(माँ नन्दा का ससुराल क्षेत्र प्रारम्भ)
यात्रा मार्ग- भगोती से प्रस्थान कर नारायणबगड़-मींगगधेरा-हरमनी-नगर कोटियाला होते हुए कुलसारी में विश्राम
क्यूर (केवर) का राजजात में महत्ता
राजजात भगोती के ’’केर’’ (मायका और ससुराल क्षेत्र की सीमा) क्यूर गदेरा के बाद (ससुराल क्षेत्र) श्रीगुरूगढ़ पट्टी में प्रवेष करती है। यात्रा का सातवाँ व आठवाँ पड़ाव क्रमशः भगोती व कुलसारी नारायणबगड़ ब्लाॅक में हैं। दोनों पड़ाव और आवागमन की दृश्टि से सुगम है। पिण्डर की तलहटी में बसा कुलसारी समुद्रतल से 1075 मीटर ऊँचाई पर है। भगोती पड़ाव श्री नंदादेवी के मायके का अंतिम पड़ाव है। इसके समीप मींग गधेरे से नन्दा का ससुराल क्षेत्र आरम्भ होता है। भगोती में विश्राम के बाद नंदा की जात अपने ससुराल क्षेत्र में प्रवेश करती है। इस पड़ाव पर नंदादेवी को ससुराल भेजने के लिए श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ता है।
नन्दा की ससुराल की सीमा:ः क्यूर गधेरा
महिलाओं द्वारा अश्रुपूरित नेत्रों व रुंधे गले से गाए जाने वाले करुण नन्दा-गीतों से देवी की विदाई की जाती है। नन्दा का मायके के प्रति आत्मीयता से भरा प्रेम यात्रियों की आंखों को नम कर देता है। यह विदाई का दृष्य देखने लायक होता है। नन्दा के पश्वा बारम्बार ससुराल की केर से मायके की ओर दौड़ पड़ते हैं। फिर महिलाएं अपने करूणमय गीतों और ढोल बादक जागरों के माध्यम से नन्दा को समझाते-बुझाते हैं।
देवी की यात्रा जब मायके के अंतिम गांव केवर से होते हुए ससुराल क्षेत्र की ओर को प्रस्थान करती हैं तो मींग-गधेरे को पार करते वक्त मायके के लोगों द्वारा अपनी ध्याणी (बेटी) की विदाई तथा ससुराल पक्ष द्वारा देवी का स्वागत जैसा अद्भुत संयोग इस सचल महाकंुभ यात्रा में यहीं पर देखने को मिलता है।
ऐसा ऐतिहासिक दृश्य षायद ही अन्य किसी यात्रा में देखने को मिले। राजजात नारायणबगड़, पंती, बैनोली, मींग, हरमनी, नगरकोट, होते हुए कुलसारी पँहुचती है।
यहाँ से ससुराल क्षेत्र की ओर से चैदह सयानों में बुटोला थोकदारों द्वारा सहयोग किया जाता है। यात्रा मार्ग में रतनी, केषपुर, विनायक, देवल, बेडुला, देवीधार, बंगा, भुत्यारा, स्वान, धारबारम और पिण्डर पार से गढ़कोट, गराई, सिलोड़ी, पेनगढ़ आदि ग्रामीण नन्दा का भव्य स्वागत करते हैं।
यात्रा पड़ाव मार्ग में सम्मिलित प्रमुख देव डोलियाँ
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सं0 देव डोली का नाम कहाँ से आगमन
1 नैंणी की पारम्परिक छंतोली नैणी (नारायणबगड़)
2 किमोली की पारम्परिक छंतोली थ्कमोली
3 केदारू देवता की पारम्परिक
4 कोब की भगवती की छंतोली केब
5 कोब के महादेव की छंतोली केब
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पंती का मसाण-देवल षिवालय
समुद्रतल से ऊँचाई 1100 मीटर पर सातवें पड़ाव के इस मार्ग में नारायणबगड़ से चार किमी दूरी पर पंती शिवालय है। इस शिवालय का निर्माण षकराचार्य ने किया था। यह षिवालय विशाल शिलाओं को तराश कर लोहे के कुंड़ों से जकड़कर बनाया गया है। इसे मसानद्योल अथवा ’’मसाणों’’ (प्रेतआत्माएं) का देवालय भी कहते हैं।
इस देवालय के बारे में रोचक कहानी है- पिण्डर नदी के दूसरी ओर एक धर्म षिला (विषाल पत्थर) है। इसी के उपर कुँमाऊ व गढ़वाल के प्रभावशाली जातियों के व्यक्तियों की मृत्यु होने पर उनकी अत्येष्टि की जाती थी। चिताओं की संख्या के आधार पर शिला का आकार स्वायं बढ़ता-घटता था। अनजाने में एक अंग्रेज अफसर ने इस शिला पर जूते पहने ही पैर रख दिया तो धर्म शिला जलमग्न हो गई। इस घाट के आगे चट्टान पर एक अदृश्य द्वार बताया जाता था। जिस चिता के जलने के दौरान अगर इस द्वार से एक साथ कई आवाजें आए तो उसके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं।
एक बार बागेश्वर से किसी प्रभावशाली व्यक्ति का षव अंत्येष्टि के लिए लाया गया। देर हो जाने पर षव को धर्मशिला में अकेले छोड़ दिया गया। षव खटोला (षव को ले जाने के लिए बाबलू घास की रस्सी से बँधी बाँस की लकड़ी की आकृति) सहित उड़ कर सामने के चोटि पर चले गया इसीलिए इसका नाम खटोला पर्वत पड़ गया। उक्त पर्वत पर खटोला की आकृति दिखाई देती है। मंदिर के निकट पहले मसानों का वास हुआ करता था। यहाँ अकेले घूमना जोखिम था। लेकिन मानवीय बसाव एवं गतिविधि बढ़ने से अब ऐसी डरने की कोई बात नहंीं हैं।
मींग का नारायण मन्दिर
इस मन्दिर की समुद्रतल से ऊँचाई 1100 मीटर है। एक अन्य लोककथा के अनुसार नारायणबगड़ के झिजोंणी गांव का एक साहसिक व्यक्ति इस स्थान से चिता की एक मशाल (जलती हुई लकड़ी) को अपने घर ले गया।
इस मंदिर से तीन किमी0 आगे नारायण का मंदिर है। पहले यह मंदिर पैय्यों गांव में था। तीस के दशक में पिंडर नदी की बाढ़ से सारा गाँव बह गया। तब सन् 1930 में नारायण-मंदिर की स्थापना मींग में की गई। डंुगरियाल के सती इस मंदिर के पुजारी थे। परन्तु वर्तमान में पुजारी लखेड़ा ब्राह्मण हैं।
राजजात के इस पड़ाव मार्ग में दक्षिणकाली, लक्ष्मीनारायण, सूर्यीागवान, हनुमान की मूर्तियां हैं। यहां से दो सौ मीटर की दूरी पर बसर में त्रिमुखी-षिवालय, महिसासुर मर्दनी काली की शिलामूर्ति, मंदिर के आंगन की शिला पर विष्णुभगवान की चरण पादुका सहित काले पत्थर की नक्काशीदार मूर्तियां हैं।
कुलसारी का काली यंत्र
यहाँ पर सदियों पुराना काली यंत्र भूमिगत है। राजजात के समय राजाओं द्वारा काली यंत्र पूजा होती है। काली यंत्र स्थान का नक्शा पुजारी के पास होता है। उसी अनुसार मन्दिर से चलकर भूमिगत यंत्र को खोदकर निकालते है। कुलसारा ब्राह्मण द्वारा राजकुँवर के हाथों पूजा होती है। चक्र-निर्माण की पूजा भी कुलसारा ब्राह्मणों करते हैं। परन्तु मंदिर के मुख्य पुजारी डिमरी ब्राह्मण हैं।
कुलसारी काली की पूजा और काली जाप अमावस्या की रात्रि ही होती है। यहाँ पर सड़कमार्ग से आवागमन की सुविधा है। परन्तु राजजात पैदल ही आगे बढ़ती है।
कुलसारी में देवी मंदिरों का निर्माण प्राचीन कल्यूर शिल्प षैली में बना है। यहाँ पर अमावस्या की रात्रि को यंत्र की पूजा होती है। यहाँ पर कुमाऊं-गढ़वाल की लगभग 200 से अधिक छंतोली राजजात में षामिल होती है। इस यात्रा में कुछ ही छांतोली और गाँवों के सम्मिलित होने का उल्लेख है। जबकि राजजात मार्ग में स्थित लगभग 180 से अधिक गांवों की जनभावनाएं जुड़ी हैं।
मेरे द्वारा राजयात्रा मार्ग/पड़ावों के भ्रमण के दौरान (2014) लोगों का कहना है कि गढ़वाल-कुमाऊं के कई स्थानों पर लोक जागर की महत्ता है, लेकिन इन गाँवों/स्थानों की उपेक्षा की जा जाती रही है। लाता, उर्गम, दशोली, सुभाई-घाटी के जागर, नन्दा गीतों पर षोघ करने की आवष्यकता है। ताकि यात्रा को व्यापक रूप दिया जा सके। दूसरे में वर्तमान में कई गाँवों/स्थानों के श्रद्धावानों द्वारा माँग की जा रही है कि मुख्यजात के मार्ग से उनके क्षेत्रों को भी जोड़कर देवी की सेवा करने का मौका मिल सकें। यह भावनाएं सम्मानजनक और अच्छी हैं। लेकिन हर गाँव को जोड़ना या वहाँ राजजात का विश्राम करना कठिन है। क्योंकि राजजात भाद्रपद के षुक्लपक्ष में षुभलग्नानुसार आरम्भ होकर निष्चित दिन पर होमकुण्ड पँहुचती है। उसके बाद कृश्णपक्ष आरम्भ हो जाता हैं। जिसमें पूजापाठ-देवीय यात्रा आदि के लिए निषिद्ध पक्ष हैं। दूसरे में जलवायुवीय दृश्टि से 20-25 सितम्बर के बाद हिमालयी क्षेत्र में भारी हिम तूफान (एवालांच) चलने आरम्भ होते हैं। इन परिस्थितियों में उच्च हिमालयी भागों में मानवीय प्रवेष या गतिविधियाँ आसान नहीं हैं।
राजयात्री कुलसारी से प्रस्थान कर चेपड्यूँ थराली के लिए प्रस्थान करती है।
