिलन करते हैं।
14-अल्मोड़ा की कटार-पूजन स्थल: वाण
यहाँ पर अल्मोड़ा की ’’नन्दा कटार’’ पूजा का विषेश विधान है। इससे ओग लाटू देवता राजजात का ’’अग्वानी वीर’’ (पथ प्रदर्शक) होता है। राजजात का दल पंचायती चैक वाण मे रुकता है। यहां पर यज्ञ व सभी देवी-देवतओं की पूजा की जाती है। लोकगीतों के माध्यम से पता चलता है कि नंदा ने वाण के ग्रामीणों को आदेश दिया था कि मेरी यात्रा जिस दिन तुम्हारे गांव आएगी उस दिन तुम्हें अपने घरों के दरवाजे खुले रखने पड़ेगें। और मेरे साथ आए यात्रियों की सेवा करनी होगी। जो मेरे आदेश का पालन नहीं करेगा, उसे कुष्ठ रोग हो जायेगा। नंदा के उस आदेश को वाण के लोग आज भी शिरोधार्य मानते हुए अपने घर यात्रियों के लिए खुला रखते हैं। स्वयं अपनी गौशालाओं में रहते हैं।
लाटू का मन्दिर वाण गाँव से 02 किमी ऊपर खड़ी चड़ाई पर है। यहाँ एषिया का सबसे मोटा सुराई का पेड़ है। इसकी परिधि पंद्रह फीट है। इस वृक्ष के बीज कभी नहीं उगते।
वाण गांव से आगे लाटू के आर्षीवाद एवं यहाँ के साहसी पुरूशों के सहारे हजारों तीर्थयात्री निर्झन हिमालय की यात्रा के लिए अग्रसर होते हैं। लाटू के मार्गनिर्देषन में यात्रा निर्विघ्न ज्यूँरागली तक जाती है।
यहाँ से आगे की यात्रा थकाने वाली और निर्जन मार्ग आरम्भ होता है। यात्रा बुग्याल व हिमाच्छादित पर्वतों के बीच से गुजरती है। होमकुण्ड तक जाने का इतिहास स्वयं में कई रहस्यों समाहित किये हुए है। गढ़वाल व कुमाऊँ के सैकड़ों देवी-देवताओं का अद्भुत मिलन इस जात में होता है। यह यात्रा गढ़-कुमाऊँ को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधने का कार्य भी करती है।
वाण सड़कमार्ग का अन्तिम सुगमस्थल पड़ाव है। राजजात यहाँ से दुर्गम पहाड़ियों के बीच गैरोली-पातल की ओर प्रस्थान करती है।
