अनादिकाल से चली आ रही है हिमालय में तीर्थाटन की परंपरा

उत्तराखण्ड में आयोजित होने वाली बारह बर्शों के अन्तराल में श्री नंदाराजजात आज किसी परिचय की मोहताज नहीं। मुझसे पूर्व इस विशय पर कई लेख, पुस्तकें, फोटोग्राफी, विडियो, आॅडियो, व्याख्यानमाला, गीत आदि प्रकाषित हो चुकी हैं। लेकिन मेरे मस्तिश्क में एक विचार ने उछाल लिया कि सुधि पाठकों एवं इतिहास में रूचि रखने वाले पाठकों के लिए समग्र पुस्तक प्रस्तुत की जाय। श्री नंदा देवी राजजात से जुडे़ लगभग 180 से 200 गाँवों की बात की जाय जिनका राजजात आयोजन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान रहता है। मैंने किसी व्यक्ति विषेश या फिर किसी एक गाँव को ही आधार नहीं बनाया।
इस प्रकार की यात्राओं को जानने के लिए अतीत के भावनात्मक पक्ष को स्वीकार करना होगा तभी राजजात के इतिहास की जानकारी प्राप्त होगी। विषेशकर श्रीनंदाराजजात के सम्बन्ध तो सौ फीसदी स्वीकार करनी ही होगी। क्योंकि इसका बहुत पुख्ता लिखित एवं प्रकाषित इतिहास नहीं है। इस परिस्थिति में यात्रामार्ग के जन-समूह, इससे जुड़े परिवारों, जातियों, सयानों, पुरोहितों, पुजारियों थोकी ब्राह्मणों, यात्रा-मार्गों के वासियों से प्राप्त जनश्रुतियां, जानकारियां, स्थानीय गीतों, जागरों को आधार मानना पड़ेगा।
उत्तर हिमालय के अधिकाषं स्थलों पर जाने वाले श्रद्धालुओं ने इस प्रकार की धार्मिक यात्रा को तीर्थ के रूप में माना है। जिसका अर्थ जीवन से पर पाना होता है। अतः प्राचीनकाल में ऐसी साहसिक और धार्मिक यात्राएं अधिकांष लोग अपने जीवन के चैथे पड़ाव में करते थे। ताकि ऐसे स्थानों पर अधिक आयु या विपरीत परिस्थितियों के कारण यदि मृत्यु भी होती है, तो मोक्ष मिल जायेगा। इसीलिए इन स्थानों को स्वार्गद्वार/स्वर्गारोहिणी और मोक्षधाम के नाम से भी जाना जाता है।
भारत बर्श के कोने-कोने में अनेक तीर्थस्थान है। हिमालय को तो देवताओं का वास कहा गया है। इसीलिए महाकवि कालिदास ने अपने काव्यषास्त्र में इसे देवात्मा या देवभूमि भी कहा है। श्री नंदा राजजात यात्रा जहाँ-जहाँ से होमकुण्ड के लिए गुजरती है, वहाँ-वहाँ देवी और उनके धर्म भाई लाटू, घण्डियाल, हीत, बिनसर, द्यौसिंग, भौसिंग के भी मन्दिर हैं। सबसे लम्बी पैदल यात्रा के बीच-बीच में विश्राम के लिए दूरी के आधार पर स्थान निर्धारित किये गये हैं जिन्हें स्थानीय बोली में पड़ाव कहते हैं।

यह ऐतिहासिक यात्रा साहस, षौर्य, वीरता के साथ-साथ जन-समूह की भावनाओं से जुड़ी मार्मिक यात्रा भी है। क्योंकि यहाँ के जन मानस ने आदिषक्ति षिव अद्र्धांगिनी पार्वती (नन्दा) को अपनी बहिन और पुत्री (धियाँणी) माना और पूजा है। जैसे धियाणी को निष्चित अन्तराल पर मायका (चाँदपुर गढ़ क्षेत्र) से ससुराल (षिवधाम कैलाष विदा करते है। इसी परम्परा को ’’श्रीनंदा राजजात’’ कहते हैं।
प्रिय पाठक गणों मेरी इतनी क्षमता कहाँ कि आदिषक्ति स्वरूपा श्री नन्दा को चन्द कागज के पन्ने में समेट सकूँ। प्रस्तुत पुस्तक में मैं यह नहीं कहूँगा की यह सम्पूर्ण दस्तावेज है। फिर भी अपनी सामथ्र्य, सोच, नन्दा क्षेत्र भ्रमण एवं पहुँच के आधार पर श्रीनंदा से जुड़ी जन-श्रुतियों, घटनाओं, कहानियांे को इस पुस्तक में संचय करने का प्रयास किया।
मेरे इस षूक्ष्म प्रयास में पूर्व प्रकाषित आलेख, समाचार पत्र-पत्रिकाओं, कविताओं, व्याख्यानमाला, पुस्तकों, जानकारों, इस यात्रामार्ग के गाँव के बुजुर्गों, राजरूड़िया गाँव छिमटा, विद्धत मण्डली ब्राह्मणों, पुजारियों, इस यात्रा का दायित्व संभालने वाली श्रीराजजात समिति के पदाधिकारियों, राज परिवार से जुड़े गाँव काँसुवा, जुलगढ़, खगेली, तोप, थालधार, मित्रों, सहयोगियों, खोजी पत्रकार मित्रों का अतुलनीय सहयोग रहा है।
अपने छात्र जीवन के गुरूजनों, ईश्ट-परिवारगणों, परिवार के सदस्यों, षिक्षा विभाग के कई वरिश्ठ अधिकारियों, फोटाग्राफर, का हृदय की गहराईयों से साभार करता हूँ। जिन्होनें मुझे पग-पग पर सहयोग किया है। जिनका वर्णन मैंने सन्र्दभ-सूची में किया है, मेरी पुस्तक के आधार-स्रोत भी रहे हैं।
अन्त में अपने प्रकाषक का सदैव ऋणि रहूँगा जिन्होनें मेरे इस अमूर्त विचार को मूर्त आकार देने में अपना अमूल्य समय की पूँजी व्यय की है। जब-जब में समाज की श्री नन्दा के प्रति जन-भावनाओं को समेटने का प्रयास करूँ तब-तब आप संकलित कर समाज के सामने प्रस्तुत करतेे रहें।

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